आणविक मशीनें: डिज़ाइन के अनुमान में सहायता हेतु प्रयोगात्मक समर्थन

द्वारा: Michael J. Behe, Cosmic Pursuit © मार्च 1, 1998

डारविन के लिए कोशिका – और सूक्ष्मजीवाणुतत्वों के कार्य – एक अज्ञात काले डिब्बे की तरह था. लेकिन, अब जबकि हम उस डिब्बे में झाँक सकते हैं, क्या हम उस पर डारविन के सिद्धांत को लागू कर सकते हैं? ऐसा क्यों है कि विज्ञान जर्नल में हज़ारों पेपर तो छपे, लेकिन किसी ने भी जटिल जैव आणविक बनावट के विकास के बीच की कड़ी पर विस्तारपूर्वक ब्यौरा देनेवाला कोई नमूना नहीं दिया? अपना अभूतपूर्व निष्कर्ष निकालते समय, बेहे अपने डिज़ाइन का परिणाम उन जानकारियों के साथ नहीं निकालते जिन्हें हम नहीं जानते, बल्कि उनसे, जिनसे हम भली-भांति परिचित हैं.

डारविनवाद का फलना-फूलना

चाल्र्स डारविन द्वारा छपवाने के थोड़े समय के भीतर ही The Origin of Species  , दुनिया के बड़े-बड़े जीव विज्ञानियों ने क्रमिक विकास की व्याख्या देनेवाले इस सिद्धांत को मान्यता दे दी. इस परिकल्पना ने होमोलोगस (एक जैसे दिखनेवाले जीवों में) समानता, अल्पविकसित अंगों, प्रजाति की बहुलता, विलोपन, जीवों के भौगोलिक वितरण की समस्या को तुरंत सुलझा दिया. उस समय का प्रतिरोधी सिद्धांत, जो किसी अलौकिक सत्व द्वारा प्रजातियों की रचना की बात कहता था, बुद्धिमान लोगों को अधिक संभव नहीं लगा, क्योंकि इसमें एक तथाकथित सृष्टिकर्ता था, और इतने छोटे कामों की गहराई में जाना उसकी गरिमा से नीचे की बात लगती थी.

समय के बीतने के साथ, क्रमिक विकास के सिद्धांत ने प्रतिरोधी सृष्टि के सिद्धांत को बहुत पीछे छोड़ दिया, और लगभग सभी कार्यरत वैज्ञानिकों ने जीव विज्ञान का अध्ययन डारविनवाद के दृष्टिकोण से किया. अधिकांश शिक्षित लोग अब एक ऐसी दुनिया में रहते थे जहाँ जीव जगत के सभी आश्चर्य और उसकी सारी विविधता प्राकृतिक चयन के सरल और सहज सिद्धांत का नतीजा थे.

लेकिन यह ज़रुरी नहीं कि विज्ञान का एक सफल सिद्धांत सही सिद्धांत भी हो. इतिहास के दौरान ऐसे कई सिद्धांत थे जिन्हें डारविनवाद के सिद्धांत की मशहूरी मिली, जो बहुत से प्रयोगात्मक और विचारणीय तथ्यों को एक सुसंगत संरचना में लाये, और जो जगत के संचालन से जुड़े लोगों के अनुमानों को सही लगते थे. उन सिद्धांतों ने भी कुछ सरल नियमों के साथ ब्रह्माण्ड की व्याख्या करने का दावा किया था. लेकिन कुल मिलाकर, वे सिद्धांत अब मर चुके हैं.

इसका एक अच्छा उदाहरण है ब्रह्माण्ड को लेकर न्यूटन के यांत्रिक नज़रिये के स्थान पर आईन्सटाइन के साक्षेपता-सिद्धांत का आना. हालाकि न्यूटन के नमूने ने अपने समय के कई प्रयोगों के परिणाम निकाले थे, लेकिन वह गुरुत्वाकर्षण के पहलू को समझाने में पूरी तरह असफल रहा. ब्रह्माण्ड की रचना को पूरी तरह एक नये सिरे से सोचने के द्वारा आईन्सटाइन ने इसे, और ऐसी कई दूसरी समस्याओं का हल खोजा.

डारविन का क्रमिक विकास का सिद्धांत भी, इसी तरह, अपने समय और 20वीं सदी के मध्य तक के आँकड़ों की व्याख्या करके फलता-फूलता गया, लेकिन मेरा लेख यह दिखा देगा कि इस सदी के उत्तरार्ध में आधुनिक जीव रसायन के प्रयासों द्वारा उद्घाटित अद्भुत घटना का जवाब देने में डारविनवाद असफल रहा है. ऐसा करने के लिए मैं इस तथ्य पर ज़ोर दूँगा कि जीवन अपने सबसे बुनियादी स्तर में बहुत जटिल होता है और इतनी जटिलता दिशाहीन क्रमिक विकास के साथ बिल्कुल भी मेल नहीं खाती है.

आंखों की एक श्रृंखला

हम कैसे देखते हैं?

19वीं सदी में आँखों की भीतरी संरचना के बारे में बहुत जानकारी उपलब्ध थी, और बाहरी दुनिया की एकदम सटीक तस्वीर उभारने में प्रयोग होनेवाली इस परिष्कृत व्यवस्था ने हर जानकार को भौचक्का कर दिया. 19वीं सदी के वैज्ञानिकों ने बिल्कुल सही देखा था कि यदि एक व्यक्ति दुर्भाग्यवश अपनी आँख के कई अभिन्न अंगों, जैसे कि लेंस, या पुतली, या किसी आक्यूल माँसपेशी को खो दे, तो निश्चय ही इसके कारण उसके देखने की क्षमता प्रभावित होगी या फिर हो सकता है कि वह पूरी तरह अंधा हो जाए. इस तरह यह निष्कर्ष निकाला गया कि आँख अपने समस्त अंगों के साथ ही कार्य कर सकती है.

अपने क्रमिक विकास के सिद्धांत पर उठाए जा सकनेवाली आपत्तियों पर विचार करते हुए द आरीजिन आफ स्पीशीज़ में चाल्र्स डारविन ने पुस्तक के बिल्कुल उपयुक्त खंड, ‘आर्गन्ज़ आफ एक्सट्रीम पर्फेक्शन एंड काम्पलिकेशन’’ में आँखों की समस्या पर चर्चा की. उन्होंने पेशकश की कि यदि एक ही पीढ़ी में आँखों जैसा कोई जटिल अंग प्रकट हो जाए, तो यह घटना चमत्कार के बराबर मानी जाएगी. लेकिन डारविन के क्रमिक विकासवाद को विश्वसनीय बनाने के लिए लोगों के मन में जटिल अंगों के धीरे-धीरे बनने की कल्पना से जुड़ी समस्या को हटाना था.

डारविन को इसमें अभूतपूर्व सफलता मिली, लेकिन इस बात की व्याख्या करके नहीं कि आँखों की रचना करने के लिए क्रमिक विकास ने क्या रास्ता अपनाया था, बल्कि इसके लिए उसने उन जानवरों की ओर संकेत किया जिनकी आँखों की संरचना में भिन्नता थी, जैसे कि सरल प्रकाश संवेदी बिंदु आँखों से लेकर कुछ रीढ़धारी जीवों की जटिल कैमरा आँखे, और कहा कि क्रमिक विकास के दौरान, मनुष्य ने भी, विभिन्न स्तरों पर ऐसी आँखें विकसित की होंगी.

