एक मसीही कैसे बनें

द्वारा: ATRI कर्मचारी; ©2011

आप अब प्रार्थना द्वारा विश्वास से प्रभु यीशु को ग्रहण कर सकते हैं (प्रार्थना करना परमेष्वर के साथ बात करना है).

परमेश्वर हमारे मन को जानता है अतः वह हमारे शब्दों की अपेक्षा हमारे मन के स्वभाव को अधिक देखता है. नीचे एक प्रार्थना सुझाव रूप में दी गई है. आप अपनी स्वयं की प्रार्थना कर सकते हैं. यह हाथ उठाकर करने वाली या आराधना में उद्धार के लिए आगे चलकर आनेवाल प्रार्थना नही है. यह आपके मन का स्वभाव और प्रभु यीशु में विश्वास है जो आपका उद्धार करता है.

“प्रिय प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने पाप किया है. मैं जानता हूँ कि मैं अपना उद्धार स्वयं नहीं कर सकता. क्रूस पर जान देकर मेरा पाप मोक्षक होने के लिए मैं तुझे धन्यवाद कहता हूँ. मैं विश्वास करता हूँ कि तू मेरे लिए मरा और मैं अपने लिए तेरे बलिदान स्वीकार करता हूँ. मैं यथासंभव अपने आत्म-विश्वास को और अपने हर एक प्रयास को तेरे ऊपर डाल देता हूँ. मैं अपने जीवन का द्वार तेरे लिए खोलता हूँ. और विश्वास के साथ तुझे अपना प्रभु एवं उद्रारकर्ता ग्रहण करता हूँ. मेरे पाप क्षमा करने और मुझे अनन्त जीवन देने के लिए धन्यवाद. आमीन.”

मैं अति प्रसन्न हूँ कि आप इस उत्तर को पढ़ने के लिए तैयार हुए हैं.

परमेश्वर चाहता है कि आप प्रभु यीशु का अनुसरण करें. वह आपको पापों के परिणाम से बचाना चाहता है, आप क्या हैं और आपने क्या कुछ किया है. इससे अन्तर नहीं पड़ेगा.

“परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि अपना एकलौता पुत्र दे दिया कि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए.” (यूहन्ना 3:16)  (3 यूहन्ना: 16).

यदि आप परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से जानना चाहते हैं. यदि आप अपने पापों के लिए परमेश्वर की क्षमा चाहते हैं, यदि आप चाहते हैं कि परमेश्वर आपको अनन्त जीवन का वरदान दे, तो चाहे आपने कितने भी पाप किए हैं वह आपको बचाने के लिए तैयार हैं,चाहे आपने कुछ भी किया हो या आप कब से करते आ रहे हैं.

परमेश्वर के उद्धार का मार्ग सुसमाचार कहलाता है. आपको सुसमाचार से कुछ बातों का जानना और उन पर विश्वास करना अति आवश्यक है.

1. आपको विश्वास करना है कि प्रभु यीशु पुत्र परमेष्वर है. प्रभु यीशु ने कहाः

“इसलिए मैंने तुमसे कहा, कि तुम अपने पापों में मरोगे; क्योंकि यदि तुम विश्वास न करोगे कि मैं वही हूँ तो अपने पापों में मरोगे” (8 यूहन्ना: 24).

प्रभु यीशु के बारे में प्रेरित पौलुस कहता हैः

“जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होकर [ग्रीक शब्द हुपर्चों, जो दर्शाता है की यीशु के पृथ्वी पर आने से पहले ओर उनके जन्म के बाद, वह परमेश्वर के रूप में हमेशा से ओर लगातार मौजूद थे] भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा”  (फिलिप्पियों 2: 6).

यीशु ने कहा,

“जिसने मुझे देखा है उस ने पिता को देखा है” (यूहन्ना 14:09).

“यीशु ने उनसे कहाः मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ; कि पहले इसके कि इब्राहिम उत्पन्न हुआ मैं हू”  (8 यूहन्ना: 58).

