आज के मसीही जनों के लिए परमेश्वर का प्रोत्साहन- परमेश्वर का वचन क्षमा के विषय क्या कहता है.

द्वारा: Dr. John Ankerberg; ©1999

क्या आपको अपनी परिस्थितियों में परमेश्वर के प्रोत्साहन के अनुभव की आवश्यकता है? मसीही जन प्रायः अपने दैनिक जीवन में ऐसा व्यवहार करते हैं कि उनके कंधों पर संपूर्ण संसार का बोझ है. ऐसा प्रतीत होता है कि वे परेशानियों से घिरे हुए हैं जिनके कारण वे दुःखी और विमूढ़ हैं. वे चिन्ता भी बहुत करते हैं जीवन उनको दबा देता है और परिणाम स्वरूप उन्हें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना कठिन हो जाता है और आनन्द उनके लिए बहुत ही कम रह जाता है. क्या इस पल आपके साथ भी ऐसा ही है? कुछ ऐसे भी लोग है जिनके मन में सन्देह अति कष्टकारी है. आपको कैसे विश्वास हो कि परमेश्वर ने आपके अतीत के पाप क्षमा कर दिए हैं? या संभवतः आपके मन में प्रश्न है, “मैं जयवन्त जीवन कैसे जिऊँ और पल प्रतिपल मसीह के आनन्द का अनुभव करूं?” इस लेख में आपको इसका अन्तर मिलेगा. “आपको कैसे विश्वास हो कि परमेश्वर ने आपके पापों को क्षमा कर दिया है?”

मैं उनसे बात करना चाहता हूँ जो निराश हैं और अपने में पाप का बोध करते हैं और सोचते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें क्षमा नहीं किया है. यह सही है. मैं मानता हूँ कि आप मसीही जन होकर भी ऐसा अनुभव करते हैं. परमेश्वर तो नहीं चाहता कि आपमें ऐसी भावना हो परन्तु आपको ऐसा प्रतीत होता है.

अनेक सच्चे मसीही जन मन में कहेंगे, “जॉन मुझे विश्वास नहीं कि परमेश्वर ने मेरे पापों को क्षमा कर दिया है. मैं जानना तो चाहता हूँ परन्तु किसी न किसी कारण मुझे परमेश्वर के प्रेम और स्वीकरण का अनुभव नहीं होता है.”

मसीही जनों द्वारा सत्य को जानने और मसीह की क्षमा की गवाही सुनना उनके लिए तो असामान्य बात नहीं है और वे सोचते हैं कि वे उस सत्य का अनुभव क्यों नहीं करते हैं.

इसी परिप्रेक्ष्य में कुछ मसीही जनों का कहना है कि उन्हें पाप का बोध लगातार सताया रहता है, विशेष करके जब वे सोचते है कि उन्हें न्याय के दिन परमेश्वर के सम्मुख खड़ा होना पड़ेगा.

वे मुझ को भी कहते हैं, “मैं जानता हूँ कि परमेश्वर मेरे जीवन से प्रसन्न नहीं होगा. वह मुझे कठोरता से और निराशा से देखेगा और मुझे अपने स्वर्ग से बहुत दूर कर देगा.”

अन्य मसीही मित्र आत्मिक निराशा का सामना करके सोचते हैं ऐसा क्यों है. वे लगभग सदैव ही अप्रसन्न रहते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि वे अपने मसीही जीवन का आनन्द नहीं ले पाते हैं. क्या आपके साथ ऐसी कोई व्यथा है? यदि ऐसा है तो मैं आपका ध्यान परमेश्वर के वचन की ओर आकर्षित करने का प्रयास करूंगा जो आपके लिए शुभ सन्देश है और उससे आपको प्रोत्साहन और सहायता मिलेगी.

मसीह जन अप्रसन्न क्यों रहते हैं और उन्हें ऐसा लगता है कि उनके पाप क्षमा नहीं हुए इसका एक कारण यह है कि उन की समझ में यह भ्रम है कि सभाओं में व्यर्थ उठाना और पत्र पर हस्ताक्षर करना कि वे मसीह यीशु में विश्वास करते हैं तब ही वे पूर्णतः प्रसन्न होंगे और ऐसा करने के बाद भी वे सोचते हैं कि वे प्रसन्न क्यों नहीं हैं.