लेकिन सवाल तो अब भी वहीं खड़ा था, कि आखिर हम देखते कैसे हैं? हालाकि डारविन अधिकतर दुनिया को इस बात का विश्वास दिला पाया था कि मनुष्य की आँखों ने भी क्रमिक विकास के दौरान इन्हीं स्तरों से होते हुए आज की जटिल संरचना प्राप्त की होगी, लेकिन वह यह नहीं समझा पाया कि वह सबसे सरल प्रकाश संवेदी आँखें आखिर देखती कैसे हैं? आँखों पर चर्चा के दौरान डारविन ने इतनी अद्भुत व्यवस्था से जुड़े इतने महत्वपूर्ण सवाल को ही खारिज कर दिया और कहा, ‘‘प्रकाश के प्रति एक तंत्रिका कैसे संवदेनशील होती है से ज़्यादा हमें इस बात से सरोकार है कि स्वयं जीवन कैसे उत्पन्न हुआ था.’’

उसके पास इस सवाल को नकारने का एक बढि़या कारण थाः 19वीं सदी के विज्ञान ने अभी इतनी तरक्की नहीं की थी कि इस मुद्दे का हल निकाला जा सकता. आँखे कैसे देखती हैं – यह सवाल कि प्रकाश के एक फोटोन के रेटीना से टकराने पर क्या होता है – इस सवाल का जवाब उस समय नहीं दिया जा सकता था. वास्तव में, जीवन के बुनियादी तंत्र से जुड़े किसी भी सवाल का जवाब उस समय देना संभव नहीं था. जानवरों की माँसपेशियाँ कैसे हरकत पैदा करती हैं? प्रकाश-संश्लेषण कैसे काम करता है? भोजन से ऊर्जा कैसे पैदा होती है? हमारा शरीर संक्रमण से कैसे लड़ता है? ऐसे सारे सवालों का कोई जवाब नहीं था.

कैल्विन और हाब्स का नज़रिया

यह मानवीय बुद्धि की एक विशेषता लगती है कि जब इसे कोई प्रक्रिया सही से समझ नहीं आती है, तब उसके स्थान पर सरलीकृत चरणों की कल्पना करके उसे सुलझाना उसे सरल लगता है. इसका एक खुशनुमा उदाहरण लोकप्रिय कामिक श्रृंखला कैल्विन और हाब्स में देखने को मिलता है. छोटे से कैल्विन को अपने शेर हाब्स के साथ साहसिक कारनामें करना बहुत अच्छा लगता है, जिसके लिए वह एक डिब्बे में उछल-उछल कर समय में पीछे जाता है, या खिलौनवाली रे-गन लेकर खुद को अलग-अलग तरह के जानवरों में बदलता है, या फिर डिब्बे को एक डूप्लीकेटर बना कर अपने जैसे बहुत से कैल्विन बना लेता है जिसमें हरेक कैल्विन में अपने टीचर या मम्मी जैसी शक्ति है. कैल्विन जैसे छोटे बच्चे के लिए यह कल्पना करना बहुत आसान है कि एक डिब्बा किसी हवाई जहाज की तरह उड़ सकता है, क्योंकि कैल्विन नहीं जानता कि हवाई जहाज़ वास्तव में काम कैसे करता है.

जैविक जगत में, जटिल बदलावों के सरल प्रतीत होने का एक अच्छा उदाहरण है अजीवात् जनन के सिद्धांत में विश्वास. 19वीं सदी के मध्य के दौरान अन्स्र्ट हैकेल इस सिद्धांत के प्रमुख समर्थकों में से एक था. वह डारविन का बहुत बड़ा प्रशंसक और डारविन के सिद्धांत की लोकप्रियता को बढ़ाने के काम में ज़ोर-शोर से लगा था. 19वीं सदी के सूक्ष्मदर्शी यंत्रों द्वारा कोशिकाओं के मिले सीमित ज्ञान के आधार पर, हैकेल यह विश्वास करता था कि कोशिका ‘‘कार्बन और एल्बुमीन के संयोजन का एक सूक्ष्म पिण्ड’’ थी, किसी सूक्ष्म जेली की तरह. इसलिए हैकेल को ऐसा लगा कि इतना सरल जीवन तो किसी अचेतन पदार्थ से आसानी से पैदा हो सकता था.

1859 में, The Origin of Species, के प्रकाशित होने के वर्ष में, एक अन्वेषी जलयान एच.एम.एस. साइक्लोप्स ने समुद्र के तल में कुछ अजीब से दिखनेवाले कीचड़ को निकाला. आखिरकार हैकेल को उस कीचड़ को करीब से देखने का मौका मिला, और सोचा कि यह तो उन कोशिकाओं की तरह दिख रहा था जिसे उसने सूक्ष्मदर्शी के नीचे देखा था. अपनी खोज से उत्साहित होकर उसने यह बात और किसी को नहीं, बल्कि डारविन के करीबी दोस्त और बचाव करनेवाले थामस हेनरी हक्सले को बताई, जिसने तब खुद इस कीचड़ की जाँच कीं. हक्सले को भी इस बात का विश्वास हो गया कि वह

कीचड़ न्तेबीसमपउ  (या कि प्रोटोप्लाज़्म अथवा जीवद्रव्य), जीवन को पैदा करनेवाला पदार्थ था, और हक्सले ने अजीवात् जनन के प्रमुख समर्थक के नाम पर उसे बेथीबायस हैकेली  का नाम दिया.

कीचड़ में कोई विकास नहीं हुआ. बाद के सालों में, जीव रसायन की नई तकनीकों के विकास, और बेहतर सूक्ष्मदर्शियों के साथ, कोशिकाओं की जटिलता उद्घाटित हुई. उन ‘‘साधारण पिण्डों’’ में हज़ारों तरह के विभिन्न जैविक अणु, प्रोटीन, और नाभीकिय अम्ल, कई तरह उपकोशिकीय संरचनाएँ, विशेष प्रक्रियाओं के लिए विशेष उपखंड और बहुत ही जटिल बनावट दिखे. आज पीछे मुड़ के देखने पर बेथीबायस हैकेली की पूरी घटना किसी बेवकूफी भरी या कितनी शर्मनाक दिखाई देती है, लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए. कैल्विन की तरह, हैकेल और हक्सले का बर्ताव भी सहज था: कोशिकीय संरचना का ज्ञान न होने के कारण, उनके लिए इस बात पर विश्वास करना आसान था कि कोशिकाएँ कीचड़ से पैदा हो सकती हैं.

पूरे इतिहास में, हैकेल, हक्सले और इस कोशिकावाली घटना जैसे कई उदाहरण हैं, जहाँ विज्ञान की कोई पहेली उस समय की समझ से परे की बात थी. एक ऐसी मशीन या संरचना या प्रक्रिया के लिए – जो कार्य तो करती है लेकिन किसी को यह नहीं पता कि वह काम कैसे करती है – विज्ञान में एक अटपटा सा नाम है: इसे ‘‘ब्लैक बाॅक्स’’ कहते हैं. डारविन के समय में जीव-विज्ञान एक ब्लैक बाक्स था. केवल कोशिका, या आँख, या पाचन-तंत्र, या प्रतिरक्षा ही नहीं बल्कि पूरा का पूरा जैविक संरचना व कार्य, क्योंकि इस बात की व्याख्या कोई नहीं कर पाया था कि आखिरकार जैविक प्रक्रिया आस्तित्व में आई कैसे.