यहाँ प्रभु यीशु निर्गमन नामक पुस्तक का संदर्भ दे रहा था निर्गमन 3 :10-15 जिसमें मूसा जलती हुई झाड़ी के निकट परमेश्वर के सामने खड़ा है. मूसा ने परमेश्वर से उसका नाम पूछा ,“तो परमेश्वर ने उससे कहा, ‘मैं जो हूँ सो हूँ’; उसने मूसा से कहा, ‘तू इस्राएलियों से यह कहना, कि जिसका नाम मैं हूँ है, उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है.और उसने मूसा से कहाः सदा तक मेरा नाम यही रहेगा, और पीढ़ी-पीढ़ी में मेरा स्मरण इसी से हुआ करेगा.’” In यूहन्ना 8: 58 में प्रभु यीशु “मैं हूँ,” होने का दावा करता है. वही परमेश्वर जो इस्राएल को मिस्र देश से निकाल कर लाया था.

मत्ती 25 में प्रभु यीशु कहता है कि जगत के अन्त में केवल वही है जो आएगा और मनुश्यों का न्याय करेगा:

“जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा, और सब स्वर्गदूत उसके साथ आएंगे तो वह अपनी महिमा के सिंहासन पर विराजमान होगा और सब जातियां उसके सामने इकट्ठी की जाएंगी; और जैसा चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग कर देता है, वैसा ही वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा.”

अन्तिम दिन मनुश्य को स्वर्ग से अलग करने के लिए प्रभु यीशु को बस यही कहना होगा, “मैं तुझे नहीं जानता.”

“तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा कि मैंने तुमको कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ.”  (मत्ती 7: 23).

यूहन्ना 10 :30-33, यीशु ने कहा,

“मैं और पिता एक हैं  [ग्रीक में, “एक” अलग है-एक व्यक्ति, या सोच में से एक नही है, लेकिन सार या प्रकृति में एक है]. ‘यहूदियों ने उसे पत्थरवाह करने को फिर पत्थर उठाए. इस पर यीशु ने उनसे कहा, कि मैंने तुम्हें अपने पिता की ओर से बहुत से भले काम दिखाए हैं उनमें से किस काम के लिए तुम मुझे पत्थरवाह करते हो? यहूदियों ने उसको उत्तर दिया, कि भले काम के लिए हम तुझे पत्थरवाह नहीं करते, परन्तु परमेश्वर की निन्दा के कारण और इसलिए कि तू मनुष्य होकर अपने आपको परमेश्वर बनाता है.”

यूहन्ना 1 :1-3, 14 कहते हैं:

“आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था. यही आदि में परमेश्वर के साथ था. सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न नहीं हुई. और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया और हमने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा.”

यूहन्ना 1: 18:

“परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा, एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में है, उसी ने उसे प्रगट किया.”

मार्क 14:61,62:

“परन्तु वह मौन साधे रहा, और कुछ उत्तर न दिया; महायाजक ने उससे फिर पूछा, क्या तू उस परम धन्य का पुत्र मसीह है? यीशु ने कहा; हाँ मैं हूँ; और तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान की दाहिनी ओर बैठे, और आकाश के बादलों के साथ आते देखोगे.”

मत्ती 20:28:

“जैसे कि मनुष्य का पुत्र, वह इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए परन्तु इसलिए आया कि आप सेवा टहल करें; और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपने प्राण दे.”

मार्क 2: 5,10,11:

“यीशु ने उन का विश्वास देखकर, उस झोले के मारे हुए से कहा ‘हे पुत्र, तेरे पाप क्षमा हुए’. परन्तु जिस से तुम जान लो कि मनुष्यों के पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का भी अधिकार है. उसने उस झोले के मारे हुए से कहा मैं तुझसे कहता हू; उठ, अपनी खाट उठाकर अपने घर चला जा.”

यही कारण है कि प्रेरित पौलुस कहने योग्य हुआ, “उन्होंने कहा, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा.”  (प्रेरितों 16:31).

2. हमें समझना है और स्वीकार करने के इच्छुक होना है कि पाप ने हमें परमेश्वर से अलग कर दिया है और हमें उसके ज्ञान एवं अनुभव से रोक कर रखता है.

रोमियों 3: 23:”इसलिए कि सब ने पाप किया है ओर परमेश्वर की महिमा से रहित है.”

रोमियों 3: 10: “जैसा लिखा है, कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं.”

यशायाह 53:6: “हम तो सब के सब भेड़ों की नाई भटक गए थे. हम में से हर एक ने अपना-अपना मार्ग लिया; और यहोवा ने हम सब के अधर्मो का बोझ उसी पर लाद दिया.”

रोमियों 06:23: “क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है”  [अब और सदा परमेश्वर से आध्यात्मिक जुदाई].