सच तो यह है कि उनके सामने सब परेशानियां आती है और वे पूछते हैं, “मेरे साथ यह सब क्यों होता है जबकि मैं तो परमेश्वर का पुत्र हूँ?”

मैं आपको बताना चाहता हूँ कि ऐसा अनुभव सच्चे मसीही जनों को ही होता है. बाइबल, कलीसिया का इतिहास और अनुभव प्रकट करता है कि मसीह के सच्चे विश्वासियों पर ऐसे संकट आते हैं. उनके मन में सन्देह उत्पन्न होते हैं, वे निराश होते हैं और उनमें दोषी विवेक उत्पन्न होता है. मूसा, दाऊद और पतरस इसके अति उत्तम उदाहरण है.

यदि हमें केवल विश्वास करके उद्धार प्राप्त करना होता और तदोपरान्त सदा हर्षित जीवन जीना होता तो नये नियम में पत्रियों के लिखने की आवश्यकता ही नहीं थी. मनुष्य उद्धार पाकर सदा सुखी रहता. उसे कोई परेशानी नहीं होती परन्तु बाइबल में अर्थात नये और पुराने नियम में पर्याप्त प्रमाण हैं कि ऐसा नहीं है.

लगभग संपूर्ण नया नियम उन लोगों के लिए लिखा गया था जो किसी न किसी परेशानी में थे और वो अनेकों कारणों से अप्रसन्न रहते थे और उन पर अपने पुराने जीवन में लौट जाने की परीक्षा आती थी. वे मसीही जन होते हुए भी कष्टों में थे और अप्रसन्न थे. उन्हें समझ नहीं आता था कि क्या करें क्या विश्वास करें. उन्हें सहायता की आवश्यकता थी. दूसरे शब्दों में प्रेरित हमारे जैसे मनुष्यों को ही पत्र लिखते थे और उन्हें हमारे समान समस्याओं का ही परमेश्वर प्रदत्त उत्तर देते थे. उन्होंने उन मनुष्यों से क्या कहा? उन्होंने एक ही मुख्य प्रश्न का उत्तर बार-बार दिया और वह उत्तर परमेश्वर की क्षमा से संबन्धित था.

स्पष्ट है कि उन्होंने अनेकों बार अनेक पाप किए थे और उन्हें चिन्ता थी कि परमेश्वर उनसे फिर भी प्रेम करेगा, उन्हें क्षमा करेगा और उन्हें स्वर्ग में आने देगा. प्रेरित जिन मनुष्यों को पत्र लिख रहे थे उनमें से कुछ कहते थे, “परमेश्वर मुझसे प्रेम नहीं करेगा क्योंकि मैंने चोरी की है, मैंने गर्भपात करवाया है. मैंने बहुत झूठ बोला है. मैंने विवाह से पूर्व शारीरिक सम्बन्ध बनाए है.मैंने व्यभिचार किया है. मैं समलैंगिक संबन्धों में रहा/रही हूँ.”

ऐसा ही कोई पाप आपमें है और आप सोचते हैं कि परमेश्वर आपसे प्रेम नहीं करता तथा आपको क्षमा नहीं करेगा.

बाइबल कहती है कि आप परमेश्वर को समझने में भूल कर रहे हैं. वह आपके पापों को जानता है और आपसे अब भी प्रेम करता है. वह चाहता है कि आप पूर्ण क्षमा ओर उसकी सहायता तथा मार्गदर्शन के लिए उसके पास आएं. अब मैं आपको नये नियम एवं पुराने नियम से इस बात को सिद्ध करके दिखाऊंगा. हम यह भी देखेंगे कि परमेश्वर किस आधार पर हमारे पाप क्षमा करने को तैयार रहता है

चक स्विन्दोल्ल अपनी पुस्तक, “The Grace Awakening” में हमारे प्रति परमेश्वर की दया की एक सर्वप्रिय कहानी लिखते है जो पुराने नियम में पाई जाती है. यह एक युवक मपीबोशेत की कहानी है. क्या आपको राजा शाऊल का स्मरण है? उसका एक पुत्र योनातान था जिसके पुत्र का नाम मपीबोशेत था. वह शिशु अवस्था में ही विकलांग हो गया था क्योंकि उसकी आया सैनिकों से बचाने के लिए उसे लेकर भाग रही थी कि वह ठोकर खाकर गिरी और यह शिशु उसके साथ गिरा तथा विकलांग हो गया. उसका तत्कालिक उपचार न हो पाया और वह सदा के लिए विकलांग हो गया. वह चलने योगय न था. 15-20 वर्ष तक बाइबल में उसका नाम नहीं है परन्तु दाऊद के सिंहासन पर बैठते ही उसका नाम आता है.