डारविन के दिए नमूने के कारण जीव-विज्ञान ने बहुत प्रगति की है. लेकिन जिन काले डिब्बों को डारविन ने स्वीकारा था, वे अब खुल चुके हैं, और जगत के प्रति हमारा नज़रिया पूरी तरह हिल चुका है.

प्रोटीन के प्रति हमारी आधुनिक सोच का ही उदाहरण लीजिए.

प्रोटीन

जीवन के आणविक आधार को समझने के लिए हमें पहले यह समझना होगा कि ‘‘प्रोटीन’’ कहलानी वाली ये चीज़ काम कैसे करती है. प्रोटीन जीवित ऊत्तकों की मशीनरी होते हैं जो संरचना का निर्माण करते हैं और जीवन के लिए ज़रुरी रासायनिक प्रतिक्रियाओं का संचालन करते हैं. उदाहरण के लिए, शर्करा को ऊर्जा के जैविक रुप से उपयोगी रुप में बदलने का काम हेक्सोकाइनिस नामक प्रोटीन करता है. त्वचा कोलाजन नाम के प्रोटीन की बड़ी मात्रा से बनती है. जब प्रकाश आपके रेटीना से टकराता है, तब सबसे पहले वह रोडोप्सिन नामक प्रोटीन से पारस्परिक क्रिया करता है. किसी बढ़ई की दुकान की तरह, जहाँ लकड़ी का काम करने के लिए कई तरह के औज़ार होते हैं, जीवन के लिए ज़रुरी बहुत से काम करने के लिए, एक सामान्य कोशिका में हज़ारो तरह के अलग-अलग प्रोटीन होते हैं.

ये बहुउपयोगी औज़ार कैसे दिखते हैं? प्रोटीन की बुनियादी संरचना बहुत सरल होती है: वे एक कड़ी में एक दूसरे से जुड़े होते हैं और अमिनो अम्ल कहलानेवाली विभिन्न उपइकाइयाँ इनके निर्माण का बुनियादी तत्व होती हैं. हालाकि प्रोटीन की कड़ी में 50 से लेकर 1000 तक अमीनो अम्ल लिंक हो सकते हैं, हर स्थिति में 20 में से केवल 1 अमीनो अम्ल हो सकता है. इस तरह वे किसी शब्द की तरह होते हैं: शब्द चाहे कितना ही लंबा या छोटा हो, लेकिन उनकी बुनियादी संरचना बनती केवल 26 अक्षरों से ही है.

लेकिन कोशिका में प्रोटीन एक ढीली कड़ी की तरह तैरता नहीं रहता; बल्कि वह एक सटीक संरचना में मुड़ जाता है, और यह संरचना दूसरे प्रकार के प्रोटीनों की संरचना से बिल्कुल अलग हो सकती है. दो अलग प्रकार के अमीनो अम्ल अनुक्रम-दो अलग प्रोटीन-ऐसी विशिष्ट और भिन्न संरचनाओं में मुड़ सकते हैं जिनमें ऐसा अन्तर होगा मानो एक नट कसनेवाला औज़ार हो और दूसरा आरी. घरेलू औज़ारों की तरह, यदि प्रोटीन का भी आकार सही न हो, तो वे भी काम नहीं कर पाते हैं.

मनुष्य का दृष्टि

आणविक स्तर पर जैविक प्रक्रिया, सामान्यतया प्रोटीन के नेटवर्क द्वारा की जाती हैं, जिसका हर सदस्य कड़ी में एक विशेष भूमिका निभाता है.

चलिए अपने सवाल पर वापिस चलते हैं कि हम आखिर देखते कैसे हैं? हालांकि दृष्टि को लेकर डारविन का दर्शन एक काला डिब्बा था, लेकिन बहुत से जीव रसायनज्ञों की कोशिशों के चलते आज हमारे पास दृष्टि से जुड़े इस सवाल का जवाब है. जवाब में चरणों की एक लंबी कड़ी है जिसका आरंभ तब होता है जब प्रकाश रेटीना से टकराता है, और फोटोन को 11-सीआईएस-रेटिनल नाम का एक जैविक अणु सोख लेता है, जिसके कारण वह खुद को पीकोसैकण्ड के भीतर फिर से व्यवस्थित करता है. यह रोडोप्सिन प्रोटीन में, जो कि उससे कस कर बंधा होता है, एक सदृश बदलाव लाता है, ताकि यह ट्रांसड्यूसिन प्रोटीन से प्रतिक्रिया कर सके, जो बदले में जीडीपी नामक अणु को जीटीपी नामक अणु से बदल देती है.

कम शब्दों में कहे तो, यह आदान-प्रदान, विशिष्ट आणविक मशीनरी के बीच बंधनों की एक लंबी कड़ी की शुरुआत करता है, और अब वैज्ञानिक प्रवेश-द्वार, पंप, आयन चैनल, महत्वपूर्ण केन्द्रीकरण, और कमज़ोर होते सिग्नलों की प्रणाली के बारे में जानते हैं, जिनके कारण प्रवाह आप्टिक तंत्रिका से प्रसारित होता हुआ मस्तिष्क तक पहुँच कर दृष्टि में बदल जाता है. जीव रसायनज्ञ यह भी समझते हैं कि एक नये चक्र को संभव बनाने के लिए इन बदले हुए और जर्जर हिस्सों की बहाली में बहुत सी रसायनिक प्रतिक्रियाएँ शामिल होती हैं.

जीवन की व्याख्या करना

हालाकि दृष्टि के जीव रसायन से जुड़े ब्यौरे मैं यहाँ नहीं दे सकता, लेकिन अपनी बातचीत के दौरान मैं उसके चरणों के बारे में बता चुका हूँ. जीव रसायनज्ञ जानते हैं कि ‘‘दृष्टि’’ की व्याख्या देने का अर्थ क्या होता है. वे व्याख्या के उस स्तर को जानते हैं जिसे जैविक विज्ञान को अंततः अपना लक्ष्य बनाना ही चाहिए. ऐसा कहने के लिए कार्य को पूरी तरह समझ लिया गया है, उस प्रक्रिया के हर चरण को अच्छी तरह से स्पष्ट किया जाना चाहिए. जैविक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण चरण बुनियादी रुप से आण्विक स्तर पर होते हैं, इसलिए दृष्टि, या पाचन, या प्रतिरोधक क्षमता जैसी जैविक तथ्यों की संतोषजनक व्याख्या में आण्विक व्याख्या भी शामिल होनी चाहिए.

अब जबकि दृष्टि का काला डिब्बा खुल चुका है, तो इस क्षमता के ‘‘क्रमिक विकास की व्याख्या’’ का केवल आँखों की संरचना भर तक सीमित रहना काफी नहीं है, जैसा कि डारविन ने 19वी सदी में किया था और जो आज भी उसके समर्थक कर रहे हैं. केवल संरचना तक सीमित रहने का कोई औचित्य नहीं है. यही बात जीवाश्मों पर भी सही है. इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि जीवश्मों के रिकार्ड क्रमिक विकास के सिद्धांत से मेल खाते हैं या नहीं, और न ही भौतिकी विज्ञान में इस बात से कोई ज़्यादा फर्क पड़ता है कि न्यूटन का सिद्धांत दैनिक जीवन के अनुभवों से मेल खाता था या नहीं. जीवाश्म रिकार्ड के पास हमे बताने के लिए कुछ नहीं है, जैसे कि 11-सीआईएस-रेटिनल की रोडाप्सिन, ट्रांस्ड्यूसिन, और फास्फोडीसटेरेस के साथ होनी होनी प्रतिक्रिया का क्रमिक विकास कैसे हुआ होगा.