बाइबल कहती है कि हम चाहे कुछ भी हों हम परमेश्वर के मापदण्ड में खरे नहीं उतरे हैं. हम में से एक भी अपने कर्मों द्वारा परमेश्वर द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा और स्वर्ग में प्रवेश नहीं पाएगा.

यहाँ देखिए हम परमेश्वर की अनिवार्यताओं से कैसे चूक गए हैं. कल्पना कीजिए कि एक शेर पहाड़ों में तीन पुरुषों का पीछा कर रहा है और वे एक गहरी घाटी के मुंह पर खड़े हैं. उनमें से एक कहता है, “उस पार कूदने के अतिरिक्त हमारे पास बचाव का कोई मार्ग नहीं है.” अब समस्या तो यह है कि दूसरा सिरा मीलों दूर है. वह पुरुष पीछे जाकर बहुत तेज भागकर आता है और छलांग लगाता है परन्तु वह दस फुट तक ही कूद पाता है और खाई में गिरकर मर जाता है. दूसरा व्यक्ति और भी अधिक बल लगाकर कूदता है परन्तु वह भी 15 फुट तक ही कूद पाता है और खाई में गिरकर मर जाता है. तीसरा व्यक्ति ओलिंपिक खेलों में लम्बी कूद का विजेता था. वह भी छलांग लगाता है परन्तु उस खाई को पार नहीं कर पाता है. इस कूद में दूसरे दो व्यक्ति पहले से अधिक अच्छे रहे परन्तु कोई भी कूदकर उस खाई को पार नहीं कर पाया. बाइबल कहती है कि हम सबने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित है.

3. मुझे स्वर्ग में जाने के लिए कितना अच्छा/भला होना चाहिए?

यीशु ने कहा,

“क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ, कि यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश न पाओगे.”  (मत्ती 5: 20).

यहूदी जानते थे कि फरीसी और शास्त्री 500 से अधिक नियमों का पालन करके परमेश्वर को प्रसन्न करने के प्रयास में रहते थे परन्तु एक आम मनुष्य जानता था कि वह व्यावहारिक जीवन में परमेश्वर के नियमों का पालन नहीं कर पाएगा. सच तो यह है कि नियमों का पालन करने में फरीसी और शास्त्री भी सफल नहीं थे परन्तु प्रभु यीशु ने अपने श्रोताओं से कहा, “तुम्हारी धार्मिकता जब तक फरीसियों और शास्त्रियों से बढ़कर न हो तब तक तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते.”

फिर कुछ पदों के बाद ही प्रभु यीशु ने कहा, “इसलिए चाहिए कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है”  (मत्ती 5: 48). दूसरे शब्दो में, आप परमेश्वर के तुल्य सिद्ध नहीं है. अतः आपको स्वर्ग जाने का भ्रम न हो जाए. (यदि आपको अपने जीवन की सिद्धता का भ्रम है तो अपने पति/पत्नी या परिवार के सदस्यों से पूछें) आपके विचार में क्या आपका जीवन सिद्ध है? हम में से किसी का भी जीवन सिद्ध नहीं है.

4. बाइबल कहती है कि मरणोपरान्त परमेश्वर आपका न्याय करेगा.

“और जैसे मनुष्यों के लिए एक बार मरना उसके बाद न्याय का होना नियुक्त हैं.”  (इब्रानियों 9: 27).

जब आप परमेश्वर के सम्मुख खड़े होंगे तब वह क्या अपेक्षा करेगा?

“क्योंकि परमेश्वर के यहाँ व्यवस्था के सुनने वाले धर्मी नहीं, पर व्यवस्था पर चलने वाले धर्मी ठहराए जाएंगे.”  (रोमियों 2: 13).

शायद आप अपने संपूर्ण जीवन आराधना में जाते रहे हैं और आपने बाइबल के पाठ सुने हैं, उपदेश सुने हैं परन्तु स्मरण रखें कि बाइबल यह नहीं कहती है कि नियमों का ज्ञान प्राप्त करने वाले परमेश्वर के सम्मुख धर्मी ठहरेंगे अपितु यह कि नियमों का पालन करने वाले धर्मी ठहरेंगे. क्या आपने परमेश्वर की आज्ञाओं/नियमों का सदैव पालन किया है?

5. यदि हमारे न्याय का आधार यह हो कि हमने परमेश्वर की आज्ञाओं और नियमों को माना है या नही तो आपकी स्थिति क्या है?