प्राचीन युग में, 3000 वर्ष पूर्व पूर्वी क्षेत्र में जब भी कोई राजा सिंहासन पर बैठता था तब वह पहला काम यह करता था कि उससे पूर्व के राजा के संपूर्ण परिवार को नष्ट कर दे. अतः नये राजा के सिंहासन पर बैठते ही पहले राजा का कुटुम्ब कांपने लगता था. इसके अतिरिक्त शाऊल ने तो अनेकों बार दाऊद की हत्या करने का प्रयत्न भी किया था. अतः मपीबोशेत अपनी विकलांग दशा के साथ मृत्यु के भय में जी रहा था.

बाइबल कहती है कि राजा बनने के बाद दाऊद शाऊल पुत्र योनातान की मित्रता के बारे में सोच रहा था. अतः उसने पूछा- 2 शमूएल 9:1, “क्या शाऊल के घराने में से कोई अब तक बचा है जिसको मैं योनातन के कारण प्रीति दिखाऊं?”

इब्रानी में “प्रीति” के शब्द का अर्थ है, “अनुग्रह, दया या प्रेमपूर्ण अनुराग” दूसरे शब्दों में दाऊद ने यह नहीं कहा कि शाऊल के घराने से कोई बचा है कि योग्य ठहरे? उसने कहा कि शाऊल के घराने में कोई है जिसे वह योनातन के कारण अनुग्रह प्रदान करे. उसके सेवकों ने कहा कि एक युवक है.

परन्तु उसने कहा कि वह विकलांग है और किसी काम का नहीं. मुझे दाऊद की प्रतिक्रिया बड़ी मनभावन लगती है. उसने यह नहीं पूछा, “वह विकलांग कैसें हुआ?” उसने कहा, “जाकर उसे ले आओ. वह कहां है?”

दाऊद के सेवक ने कहा कि वह लोदबार नामक नगर में रहता है. लोदबार का अर्थ है “बंजर” जहाँ कुछ नहीं उगता. आप कह सकते हैं कि मपीबोशेत खड्डों में रहता था क्योंकि वह दाऊद से डर कर भाग रहा था. अतः दाऊद ने उस विकलांग युवक को बुलवाया.

अब आप मपीबोशेत की मानसिक अवस्था की कल्पना करें जब वह यरूशलेम में राजमहल में लाया गया. वह तो गुमनाम रहना चाहता था. वह तो कभी नहीं चाहता था कि कोई उसे जाने और विशेष करके उसके दादा के बाद आनेवाला राजा. वह तो सोच रहा होगा कि उसकी मृत्यु निश्चित है. दाऊद द्वारा उससे प्रीति करने का कोई कारण नहीं था और उसे घृणा के अनेक कारण थे. मपीबोशेत रथ में तुरन्त उठाकर राजा के सम्मुख उपस्थित किया गया.

बाइबल कहती है कि वह कांपता हुआ दाऊद के सम्मुख मुंह के बल गिर पड़ा. उसे दाऊद की दया का लेश मात्रा भी अनुमान नहीं था. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि दाऊद के मुख से यह सुनकर उसे कैसा लगा होगा, “मत डर, मैं तुझे निश्चय ही तेरे पिता योनातन के कारण दया दिखाऊंगा.”

यहां फिर वही शब्द है जिसका अर्थ है, अनार्जित अनुग्रह. दाऊद ने उस विकलांग व्यक्ति को दण्ड देने के लिए नहीं बुलवाया था. दाऊद के मन में उसके लिए हानि की अपेक्षा भलाई थी. वह उसे नाश करना नहीं, उठाना चाहता था. दाऊद उसके साथ ऐसा व्यवहार क्येां करना चाहता था? उसकी योग्यता के कारण नहीं परन्तु उसके पिता योनातन के कारण. मपीबोशेत पर दाऊद का अनुग्रह प्रदर्शन हमारे लिए परमेश्वर के अनुग्रह का एक अति उत्तम उदाहरण है, वह अनुग्रह जो हमने अर्जित नहीं किया. परन्तु केवल हमारे लिए उसके पुत्र के जीवन और मृत्यु के कारण.