‘‘प्रकाश के प्रति एक तंत्रिका कैसे संवदेनशील होती है से ज़्यादा हमें इस बात से सरोकार है कि स्वयं जीवन कैसे उत्पन्न हुआ था’’ – 19वीं सदी में डारविन की कही बात. लेकिन पिछले कुछ दशकों में दोनों ही बातों ने आधुनिक जीव-रसायन का ध्यान खींचा है. जीवन के आरंभ पर शोध की गतिहीनता की कहानी बहुत रोचक है, लेकिन यह समय उस पर चर्चा का नहीं है. इतना ही काफी है कि आज जीवन के आरंभ पर अध्ययन का क्षेत्र पारस्परिक विरोधी नमूनों के कोलाहल में खो गया है, जिसमें से हरेक अविश्वसनीय, गंभीर रुप से अधूरे, और प्रतियोगी नमूनों से बिल्कुल बेमेल हैं. क्रमिक विकास में आस्था रखनेवाले कट्टर वैज्ञानिक भी गुप्त रुप से यह मानेंगे कि वास्तव में विज्ञान के पास इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि जीवन का आरंभ कैसे हुआ था.

जो समस्याएँ जीवन-के-आरंभ पर होनेवाले शोध को खटाई में डालती हैं, वही समस्याएँ यह जानने के प्रयासों को भी असफल करती हैं कि कोई जटिल जीव-रसायनिक प्रक्रिया वास्तव में शुरु कैसे होती है. जीव रसासन विज्ञान ने एक आण्विक जगत का खुलासा किया है, जो उस सिद्धांत की व्याख्या का पूरी मज़बूती से विरोध करता है जिसे सभी जीवों के स्तर पर बहुत समय से लागू किया जाता रहा है. डारविन का सिद्धांत उसके किसी भी काले डिब्बे पर कोई प्रकाश नहीं डालता, फिर चाहे वह काले डिब्बे का जीवन का आरंभ हो या दृष्टि (या अन्य किसी भी संघटित जीव रसायनिक प्रक्रिया) का आरंभ.

का सिद्धांत उसके किसी भी काले डिब्बे पर कोई प्रकाश नहीं डालता, फिर चाहे वह काला डिब्बा जीवन का आरंभ हो या दृष्टि (या अन्य किसी भी संघटित जीव रसायनिक प्रक्रिया) का आरंभ.

इर्रिड्यूसिबली काम्पलेक्स

The Origin of Species  में डारविन ने कहा था: यदि यह दर्शाया जा सके कि कोई ऐसा जटिल अंग है जिसके असंख्य, क्रमागत, थोड़े सुधारों के बिना बनने की संभावना हो, तो मेरा यह सिद्धांत पूरी तरह से चूर-चूर हो जाएगा.

डारविन के इस मानक पर खरी उतरनेवाली प्रक्रिया वह प्रक्रिया है जो कभी न घटनेवाली पेचीदगी अर्थात् इर्रीड्यूसिबल काम्लेक्सिटी का प्रदर्शन करती है. इर्रीड्यूसिबल काम्लेक्सिटी से मेरा मतलब एक ऐसी एकल प्रणाली से है जिसमें आपस में सहयोग करते कई सारे हिस्से होते हैं और ये हिस्से मिल कर किसी बुनियादी काम को अंजाम देते हैं, तथा किसी एक के भी अनुपस्थित होने से प्रणाली उस कार्य को नहीं कर पाती है. इस प्रणाली को पूर्व-प्रणाली में हल्के बदलावों के द्वारा बनाना संभव नहीं है, क्योंकि परिभाषा के अनुसार इसमें कोई पूर्व-प्रणाली कार्यरत नहीं थी.

चूँकि प्राकृतिक चयन में चुनाव करने का काम करना होता है, एक जैविक प्रणाली में इर्रीड्यूसिबल काम्प्लेक्स के अुनसार, यदि ऐसी कोई चीज़ है, प्राकृतिक चयन के लिए किसी एकीकृत इकाई को उठ कर यह कार्य करना होगा. लगभग पूरा विश्व इस बात को मानता है कि इस तरह की अकस्मात् घटना विकासवाद के उस सि़द्धांत से मेल नहीं खाएगी जिसकी डारविन ने कल्पना की थी. हालाकि इस बिंदु पर ‘‘इर्रीड्यूसिबल काम्पलेस्टिी’’ केवल शब्द भर हैं, जिसकी अधिकांश शक्ति उसकी परिभाषा में निहित है. अब हमें यह पूछना चाहिए कि क्या इर्रिड्यूसिबल काम्पलेक्स में कोई सच्चाई भी है या नहीं, और यदि है, तो क्या जैविक प्रणाली में भी कोई इर्रिड्यूसिबल काम्पलेक्स जीव हैं?

एक मामूली सी चूहादानी पर विचार करें (चित्र 1). चूहों को पकड़ने के लिए जिस चूहेदानी का प्रयोग हमारा परिवार करता है, उसमें कई हिस्से हैं. उसमें में हैं: 1) लकड़ी का आधार; 2) धातु का एक हथौड़ा, जो कि चूहे को मसलने का असल काम करता है; 3) दोनो तरफ से बढ़ी हुई स्प्रिंग जो आधार और हथौड़े पर दबाव डालती है; 4) एक संवेदनशील ‘‘कैच’’ जो हल्का सा दबाव पड़ने पर छूट पड़ता है; 5) धातु की एक छड़ जिसे चूहादानी लगाते समय हथौड़े और स्प्रिंग से होते हुए कैच से जाकर जोड़ते हैं. इसके अतिरिक्त पेंच और स्टेपल जैसी अन्य चीज़ें भी इस प्रणाली में लगाई जाती हैं.

चूहेदानी के किसी भी हिस्से (आधार, हथौड़ा, स्प्रिंग, कैच या धातु की छड़) को निकालने पर, यह काम नहीं करता. दूसरे शब्दों में, एक साधारण सी चूहेदानी भी तब तक काम नहीं करती जब तक कि उसके सभी हिस्सों को साथ में संगठित न किया जाए.

चूँकि चूहेदानी में कई हिस्से होते हैं, इसलिए यह एक इर्रिड्यूसिबली काम्पलेक्स तंत्र है. इस तरह, इर्रिड्यूसिबली काम्पलेक्स प्रणाली का आस्तित्व मौजूद है.

आण्विक मशीनें

अब, क्या कोई इर्रिड्सिबली काम्पलेक्स जीवरसायन प्रणालियाँ भी हैं? हाँ, पता लगता है कि ऐसी तो कई प्रणालियाँ मौजूद हैं.

पहले हमने प्रोटीनों पर चर्चा की थी. बहुत से जैविक संरचनाओं में प्रोटीन बड़ी आण्विक मशीनों के घटक होते हैं. जैसे कि पिक्चर ट्यूब, तारें, धातु के बोल्ट और पेंच वगैरह टीवी का हिस्सा होते हैं, वैसे ही प्रोटीन भी हिस्सा होते हैं, जो केवल उसी सूरत में कार्य करते हैं जब उन्हें सभी घटकों को संघटित किया जाए.