परमेश्वर ने जब दस आज्ञाएं दी थीं, तब कहा था,”तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना” (निर्गमन 20:03). अब आप कहेंगे, “मैं तो मूर्ति-पूजक हूँ!” परन्तु आप परमेश्वर के स्थान में जो कुछ रखेंगे, वही आपका परमेश्वर हो जाएगा. आपने शायद अपनी ख्याति, खेलकूद, नशा, पैसा, मान-सम्मान या अपनी नौकरी को परमेश्वर से बढ़कर समझा होगा. यदि ऐसा है तो आपने इस आज्ञा का उल्लंघन किया है.

परमेश्वर ने कहा,”तू हत्या न करना”  (निर्गमन 20:13). यहाँ तो आप कहेंगे, “मैंने तो हत्या नहीं की है.” परन्तु प्रभु यीशु कहता है कि यदि आप अपने मन में किसी के प्रति घृणा रखते हैं तो भी आपने इस आज्ञा का उल्लंघन किया है. आपने पिछली बार कब किसी से कहा कि “मैं आपसे घृणा करता/करती हूँ.”

परमेश्वर ने कहा, “तू झूठी गवाही मत दे”  (निर्गमन 20:16). हम जो कुछ भी कहते हैं वह सच होता है या झूठ-“सफ़ेद” झूट नामक कुछ नही होता है. क्या आपने आज झूठ बोला है? आपने पिछले सप्ताह पिछले महीने या अपने जीवन में अब तक कितने झूठ बोले हैं?

परमेश्वर ने कहा, “तू लालच मत कर” (निर्गमन 20:17). किसी और का सिर्फ नहीं करते यह क्योंकि उन्होंने क्या मिले एक तीव्र इच्छा जो coveting. किसी और तरक्की, स्तुति, एक बेहतर ग्रेड, एक अच्छे घर, एक बेहतर कार प्राप्त करता है जब यह परेशान करता है? फिर मिले कानून तोड़ा.

या यह कैसा है: “प्रभु यीशु ने कहा, ‘तू अपने प्रभु परमेश्वर को संपूर्ण मन, संपूर्ण प्राण और संपूर्ण शक्ति से प्रेम कर. यही सर्वप्रथम एवं महानतम् आज्ञा है.'”  क्या आपने इस आज्ञा का उल्लंघन किया है? हम में से ऐसा कोई भी नहीं है जिसने परमेश्वर को अपने संपूर्ण मन, प्राण और शक्ति से प्रतिपल प्रेम किया है. ऐसा है तो आपने प्रभु यीशु के अनुसार सबसे बड़ी आज्ञा का उल्लंघन किया है.

यही कारण है कि प्रेरित पौलुस ने निश्कर्ष निकालाः

“क्योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा; इसलिए कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहचान होती है.”  (रोमियों 3: 20).

6. गलत धारणाः “ठीक है मैंने बहुत पाप किए हैं परंतु मैं परमेश्वर के निकट इस प्रकार पहुँच सकता हूँ.”

Ray Pritchard, अपनी पुस्तक, An Anchor for the Soul, एक व्यंगपूर्ण कहानी सुनाते हैं जो परमेश्वर के समक्ष हमारी स्थिति दर्शाता है.

एक धनवान मनुष्य की कल्पना करें कि वह बहुत ही उत्तम वस्त्र पहने सन्त पतरस के पास स्वर्ग के द्वार पर आता है. वह घंटी बजाता है ओर पतरस कहता है, “हां. मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?”

आदमी ने जवाब दिया,“मैं स्वर्ग में, भीतर आना चाहता हू.”

पतरस ने कहा, “यह तो बहुत ही अच्छी बात है हम तो चाहते हैं कि अधिक से अधिक जन स्वर्ग में आएं. आपको स्वर्ग प्रवेश के लिए 1000 अंक पाने होंगे.”

उस व्यक्ति ने कहा, “यह तो कोई कठिन काम नहीं है. मैं तो संपूर्ण जीवन ही एक भला मनुष्य रहा हूँ. मैं तो नागरिक सेवा में भी रहा हूँ. मैंने 25 वर्ष तक परोपकार में ही अपना पैसा लगाया है और मैं वाई.एम.सी.ए. (युवा मसीही संस्थान) का अध्यक्ष भी रहा हूँ.”