पे्ररित पतरस लिखता है, “हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, जिस ने यीशु मसीह को मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा, अपनी बड़ी दया से हमें जीवित आशा के लिये नया जन्म दिया. अर्थात एक अविनाशी और निर्मल, और अजर मीरास के लिये.” (1 पतरस (1:3, 4).

मैं चाहता हूँ कि आप दाऊद की दया के प्रति मपीबोशेत की प्रतिक्रिया देखें. संभवतः परमेश्वर के अनुग्रह और उसकी दया के प्रति आपकी भी यही प्रतिक्रिया है, “तेरे पास क्या है कि तू मुझ जैसे मरे हुए कुत्ते की ओर दृष्टि करे.” (सैम 2 9:. 8)

अपने आप को कुत्ता कहने में उसने यह प्रकट किया कि वह स्वयं को घृणित, तुच्छ, नकारा प्राणी समझता है. क्यों? क्योंकि वह पैरों से विकलांग था और न तो तन से और न ही धन से दाऊद की किसी प्रकार सेवा करने योग्य था. वह व्यक्तिगत रूप से शून्य था, परन्तु वह मुख्य बात समझने में चूक रहा था. दाऊद उससे कुछ नहीं चाहता था. वह तो बस योनातन के कारण उसे गले लगाना चाहता था. वस्तु स्थिति तो यह थी कि दाऊद उसे अपने पुत्रों के तुल्य लाभ एवं सौभाग्य प्रदान करना चाहता था.

बाइबल कहती है, “और मपीबोशेत यरूशलेम में रहता था, क्योंकि वह राजा की मेज पर नित्य भोजन किया करता था. अब वह अपने दोनों पैरों से लंगड़ा था”

यह एक अद्भुत दृष्य नहीं है? कैसा अनुग्रह. मपीबोशेत अयोग्य होते हुए भी दाऊद के शर्तरहित प्रेम का पात्र था. यह परमेश्वर की दया, शर्तरहित प्रेम और अनुग्रह का उदाहरण है जो उसने क्रूस पर अपने पुत्र की मृत्यु के कारण आप पर और मुझ पर उण्डेला. मपीबोशेत में ऐसी कोई योग्यता नहीं थी कि वह राजा का अनुग्रह प्राप्त करता. वह केवल राजा की दया ओर अनुग्रह को स्वीकार कर सकता था.

बाइबल कहती है कि हम भी आशा से रहित पापी हैं, अयोग्य है और किसी भी प्रकार परमेश्वर के अनुग्रह और क्षमा के योग्य नहीं है. उसने हमारे लिए अपनी दया उण्डेल दी है और हमें कहा गया है कि हम सहर्ष दीनपूर्वक उसे ग्रहण करके विश्वास करें कि वह हमसे प्रेम करता है.

शायद आप सोच रहे होंगे, “जॉन, पुराने नियम की यह कहानी वास्तव में बहुत ही अच्छी है परन्तु मेरे विचार में आज परमेश्वर का व्यवहार ऐसा नहीं है. मेरे कहने का अर्थ है कि ब्रह्माण्ड का राजा, परमेश्वर क्यों कर मुझे अपनी दया और करूणा प्रदान करेगा? वह मेरे पापों को जानता है और उसका प्रसन्न होना संभव नहीं.”

तो हम आपके पापों के बारे में ही चर्चा करते हैं. यदि आप मसीही विश्वास के कुछ आधारभूत तथ्यों को न जाने तो आपको कभी शान्ति नहीं मिलेगी और आपके मसीही जीवन में आनन्द नहीं होगा. आपको इन तथ्यों से आवगत कराने से पूर्व मैं कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूँ. अपने पापों को ध्यान में रखते हुए आपके मन में परमेश्वर पिता की कैसी छवि उत्पन्न होती है? आपके विचार में आपके लगातार पाप करते रहने पर उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी? क्योंकि हम प्रायः सोचते हैं कि परमेश्वर हमसे बहुत क्रोधित है, और वह हमें दण्ड अवश्य देगा तो हम स्वयं को दोषी मानकर उससे दूर भागते हैं परन्तु मसीही होने के कारण आपका ऐसा सोचना गलत है.