इसका एक अच्छा उदाहरण है सीलियम. सीलिया, जानवरों तथा पौधों के निचले स्तर की कोशिकाओं की सतह पर मौजूद केश जैसे आर्गेनेल होते हैं, जो कोशिका की ऊपरी सतह पर तरल को संचालित करने या किसी एकल कोशिका को तरल में से ‘‘खेते हुए’’ ले जाने का कार्य करते हैं. मनुष्यों में, उदाहरण के लिए, श्वसन तंत्र पर एपीथीलियम कोशिकाओं की परत, जिसमें कि हर कोशिका में लगभग 200 सीलिया होते हैं, एक साथ मिलकर कार्य करते हैं और बलगम को गले के रास्ते बाहर निकालते हैं.

सीलिया में तंतुओं का झिल्लीदार बंडल होता है जिसे एक्सोनीम कहते हैं. एक एक्सोनीम में दो केन्द्रीय एकल सूक्ष्मनलिकाओं को घेरता 9 दोहरी सूक्ष्मनलिकाएँ का एक छल्ला होता हैं. हर बाहरी प्रतिरुप में 13 फिलामेंट (उपतंतु ए) होते हैं जो 10 फिलामेंटों (उपतंतु बी) के संयोजन में जा कर मिलते हैं. सूक्ष्मनलिकाओं के फिलामेंटों में अल्फा और बीटा ट्यूबुलीन नामक, दो प्रकार के प्रोटीन होते हैं.

एक्सोनीम को बनाती 11 सूक्ष्मनलिकाएँ तीन प्रकार के योजकों द्वारा एक साथ संघटित की जाती हैं: उपतंतु ए अर्धव्यास के स्पोकों द्वारा केंद्रीय सूक्ष्मनलिकाओं से जुड़े होते हैं; बगल की बाहरी प्रतिलिपियाँ संयोजकों द्वारा जुड़ी होती हैं जिसमें नेक्सीन नामक बहुत ही लचीला प्रोटीन होता है; और केंद्रीय सूक्ष्मनलिकाएँ एक संयोजी पुल से जुड़े होते हैं. अंत में, हर उपतंतु ए में दो भुजाएँ, एक आंतरिक भुजा व एक बाहरी भुजा होती है और दोनो में डायनीन नामक प्रोटीन होता है.

लेकिन एक सीलियम कार्य कैसे करता है? प्रयोगों ने ऐसा दर्शाया है कि सीलिया में हलचल एक सूक्ष्मनलिका पर डाइनिन की भुजाओं के एक ऊपरवाली सूक्ष्मनलिका के पड़ोसी तंतु पर रासायनिक संचालिक ‘‘चालन’’ के कारण होती है, ताकि सूक्ष्मनलिकाएँ एक दूसरे के पीछे स्लाइड करें (चित्र 2). लेकिन, एक पूरे सीलियम में मौजूद सूक्ष्मनलिकाओं के बीच प्रोटीन की आड़ी कडि़याँ सूक्ष्मनलिकाओं को एक दूसरे के पीछ स्लाइड करते समय अधिक दूर नहीं जाने देतीं. ये आड़ी कडि़याँ, इसलिए, डायनिन द्वारा पैदा किए जानेवाले स्लाइड करने की हलचल को पूरे एक्सोनीम के झुकने की गति में बदल देती हैं.

अब, ज़रा बैठ कर, सीलियम के कार्य करने की प्रक्रिया को देखें, और विचार करें कि इसका क्या तात्पर्य है? सीलिया में कम से कम आधा दर्जन प्रोटीन होते हैं, जैसे कि: अल्फा ट्यूबुलिन, बीटा-ट्यूबुलिन, डायनिन, नेक्सीन, स्पोक प्रोटीन, और संयोजी पुल का प्रोटीन. ये सभी मिल कर एक ही कार्य करते हैं, सीलिया की गति, और सीलियम को क्रियाशील करने के लिए इन सभी प्रोटीनों को होना ज़रुरी होता है. यदि ट्यूबुलिन न हों, तो स्लाइड करने के लिए कोई फिलामेंट न होगा; यदि डायनिन न हो, तो सीलियम कठोर और स्थिर बना रहेगा; यदि नेक्सीन या कोई और संयोजी प्रोटीन न हो, तो फिलामेंट के स्लाइड करने पर पूरा एक्सोनीम बिखर जाएगा.

सीलियम में हमें जो दिखाई देता है, तब, वह केवल एक गहन जटिलता नहीं है, बल्कि आण्विक स्तर पर एक इर्रिड्यूसिबल काम्पलेक्सिटी (अर्थात् अलघुकरणीय जटितला) है. याद रहे, कि ‘‘इर्रिड्यूसिबल काम्पलेक्सिटी’’ से हमारा तात्पर्य एक ऐसे उपकरण से है जिसे कार्य करने के लिए कई सारे विशिष्ट घटकों की ज़रुरत होती है. मेरी चूहादानी को काम करने के लिए एक आधार, एक हथौड़ा, स्प्रिंग, पकड़, और पकड़नेवाली छड़ी की आवश्यकता होती है. उसी तरह, सीलियम को अपनी संरचना के अनुसार, काम करने के लिए स्लाईड करनेवाले फिलामेंटों, संयोजक प्रोटीनों, और संचालक प्रोटीनों की आवश्यकता होती है. इसने में से किसी एक की भी अनुपस्थिति, पूरें उपकरण को बेकार कर देगी.

सीलिया के घटक एकल अणु हैं. इसका अर्थ यह है कि इसमें किसी ब्लैक बाक्स की संभावना नहीं है; सीलियम की जटिलता अंतिम और बुनियादी है. जबकि वैज्ञानिक कोशिकीय जटिलता को अभी समझना शुरु ही कर रहे थे, उन्हें यह अहसास हुआ कि जीवन अकस्मात् ही एक ही चरण या कि महासागर से मिले कीचड़ से कुछ चरणों में बन गया, इसलिए अब हम भी यह जान गए हैं कि जटिल सीलियम केवल एक चरण या कुछ चरणों में नहीं बन सकता.

लेकिन क्योंकि सीलियम की जटिलता अलघुरणीय अर्थात् कभी न समाप्त होनेवाली जटिलता है, इस बात की कोई संभावना ही नहीं है कि इससे पहले उसका कोई अल्पविकसित प्रारुप मौजूद हो. चूँकि सीलियम के प्रकार्य के किसी पूर्व प्रारुप का होना संभव नहीं है, इसलिए यह प्राकृतिक चयन के द्वारा पैदा नहीं किया जा सकता है, क्योंकि प्राकृतिक चयन के लिए प्रकार्य के सातत्य की ज़रुरत होती है. जब चुनने के लिए कोई प्रकार्य ही नहीं है तो प्राकृतिक चयन क्या करेगा. हम तो आगे बढ़ कर यह भी कह सकते हैं कि यदि प्राकृतिक चयन द्वारा सीलियम पैदा नहीं किया जा सकता है, तो इसका सीधा सा अर्थ है कि उसकी रचना की गई थी.

जब चुनने के लिए कोई प्रकार्य ही नहीं है तो प्राकृतिक चयन क्या करेगा. हम तो आगे बढ़ कर यह भी कह सकते हैं कि यदि प्राकृतिक चयन द्वारा सीलियम पैदा नहीं किया जा सकता है, तो इसका सीधा सा अर्थ है कि उसकी रचना की गई थी.