पतरस ने सब कुछ लिख लिया और फिर उससे कहा, “यह तो बहुत ही अच्छा लेखा है. देखेंते है, इससे आपको एक अंक प्राप्त होता है.”

उसके चेहरे पर भय छा गया और उसने कहा, “एक मिनट रुको! अभी और भी है. मुझे विवाह किए हुए 45 वर्ष हो गए हैं और मैं अपनी पत्नी के साथ सत्यनिष्ठ रहा हूँ. हमारे पाँच बच्चे हैं- तीन लड़के और दो लड़कियां. मैंने अपनी पुत्रियों से सदा ही प्रेम किया है और यह सुनिश्चित किया कि उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाऊं. मैंने उनकी अति उत्तम सुधि ली है और वे अब आराम से हैं. मैं एक बहुत अच्छा पारिवारिक मनुष्य हूँ.”

सन्त पतरस ने कहा, “मैं आपसे अति प्रभावित हूँ. आपके जैसे लोग यहाँ अधिक नहीं हैं. यह आपके लिए एक और अंक है.”

वह पसीना पसीना होकर कांपने लगा. उसने कहा, “पतरस आप समझ नहीं पा रहे हैं कि मैं अपनी कलीसिया का सदस्य भी रहा हूँ. मैं प्रत्येक रविवार आराधना में जाता था और सदैव चन्दा भी डालता था. मैं सेवक भी था, गायन मंडली में गाना भी गाता था और सन्डे स्कूल में पढ़ाता भी था.”

सन्त पतरस ने कहाः “आपका लेखा वास्तव में प्रशंसनीय है. आपको एक और अंक मिल गया. हम गिनकर देखते हैं. आपको एक, दो, तीन अंक मिल गए. अब आपको 997 अंक और पाने हैं.”

आश्चर्यचकित वह मनुष्य कांपते हुए घुटने टेक देता है और निराश होकर कहता है, “परमेश्वर के अनुग्रह के अतिरिक्त किसी का भी स्वर्ग प्रवेश संभव नहीं!!”

पतरस उसे देखकर मुस्कुराता है और कहता है, “आपको बधाई हो परमेश्वर का अनुग्रह 1000 अंक का है.”

अधिकांश जनों का सोचना है कि उन्हें प्रभु यीशु में विश्वास करके कर्म भी करना आवश्यक है. उनके विचार में प्रभु यीशु में विश्वास करना, बपतिस्मा पाना, कलीसिया की सदस्यता लेना और भले काम करना, प्रभु भोज लेना आदि भले काम प्रभु यीशु में विश्वास के साथ स्वर्ग प्रवेश के लिए आवश्यक है. इस विचार का बाइबिल सर्वथा खण्डन करती हैः

“तो उसने हमारा उद्धार किया; और यह धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार नए जन्म के स्नान और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा हुआ.”  (टाइटस 3: 5).

“क्योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा, इसलिए कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहचान होती है.”  (रोमियों 3: 20).

7. यदि हमने सिद्ध जीवन नही व्यतीत किया है. यदि हमने परमेश्वर की दस आज्ञाओं में से अनेको का उल्लंघन किया है तो हम परमेश्वर की दृष्टि में ग्रहणयोग्य कैसे ठहरेंगे? वह किस आधार पर हमें स्वर्ग में जाने देगा?

यदि हम परमेश्वर के समक्ष अपने जीवन का लेखा प्रभु यीशु के जीवन द्वारा दें तो? प्रभु यीशु का जीवन सिद्ध था. उसने एक भी पाप नहीं किया था. उसने कहा कि वह सदैव पिता परमेश्वर की इच्छा पूरी करता था. निश्चय ही यदि हम परमेश्वर की उपस्थिति में प्रभु यीशु के जीवन का लेखा दे तो परमेश्वर हमें स्वीकार कर लेगा. सुनकर तो विश्वास नहीं होता है परन्तु परमेश्वर ने प्रभु यीशु के धर्मी जीवन को हमारे लिए वैधानिक रूप से संयोजित होने का वरदान दिया है और उसने हमारे पापों का पूरा दण्ड चुका दिया है. प्रेरित पौलुस कहता हैः

“परन्तु अब व्यवस्था से अलग परमेश्वर की वह धार्मिकता प्रगट हुई है, जिसकी गवाही व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता देते हैं, अर्थात् परमेश्वर की धार्मिकता जो यीशु मसीह पर विश्वास करने से सब विश्वास करने वालों के लिए है. क्योंकि कुछ भेद नहीं” (रोमियों 3: 21,22).