उड़ाऊ पुत्र की कहानी में यीशु ने हमें बताया कि हमारे प्रति परमेश्वर का व्यवहार कैसा है जब हम पाप करते हैं. यह कहानी हर एक मसीही जन के लिए है जो पाप के भयानक दोष के अधीन जी रहा है और सोचता है कि वह परमेश्वर के सामने कहाँ खड़ा है क्योंकि उसके भयंकर पाप ने परमेश्वर को कुपित किया है परन्तु इस कहानी में प्रभु यीशु पिता और पुत्र का संबन्ध दर्शाता है. पुत्र स्वार्थी और घमण्डी है और पिता से अपना भाग मांग लेता है. यीशु के युग में कोई पुत्र पिता की मृत्यु से पूर्व अपना भाग मांगे, यह संभव नहीं था. उसे तो पिता की मृत्यु के बाद अपनी माता के जीवन यापन का प्रबन्ध करना होता था. परन्तु इस युवक ने परिवार की चिन्ता किए बिना अपना भाग लेकर सांसारिक भोग-विलास और पाप में शीघ्र ही सब कुछ नष्ट कर दिया. यीशु के युग के फरीसी अवश्य ही कहते कि उस पिता को उसे ना दखल करने का पूरा अधिकार है.

यीशु एक कदम और आगे बढ़कर उस युवक की दुर्दशा का वर्णन करता है. वह सूअरों के बीच रहता था और उसे संभालता था. धर्म गुरुओं के लिए इससे अधिक जघन्य अवस्था और कोई नहीं थी. यीशु ने उसकी दशा को ऐसा भयानक रूप क्यों दिया? क्योंकि वह यह दिखाना चाहता था कि उस युवक के पास अब अपने पिता को देने के लिए कुछ भी नहीं बचा था कि वह उसे स्वीकार करे. उस पुत्र ने सब कुछ गवां दिया था.

जब आशा समाप्त हो गई थी तब प्रभु यीशु ने इस कहानी का आश्चर्यजनक अन्त किया जिसे सुनकर फरीसी अवाक रह गए थे. उड़ाऊ पुत्र सुअरों के बाड़े में बैठा अपने कर्मों के कारण भूखा मर रहा था तब उसने अपने पिता के बारे में सोचा और घर लौटने का निर्णय लिया. उसने अपने आपको स्वच्छ करने का प्रयास भी नहीं किया और संवारा भी नहीं कि अच्छा दिखे. वह गंदा ही लज्जा के साथ संकोच करता हुआ अपने पिता के पास गया. वह जानता था कि उसे वहाँ रहने का कोई अधिकार नहीं है. वह तो बस जीने के लिए मजदूरी चाहता था. इस समय फरीसियों के विचार में पिता को उस आवारा विद्रोही युवक से मुँह मोड़ लेने का पूर्ण अधिकार था. उसने अपनी इच्छा से अपना भाग उड़ा दिया था इसलिए उसे घर से निकाल कर दण्ड देना चाहिए था. यहाँ आकर प्रभु यीशु ने उन्हें चकित कर दिया कि हमारे स्वर्गीय पिता का प्रेम असीम है. यदि पुत्र को बेदखल करने की कोई सीमा थी तो उस पुत्र ने सब सीमाएं पार कर ली थी. उसने हर काम गलत किया था.

यहां यीशु के कहने का अर्थ स्पष्ट है. कोई भी मनुष्य इतना दूर नहीं जा सकता कि परमेश्वर की क्षमा से बाहर हो जाए. आपको यह समझ लेना है कि आपने जो भी किया हो, अपने परमेश्वर को उसकी सीमा से बाहर नहीं किया है. आपके लिए उसका प्रेम सीमा नहीं मानता है. क्यों? क्योंकि उसने आपके पापों के लिए 2000 वर्ष पूर्व ही क्षमा प्रदान कर दी है जब यीशु क्रूस पर मरा था. यदि आप परमेश्वर के पास आकर उसकी क्षमा ग्रहण करें तो वह आपसे प्रेम करेगा, आपको क्षमा करेगा और गले लगाएगा.

प्रेरित पौलुस दृढ़तापूर्ण कहता है, “परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रकट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिए मरा”

रोमियों 8: 1, “सो अब जो मसीह यीशु में हैं उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं; क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन् आत्मा के अनुसार चलते हें.”

इफिसियों 2 में लिखा है, “परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है; अपने उस बड़े प्रेम के कारण, जिस से उस ने हम से प्रेम किया,जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया…. क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, बरन परमेश्वर का दान है, और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे.”