एक गैर यांत्रिक उदाहरण

इर्रिड्यूसिबल काम्पलेक्सिटी का एक गैर मशीनी उदाहरण हम उस प्रणाली में देख सकते हैं जो उपकोशिकीय खंडों में अंतरण के लिए प्रोटीन को लक्ष्य बनाती है. किसी खंड में पहुँचने के लिए, जहाँ कि उन्हें एक निर्धारित कार्य करना होता है, कुछ प्रोटीनों में आरंभ के पास ‘‘सिग्नल सीक्यूऐंस’’ अर्थात् ‘‘संकेत अनुक्रम’’ नाम का एक विशेष अमीनो अम्ल अनुक्रम होता है.

राइबोसोम द्वारा प्रोटीनों को संश्लेषित किए जाते समय, ‘‘एसआरपी’’ अर्थात् ‘‘सिग्नल रिकोगनिज़न पार्टिकल’’ या कि ‘‘संकेत मान्यता कण’’ नाम का एक जटिल आण्विक संयोजन, संकेत अनुक्रम से बंध जाता है. इसके कारण प्रोटीनों का संश्लेषण अस्थायी रुप से रुक जाता है. प्रोटीन संश्लेषण के अस्थायी रुप से रुकने के दौरान एसआरपी पार-झिल्ली ग्राही द्वारा बाध्य किया जाता है, जिसके कारण प्रोटीन संश्लेषण दोबारा शुरु हो जाता है और जिसके कारण अन्तः प्रदव्य सम्बंधी जालिका (ईआर) के आन्तरिक हिस्से में प्रोटीन का मार्ग बनता है. ईआर में प्रोटीन के प्रवेश करने पर संकेत अनुक्रम कट जाता है.

कई प्रोटीनों के लिए ईआर उनकी अंतिम मंजि़ल के मार्ग में आनेवाला एक स्टेशन भर होता है. लाइसोसोम में पहुँचनेवाले प्रोटीन जब ईआर में ही होते हैं, तब मैनोस-6-फास्फेट कहलानेवाले कार्बोहाइड्रेट अवशेष उन्हें एन्ज़ाईमों से ‘‘चिन्हित’’ कर देते हैं. ईआर झिल्ली का एक क्षेत्र तब बहुत से प्रोटीनों को एकत्रित करने लगता है; एक प्रोटीन, क्लैथरिन, लेपित पुटिका कहलानेवाले एक तरह के भूगणितीय गुंबद को बनाता है जो ईआर से निकलता है.

गुंबदों में एक ग्राही प्रोटीन भी होता है जो क्लैथरिन और मैनोस-6-फस्फेट समूह के प्रोटीन के साथ बंध जाता है. लेपित पुटिका तब ईआर छोड़ती है, कोशिकाद्रव्य से गुज़रती है, और एक दूसरे विशिष्ट ग्राही प्रोटीन के माध्यम से लाइसोसोम से बंध जाती है. अंत में, कई और सारे प्रोटीनों को शामिल करते हुए, लेपित पुटिका लाइसोसोम से मिल जाती है और प्रोटीन अपने गंतव्य स्थान में पहुँच जाता है.

अपनी यात्रा के दौरान, केवल एक लक्ष्य को पूरा करने के लिए हमारे प्रोटीन दर्जनों बड़े अणुओं से व्यवहार करता है: लाइसोसोम में इसका आगमन. प्रणाली के संचालन के लिए इस परिवहन प्रणाली के लगभग सभी घटकों का होना आवश्यकत होता है, और इसीलिए यह प्रणाली अलघुकरणीय, अर्थाता् इर्रिड्यूसिबल है. चूँकि प्रणाली के सभी घटकों में एक या कई अणु होंते हैं, इसमें किसी ब्लैक बाॅक्स की संभावना नहीं है. परिवहन श्रंखला में एक भी अन्तर आई-सेल नामक आनुवांशिक दोष में दिख सकता है. यह एक एन्ज़ाईम की कमी से होता है जो मैनोस-6-फास्फेट को लाइसोसोम पर लक्षित प्रोटीनों पर रखता है. आई-सेल रोग के लक्षणों में सामान्य विकास दर का लगातार कम होना, शरीर के ढाँचें का विकृत होना, और कम आयु में मृत्यु होना शामिल है.

संचालित करने के लिए प्रणाली के लिए आवश्यक परिवहन व्यवस्था है के लगभग घटकों, इसलिए प्रणाली अलघुकरणीय जो. और एकल वा कई अणुओं के शामिल प्रणाली है की घटकों के के बाद से, लागू करने के लिए कोई काले बक्से वहाँ है.

अणुओं के क्रमिक विकास’’ का अध्ययन

इर्रिड्यूसिबल काम्पलेक्सिटी के उदाहरण प्रचुर संख्या में उपलब्ध हैं, जिसमें प्रोटीन परिवहन, रक्त के थक्के बनना, बंद गोलाकार डीएनए, इलेक्ट्रान परिवहन, जीवाण्विक कशाभिका, एक यूकेरियोटिक गुणसूत्र के दोनों छोर, प्रकाश संश्लेषण, आनुवांशिक जानकारी को क्रम में पहुँचाना, और भी बहुत सी अन्य बातें शामिल हैं. इर्रिड्यूसिबल काम्पलेक्सिटी के उदाहरण आपको जीव रसायन की लगभग हर पाठ्य पुस्तक में मिल सकते है. लेकिन यदि इन्हें डारविनवाद के सिद्धांत द्वारा नहीं समझाया जा सकता है, तो पिछले चालीस सालों से विज्ञानी समुदाय इन आश्चर्यों को क्या समझता आया है?

इस प्रश्न का उत्तर देखने की सबसे सही जगह Journal of Molecular Evolution. है. जेएमई एक ऐसी पत्रिका है जिसे विशेष रुप से इस विषय पर विचार-विमर्श करने के लिए शुरु किया गया था कि आण्विक स्तर में क्रमिक विकास कैसे होता है. इसका वैज्ञानिक स्तर बहुत ऊँचा है, और इसका संपादन क्षेत्र के प्रख्यात लोगों द्वारा किया जाता है. जेएमई के हाल ही में प्रकाशित संस्करण में ग्यारह लेख प्रकाशित हुए थे; जिनमें से, सभी ग्यारह प्रोटीन या डीएनए अनुक्रम के विश्लेषण से जुड़े थे. इनमें से किसी भी लेख ने जैवाण्विक संरचना के विकास की बीच की कड़ी पर विस्तृत नमूने को पेश नहीं किया.

पिछले दस सालों में जेएमई ने 886 शोध पत्र प्रकाशित किए हैं. इनमें से 95 ने जीवन के प्रारंभ के लिए आवश्यक समझे जानेवाले अणुओं के रासायनिक संश्लेषण, 44 ने अनुक्रम विश्लेषण को सुधारने के लिए प्रस्तावित गणितिय नमूने, 20 वर्तमान संरचनाओं के विकासपरक आशयों पर, और 719 प्रोटीन या कि पाॅलीन्यूक्लीओटाइड अनुक्रम विश्लेषण थे. लेकिन, इनमें से कोई भी शोध पत्र जीवाण्विक संरचनाओं में क्रमिक विकास के बीच की कड़ी पर नहीं था. यह बात केवल जेएमई के साथ ही नहीं है. विज्ञान की राष्ट्रीय अकादमी, प्रकृति, विज्ञान, आण्विक जीवविज्ञान के जर्नल  में, या अन्य किसी पेपर में जटिल जीवाण्विक संरचनाओं में क्रमिक विकास के बीच की कड़ी पर कुछ नहीं कहा गया है.