क्या आप समझें? आप और मैं स्वर्ग प्रवेश के लिए परमेश्वर के तुल्य सिद्धता कैसे प्राप्त कर सकते हैं? शुभ सन्देश तो यह है कि परमेश्वर ने स्वयं ही हमारे लिए मार्ग तैयार किया है.

उसने इस प्रयोजन के निमित्त दो काम किए हैं. उसने हमारे पापों का दण्ड चुकाने के लिए हमारे स्थान पर किसी का प्रबन्ध किया और इसके साथ ही हमारे लिए आवश्यक धार्मिक का प्रावधान किया जो हमारे लिए विश्वास करते ही एक वरदान हो जाता है.

हमारे पापों के दण्ड को उठा लेने के लिए जिस मनुष्य का परमेश्वर ने प्रबन्ध किया वह प्रभु यीशु है.

“इसलिए कि मसीह ने भी, अर्थात अधर्मियों के लिए धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दुःख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुंचाए; वह शरीर के भाव से जिलाया गया.”  (1 पीटर 3: 18).

प्रभु यीशु “धर्मी” था. अपनी मृत्यु के द्वारा उसने अधर्मियों के पापों का दण्ड चुकाया अर्थात आपके और मेरे पापों का और हमारा परमेश्वर से मेल कराया. प्रत्येक लोभी विचार, प्रत्येक कठोर शब्द, प्रत्येक लालसा का काम आदि आपके और मेरे सब पाप प्रभु यीशु पर वैधानिक रूप से मढ़ दिए गए थे और उसको हमारे कुकर्मों का पूरा-पूरा दण्ड मिला.

“जो पाप से अज्ञात था, उसी को उसने हमारे लिए पाप ठहराया कि हम उसमें होकर परमेश्वर कि धार्मिकता बन जाए.”  ( ).

ध्यान दीजिए कि हमारे पापों को प्रभु यीशु पर वैधानिक रूप से थोपा गया था. प्रभु यीशु ने कभी पाप नहीं किया था. वह इसलिए मर गया कि हमें उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता प्राप्त हो. प्रेरित पौलुस कहता है, यद्यपि हम पापी हैं हमें प्रभु यीशु का जीवन प्रदान किया जाए.

“परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण बेधा गया, वह हमारे अधर्म के कामों के लिए कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिए उस पर ताड़ना पड़ी, उसके कोड़े खाने से हम चंगे हुए. हम तो सब के सब भेड़ों के समान भटक गए थे, हम में से प्रत्येक ने अपना-अपना मार्ग लिया, परन्तु यहोवा ने हम सब के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया.”  (यशायाह 53:5,6)

8. प्रश्नः परमेश्वर किस आधार पर प्रभु यीशु की धार्मिकता पापियों के हित में गिनता है?

उत्तरः जिस पल आप प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं उसी पल परमेश्वर द्वारा उपलब्ध सिद्ध धार्मिकता आपको दी जाती है.

“परन्तु जो काम नहीं करता वरन् भक्तिहीन के धर्मी ठहराने वाले पर विश्वास करता है, उसका विश्वास उसके लिए धार्मिकता गिना जाता है.”  (रोमियों 4: 5).

ध्यान दें, परमेश्वर अधर्मी और दुष्ट जनों को प्रभु यीशु में विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराता है.

“अर्थात परमेश्वर कि वह धार्मिकता जो यीशु मसीह पर विश्वास करने वालों के लिए है,क्योंकि कुछ भेद नहीं,…”  (रोमियों 3: 22).

9. प्रश्नः यह सच मानने के लिए बहुत ही अच्छा सुनाई देता है. आपके कहने का अर्थ क्या यह है कि मुझे कुछ भी नहीं करना होगा? मुझे बस प्रभु यीशु में विश्वास करना होगा और यह मान लेना होगा कि वह मेरा उद्धार करेगा, मेरे पाप क्षमा करेगा तथा मुझे अनन्त जीवन देगा?

उत्तरः जी हाँ, लिखा है इफिसियों 2: 8,9:

“क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है; और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है, और न कर्मो के कारण, ऐसा न हो की कोई घमण्ड करे.”

अनुग्रह परमेश्वर का निर्मोल वरदान है जो अयोग्य पापियों को दिया जाता है.