पौलुस यह भी कहता है कि, “उसने हमारा उद्धार इसलिए नहीं किया कि हमने धर्म के काम किए परन्तु उसकी दया के कारण.”

यीशु ने यह स्पष्ट किया कि उड़ाऊ पुत्र का पिता उसी दिशा में देखता रहता था जिस दिशा में उसका पुत्र गया था कि शायद वह लौट आए. वह अपने पुत्र को पुनः घर में लेना चाहता था चाहे उसने जो भी अनर्थ किया हो. इसी प्रकार आपका स्वर्गीय पिता धीरज धर कर प्रतीक्षा करता है जब पाप के लिए उसे छोड़ देते हे. वह आपकी प्रतीक्षा करता है. वह आपके साथ अविच्छेदित संबन्ध बनाना चाहता है. वह चाहता है कि आप उसके पास लौट आएं और वह आप से प्रेम करे. वह चाहता है कि आप उस संबन्ध का लाभ उठाएं जो उसने मसीह के द्वारा संभव बना दिया है.

इस कहानी में सबसे अधिक आनन्द की बात मेरे लिए यह है कि परमेश्वर हम पर अपना प्रेम प्रकट करने के लिए कैसा अधीर है. यीशु ने कहा कि जब वह उड़ाऊ पुत्र बहुत दूर था, उसके पिता ने उसे देखा और उस पर तरस खाकर उसके पास भाग कर गया, उसे गले लगाया और उसे चूमा.”

आज यदि आप परमेश्वर की ओर मुड़ जाएं तो वह भाग कर आपको गले लगाएगा. फरीसियों के विचार में ब्रह्माण्ड का परमेश्वर किसी पापी के पास भाग कर आए और उसे गले लगाए, यह प्रभु यीशु की गलत शिक्षा थी. उनकी समझ में तो परमेश्वर पापियों को दण्ड देता है परन्तु यीशु के विचार में वे गलत थे. आपके द्वारा पाप करने पर परमेश्वर आपके साथ संबन्ध बनाने के लिए और अधिक व्याकुल हो जाता है, वह तो आपके आने की प्रतीक्षा भी नहीं कर पाता है. वह तो अधीनता से आपके लौट आने की प्रतीक्षा करता है कि आपको धो कर आपसे पुनः सम्बन्ध बनाएं वह आपके पापों को पूरा क्षमा कर देगा वरन् आपका मार्गदर्शन भी करेगा ओर आपको समस्याओं और परिस्थितियों का सामना करने के लिए सामथ्र्य भी प्रदान करेगा.

प्रेरित पौलुस परमेश्वर के बारे में लिखता है; “जिसने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिए दे दियाः वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्योंकर न देगा?” (रोमन 8: 32).

अब आप पूछेंगे, “उड़ाऊ पुत्र के पाप वष क्या हुआ? पिता ने उसका क्या किया? उसने उसकी चर्चा कब की होगी? उसने जो धन गवां दिया था उसका क्या हुआ? परिवार के लिए जो लज्जा उसने उत्पन्न की उसका क्या हुआ?

जब आप परमेश्वर के पास विश्वास से आते हैं और अपने पापों को स्वीकार करके उससे सहायता मांगते हैं तो बाइबल प्रतिज्ञा करती है कि परमेश्वर आपको उसी पल ग्रहण कर लेता है. आपने क्या किया और कितने समय किया इससे परमेश्वर पर रोक नहीं लगती है. वह आपको तुरन्त क्षमा कर देगा. परमेश्वर हमसे ऐसा प्रेम कैसे कर सकता है? वह न्यायनिष्ठ, पवित्र और धर्मी होकर भी हम पापियों से प्रेम करे और ग्रहण करे यह कैसे संभव है? धर्मशास्त्र और

सुसमाचार में व्यक्त मूल सत्य यह है कि परमेश्वर हमसे ऐसा व्यवहार कर सकता है क्योंकि उसने हमारे पापों का निवारण कर दिया है. उसने अपना क्रोध और प्रकोप मसीह पर उतार दिया जब क्रूस पर था.

बाइबल कहती है, “जो पाप से आज्ञात था, उसी को उसने हमारे लिये पाप ठहराया कि हम उस में होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएं.” (2 कोर 5:. 21).