पिछले दस सालों में Journal of Molecular Evolution  ने 886 शोध पत्र प्रकाशित किए हैं. इनमें से ……….. कोई भी शोध पत्र जीवाण्विक संरचनाओं में क्रमिक विकास के बीच की कड़ी पर नहीं था. यह बात केवल जेएमई के साथ ही नहीं है. जेएमई की कार्यवाहियों में, जेएमई, या अन्य किसी पेपर में जटिल जीवाण्विक संरचनाओं में क्रमिक विकास के बीच की कड़ी पर कुछ नहीं कहा गया है.

अणुओं के क्रमिक विकास के साहित्य में अनुक्रम की तुलनाएँ ही छाई रहती हैं. लेकिन केवल अनुक्रम की तुलनाएँ, जटिल जीवरसायनिक प्रणालियों के विकास का जवाब नहीं दे सकतीं हैं. यह दृष्टि कैसे काम करती है पर डारविन के सरल और जटिल आँखों की तुलना से बढ़ कर नहीं है.

डिज़ाइन की खोज

क्या हो रहा है? एक ऐसे कमरे की कल्पना कीजिए जिसमें एक रौंदी हुई, और पैनकेक के समान चपटी देह पड़ी है. एक दर्जन जासूस भीतर आते हैं, अपराधी से जुड़े किसी सूराख की तलाश में एक विशाल आवर्धक लैंस से फर्श की जाँच कर रहे हैं. कमरे के बीचोबीच उस लाश की बगल में स्लेटी रंग का एक विशाल हाथी खड़ा है. जासूस उस मोटी चमड़ी के जानवर की टाँगों के आसपास से होते हुए, लेकिन उससे बचते हुए अपना काम कर रहे हैं. वे उसकी तरफ देखते तक नहीं. कुछ समय बाद कुछ सूराख न मिलने के कारण जासूस निराश और परेशान हो जाते हैं, लेकिन तब भी अपने काम में लगे रहते हैं और फर्श की अधिक गहराई से पड़ताल करने लगते हैं. पता है, पाठ्य पुस्तक में लिखा था ‘‘उस अपराधी आदमी को खोजो’’, इसलिए वे हाथी पर अपराधी होने का शक ही नहीं करते.

जीवन के विकास की व्याख्या में लगे वैज्ञानिकों के कमरे में एक हाथी है. हाथी पर एक लेबल लगा है ‘‘बुद्धिमान डिज़ाइन’’. एक ऐसे व्यक्ति के लिए जो अपनी खोज बुद्धिहीन कारकों तक सीमित नहीं रखना चाहता, एक सीधा सा निष्कर्ष है कि बहुत से जीवरसायनिक प्रणालियों के डिज़ाईन बनाए गए थे. उसका डिज़ाइन प्रकृति के नियमों ने नहीं बनाया था, और न ही वे संयोगवश और आवश्यकता के कारण बने थे. बल्कि, उनकी योजना बनाई गई थी. डिज़ाइन बनानेवाले को पता था कि पूरी होने के बाद प्रणाली कैसी दिखेगी; डिज़ाईन बनानेवाले ने ही प्रणाली का आस्तित्व बनाया था. अपने सबसे बुनियादी स्तर में धरती पर जीवन, अपने अत्यावश्यक घटकों में, बुद्धिमान कार्यवाही का परिणाम है.

एक ऐसे व्यक्ति के लिए जो अपनी खोज बुद्धिहीन कारकों तक सीमित नहीं रखना चाहता, एक सीधा सा निष्कर्ष है कि बहुत से जीवरसायनिक प्रणालियों के डिज़ाईन बनाए गए थे. उसका डिज़ाइन प्रकृति के नियमों ने नहीं बनाया था, और न ही वे संयोगवश और आवश्यकता के कारण बने थे. बल्कि, उनकी योजना बनाई गई थी.

बुद्धिमान डिज़ाइन का निष्कर्ष स्वतः ही आँकड़ों से बहता है-न कि पवित्र पुस्तकों या पन्थीय अवधारणाओं से. यह निष्कर्ष निकालना कि जीवरसायनिक प्रणालियों की योजना किसी बुद्धिमान कर्ता द्वारा बनाई गई थी एक नीरस प्रक्रिया है जिसमें तर्क के किसी नए सिद्धांत या विज्ञान की आवश्यकता नहीं है. यह पिछले चालीस वर्षों के दौरान जीवरसायन के द्वारा किए गए परिश्रम, और अपने दैनिक जीवन में हम डिज़ाईन के निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, इन दोनों बातों से यह निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है.

‘‘डिज़ाइन’’ किसे कहते हैं? डिज़ाइन तो बस हिस्सों की उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था है. वैज्ञानिक प्रश्न है कि हम डिज़ाइन की खोज कैसे करते हैं. इसे करने के कई तरीके हैं, लेकिन यांत्रिक वस्तुओं के लिए डिज़ाइन का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है.

पूरी तरह प्राकृतिक घटकों से बनी प्रणालियाँ भी डिज़ाइन को व्यक्त कर सकती हैं. उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आप अपने दोस्त के साथ जंगल में घूम रहे है. अचानक आपके दोस्त हवा में ऊपर उछल जाता है, और अपने एक पेड़ से जुड़ी एक लता में उसका पैर बंध कर हवा में उलटा लटक जाता है.

उसे वहाँ से उतारने के बाद आप उस फंदे को दोबारा बनाते हैं. आप देखते हैं कि वह लता पेड़ की एक शाखा से लिपटी है, और उसके सिरे ज़मीन से कस कर बंधे हैं. वह एक काँटे जैसी शाखा द्वारा ज़मीन पर अच्छी तरह से लगा था. शाखा पत्तों से छिपी एक दूसरी शाखा से जुड़ी थी, ताकि जब ट्रिगर लता हिले, तो वह काँटेदार छड़ी को नीचे ले आए, और उछालनेवाली लता को मुक्त कर दे. लता के सिरे चूक बंधन के साथ फँदे की तरह थे ताकि वे उस पर आनेवाली चीज़ को पकड़ कर उसे हवा में उछाल सके. हालाकि यह पूरा फँदा पूरी तरह प्राकृतिक चीज़ों से बना था, तो भी आपको पता चल जाएगा कि इसके पीछे एक बुद्धिमान डिज़ाइन है.

बहुत से जीवरसायनिक प्रणालियों के लिए बुद्धिमान डिज़ाइन एक अच्छा स्पष्टीकरण है, लेकिन में यहाँ पर आपको सचेत भी करना चाहूँगा. बुद्धिमान डिज़ाइन के सिद्धांत को सही संदर्भ में लिया जाना चाहिएः यह हर किसी चीज़ की व्याख्या देने का प्रयास नहीं करता है. हम एक जटिल दुनिया में रहते हैं जहाँ बहुत सी अलग तरह की चीज़ें हो सकती हैं. यह पता लगाने के लिए कि कोई पत्थर अपने विशेष रुप व आकार में कैसे आया, भूविज्ञानी बहुत से तथ्यों पर विचार करते हैं: जैसे कि वर्षा, वायु, हिमनदियों का बहाव, काई और शैवाल, ज्वालामुखिय गतिविधियाँ, नाभिकीय विस्फोट, क्षुद्रग्रह की टक्कर, या किसी शिल्पकार के हाथों का कमाल. किसी पत्थर के रुप व आकार के पीछे कोई और कारण हो सकता है और किसी दूसरे पत्थर के रुप व आकार के पीछे कोई और.

इसी तरह, क्रमिक विकासवादी जीवविज्ञानियों को यह बात समझ आई है कि जीवन के विकास के पीछे कई सारे कारक रहे होंगे: जैसे कि एक ही वंश से उत्पत्ति, प्राकृतिक चयन, प्रवास, जनसंख्या का आकार, प्रवर्तक प्रभाव (जीवधारियों की सीमित संख्या के कारण होनेवाले प्रभाव जिनसे नई प्रजाति की शुरुआत हुई हो), आनुवंशिक बदलाव (‘‘निष्पक्ष’’, गैर चयनात्मक उत्परिवर्तन अथवा म्यूटेशन का प्रसार), आनुवंशिक प्रवाह (एक भिन्न जनसंख्या से किसी दूसरी जनसंख्या में जीनों का समाविष्ट होना), संयोजन (एक ही गुणसूत्र में दो जीनों का होना), इत्यादि. कुछ जीवरसायन प्रणालियाँ एक बुद्धिमान कर्ता द्वारा बनाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि बाकी घटक सक्रिय, सामान्य या कि महत्वपूर्ण नहीं थे.

सारांश

अकसर ऐसा कहा जाता है कि विज्ञान को हर उस निष्कर्ष से बचना चाहिए जो अलौकिक को खारिज करता है. लेकिन मुझे यह बात एक बुरा तर्क और बुरा विज्ञान, दोनो ही लगती है. विज्ञान कोई खेल नहीं है जिसमें मनमाने नियमों का प्रयोग करते हुए इस बात का निर्णय लिया जाता है कि कौन सी व्याख्याओं को स्वीकृत किया जाना है. बल्कि यह तो भौतिक सच्चाई के बारे में सही कथन देने का प्रयास है. अभी छः साले पहले ही हमे ब्रह्माण्ड के विस्तार की बात का पता चला था. इस तथ्य ने तुरंत एकल घटना की बात सुझाई – कि किसी समय अतीत में ब्रह्माण्ड ने अपने अत्यंत सूक्ष्म आकार से विस्तार पाना शुरु किया होगा.

हो सकता है कि बहुत से लोगों के लिए यह निष्कर्ष अलौकिक घटना ‘‘उत्पत्ति’’, अर्थात् ब्रह्माण्ड की शुरुआत से जुड़ी बातों के आधिक्य से भरा हो. प्रमुख भौतिकशास्त्री ए.एस.एडीनबर्ग, इस विचार पर अपनी खिन्नता व्यक्त करते हुए शायद अन्य कई भौतिकविदों की आरे से बोले थे:
दार्शनिक रुप से, प्रकृति की वर्तमान व्यवस्था के अकस्मात् आरंभ होने की बात मुझे असंगत लगती है, मेरे विचार से अधिकांश भी ऐसा ही सोचते हैं; और वे भी जो किसी रचनाकार के हस्तक्षेप के प्रमाण का स्वागत करेंगे, वे भी शायद इस बात पर विचार करें कि दूर समय के किसी युग में एकल समापन, परमेश्वर और उसके जगत के बीच वैसे संबंध को नहीं दर्शाता जो बुद्धि को तुष्ट करता हो.

तो भी, महाविस्फोट की परिकल्पना को भौतिकशास्त्रियों ने अपनाया है, और पिछले कुछ सालों में यह एक सफल प्रतिमान सिद्ध हुआ है. बात मुद्दे की यह है कि भौतिकी आँकड़ों के पीछे चली जहाँ उसे अगुवाई करता लग रहा था, हालाकि कुछ लोगों को लगा कि नमूना धर्म की सहायता और आराम ने दिया था. आजकल जीवरसायन विलक्षण रुप से जटिल आणविक प्रणालियों के उदाहरणों को कई गणा बढ़ा देती है, ऐसी प्रणालियाँ जो इस बात की व्याख्या के प्रयास को भी हतोत्साहित करती है कि प्रणालियाँ कैसे उत्पन्न हुई होंगी, हमें भौतिकी से कुछ सीखना चाहिए. डिज़ाइन का निष्कर्ष सहज रुप से आँकड़ों से बहता है; हमें इससे बचना नहीं चाहिए; हमें इसे अपनाना चाहिए और इसे विकसित करना चाहिए.

अपने डिज़ाइन का परिणाम उन जानकारियों के साथ नहीं निकालते जिन्हें हम नहीं जानते, बल्कि उनसे निकालते हैं, जिनसे हम भली-भांति परिचित हैं. डिज़ाइन का निष्कर्ष हम ब्लैक बाक्स की व्याख्या देने के लिए नहीं, बल्कि ब्लैक बाक्स की व्याख्या देने के लिए निकाल रहे हैं.

निष्कर्ष निकालते समय, इस बात का अहसास करना बहुत महत्वपूर्ण है कि हम अपने डिज़ाइन का निष्कर्ष उन जानकारियों के साथ नहीं निकालते जिन्हें हम नहीं जानते, बल्कि उनसे निकालते हैं, जिनसे हम भली-भांति परिचित हैं. डिज़ाइन का निष्कर्ष हम ब्लैक बाक्स की व्याख्या देने के लिए नहीं, बल्कि खुले बाक्स की व्याख्या देने के लिए निकाल रहे हैं. आदिम संस्कृति का एक आदमी किसी गाड़ी को देख कर यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि शायद इसे वायु की शक्ति या कार के नीचे कोई बारहसिंगा उस गाड़ी को चला रहा है, लेकिन जैसे ही वह गाड़ी का ढक्कन खोलेगा, और उसके भीतर एक इंजन को पाएगा तो वह तुरंत समझ जाएगा कि इसे डिज़ाइन किया गया है. इसी तरह जीवरसायन ने भी कोशिका के ढक्कन को खोल दिया है ताकि इस बात की पड़ताल की जा सके कि यह काम कैसे करती है, और हमें पता चल जाता है कि इसे भी डिज़ाइन किया गया है.

19वीं सदी के लोग तब भौचक्के रह गए थे, जब विज्ञान के अवलोकनों द्वारा उन्हें यह पता लगा था, कि जीव जगत के बहुत से लक्षणों के लिए प्राकृतिक चयन के ललित सिद्धांत को कारण ठहराया जा सकता था. 20वीं सदी में बैठे हम लोगों को इस बात की खोज ने भौंचक्का किया है, कि जीव जगत के बहुत से लक्षणों के लिए प्राकृतिक चयन के सिद्धांत को कारण नहीं ठहराया जा सकता है, कि जीवन की बुनियादी प्रणालियों के लिए प्राकृतिक चयन को कारण नहीं ठहराया जा सकता, और यही कारण हैं कि वे बनाए गए हैं. लेकिन जितना जल्दी हो सके हमें इस सदमें से उबरना है और आगे बढ़ जाना है. दिशाहीन क्रमिक विकास का सिद्धांत तो पहले ही मर चुका है, लेकिन विज्ञान का काम अब भी जारी है.

http://www.discovery.org/a/54