प्रेरित यहूहन्ना कहता है, “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाएं. परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा कि जाति पर दण्ड की आज्ञा दे परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए.” (जॉन 3: 16,17).

हमारे लिए परमेवर का ऐसा महान प्रेम अन्र्तग्रहण करना कठिन है. यह तो प्रभु यीशु के युग में भी श्रोताओं के लिए कठिन था कि वे परमेवर के इस रूप को समझ कर उसके प्रति अपना विचार बदलें परन्तु जिन्होंने किया उनका जीवन बदल गया.

आपके बारे में क्या है? क्या अब प्रभु यीशु द्वारा दी गई परमेश्वर, हमारे स्वर्गीय पिता की व्याख्या को स्वीकार करने के लिए तैयार है? यीशु के अनुसार आपके पास एक क्षमा करने वाला पिता है जिसका प्रेम और धीरज असीमित है. वह आपके लौट आने की और आपके साथ सहमती की प्रतीक्षा करता है. उसने क्रूस पर मसीह की मृत्यु द्वारा आपके सब पाप धो दिए है. हमारे स्थान पर मसीह की मृत्यु के कारण परमेश्वर का ध्यान केन्द्र आपके साथ प्रेम की सहभागिता पर लगा रहता है. परमेश्वर की बाइबल आधारित छवि आपके प्रति उसका प्रेम भरा स्वभाव और आपके पापों के निवारण को समझने में समय लगेगा. यद्यपि यह कठिन है मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप ऐसा करें क्योंकि यह सच है. देखिए परमेवर आपसे क्या अनुरोध करता है इब्रानियों 4: 16.

बाइबिल कहती है, “इसलिये आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्धकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएं, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे.”

देखिए परमेश्वर भजन 103:10 में क्या कहता है “उसने हमारे पापों के अनुसार हमसे व्यवहार नहीं किया, और न हमारे अधर्म के कामों के अनुसार हम को बदला दिया. जैसे आकाश पृथ्वी के ऊपर ऊंचा है, वैसे ही उसकी करूणा उसके डरवैयों के ऊपर प्रबल है. उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है, उस ने हमारे अपराधों को हम से उतनी ही दूर कर दिया है.जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है. क्येांकि वह हमारी सृष्टि जानता है; और उसको स्मरण रहता है कि मनुष्य मिट्टी ही है.”

शायद आप इस समय एक प्रत्याश्चित करना चाहते हैं और स्वर्गीय पिता परमेश्वर से कहना चाहते है कि आपको विश्वास है कि वह आपसे प्रेम करता है और मसीह ने आपके सब पापों का दण्ड चुका दिया है और इस पल आप लौटकर उसके पास घर आ रहे हैं. अतः परमेश्वर के पास आपने पाप और आवश्यकताओं का अंगीकार करने के लिए तैयार हो जाएं. उससे कहें कि आप उसमें विश्वास करके हैं ओर मसीह के कारण उसकी क्षमा के वरदान और प्रेम को स्वीकार करते हैं.

यदि आप इसी पल परमेश्वर से यह कहना चाहते हैं तो मैं आपको प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित करता हूँ. “स्वर्गीय पिता, कभी-कभी मैं मुझे विश्वास करना कठिन हो जाता है कि तू मुझ से प्रेम करता है परन्तु क्योंकि मैं यीशु की गवाही में विश्वास करता हूँ, मैं तुझे अपना क्षमा करने वाला स्वर्गीय पिता स्वीकार करता हूँ, असीम प्रेम करने वाला पिता, जिसके धीरज की कमी का अन्त नहीं होता. एक ऐसा पिता जो मेरे साथ सहभागिता की इच्छा रखता है. एक ऐसा पिता जो मुझे और मेरी दशा को मसीह में अपनी सन्तान मानता है, न कि मेरे अतीत को देखता है. एक ऐसा पिता जो इस समय मेरे लौट आने पर, पापों से विमुख होकर मार्गदर्शन और सहायता मांगने पर आनन्द मनाता है. मुझ पर मेरी उन गलतियों को प्रकट कर जो तेरे लिए मेरे विचारों में है और मेरी अगुवाई कर कि मैं मैं अपना जीवन केवल तेरे सत्य पर आधारित रखूं. मेरे सब पाप क्षमा करने के लिए और तेरी दया एवं करूणा प्रदान करने के लिए धन्यवाद. आमीन.”