10. प्रश्नः परमेश्वर मेरे लिए ऐसा वरदान क्यों देगा?

उत्तरः बाइबल कहती है कि आपके जन्म लेने से पूर्व ही परमेश्वर ने आपसे प्रेम किया और आपकी संगति की मनोकामना की. अतः उसने पहल करके आपके लिए उसका ज्ञान प्राप्त करना संभव बनाया.

“परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा.” (रोमियों 5 8).

“क्यूंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु यीशु मसीह में अनन्त जीवन है.”  (रोमियों 6:23).

“जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हो.”  (इफिसियों 1: 4).

परमेश्वर आपको अपने उद्धार का वरदान देना चाहता है. आप इस वरदान को अर्जित नहीं कर सकते,आपको उसे या तो स्वीकार करना होता है या अस्वीकार करना होता है.

उदाहरणार्थ, यदि किसी लड़की का प्रेमी उसके घर टाँफियों का एक डब्बा लेकर आए और कहे “मैं तुम्हें यह तोहफा देना चाहता हूँ परन्तु तुम्हें मेरी कार धोनी होगी.” हम जानते हैं कि यदि वह लड़की उसकी कार धो दे तो वह उसके लिए तोहफा नहीं हुआ. वह उसका पारिश्रमिक है. उपहार या तोहफा बिना काम किए पाना होता है. परमेश्वर कहता है कि वह ग्रहण करने वालों को अनन्त जीवन का वरदान देना चाहता है- प्रभु यीशु ने तो यह काम आपके लिए पहले से ही कर दिया है.

11. परमेश्वर ने उद्धार के अनेक नहीं; केवल एक ही मार्ग उपलब्ध कराया है.

पापों की क्षमा और अनन्त जीवन पाने का एक ही मार्ग है.

यीशु ने कहा, “मार्ग, सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता ”  (यूहन्ना 14:6).

“किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें.”  (4 प्रेरितों: 12

“इसलिए की मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिए धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दुःख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए; वह शरीर के भाव से जिलाया गया. ”  (1 पीटर 3: 18).

“हे भाइयों, अब मैं तुम्हें वही सुसमाचार सुनाता हूँ जिसका मैंने तुम्हारे मध्य प्रचार किया, जिसे तुमने ग्रहण भी किया और जिसमें तुम स्थिर हो, जिसके द्वारा तुम उद्धार भी पाते हो, इस शर्त पर कि तुम उस वचन को जिसका मैंने तुम्हारे मध्य विचार किया दृढ़ता से थामे रहो- अन्यथा तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ हुआ. मैंने यह बात जो मुझ तक पहुंची थी उसे सबसे मुख्य जानकर तुम तक भी पहुंचा दी, कि पवित्रशास्त्र के अनुसार मसीह हमारे पापों के लिए मरा, और गाड़ा गया, तथा पवित्रशास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा, अतः चाहे मैं हूँ, चाहे वे हों, हम यही प्रचार करते हैं, और इसी पर तुमने विश्वास किया. ”  (१ कुरिन्थियों 15:1-4,11).

“जैसा हम पहले कह चुके हैं, वैसा ही मैं अब फिर कहता हूँ कि उस सुसमाचार को छोड़ जिसे उसने ग्रहण किया है, यदि कोई और सुसमाचार सुनाता है, तो शापित हो.” ”  (गलतियों 1: 9).

12. प्रश्नः मैं अपने जीवन में प्रभु यीशु को ग्रहण कैसे कर सकता हूँ?

उत्तरः हम व्यक्तिगत निमन्त्रण द्वारा प्रभु यीशु को ग्रहण करते हैं.

[यीशु जो बोलने] ::”देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ.यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ.”  (प्रकाशितवाक्य 3: 20).

“क्योंकि, जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा.”  (रोमियों 10: 13).

ध्यान दें, बाइबल कहती है कि प्रभु यीशु आपके दिल के द्वार पर खटखटा रहा है. वह तो द्वार तोड़ने की शक्ति रखता है परन्तु वह ऐसा नहीं करता है. वह आपके जीवन में बलपूर्वक प्रवेश नहीं करेगा. यदि आप उसे भीतर लेना चाहते हैं तो आपको उसके प्रवेश हेतु अपना जीवन खोलना होगा. आप उससे प्रार्थना करके कह सकते हैं कि आप विश्वास द्वारा उसे और आपके लिए किए गए उसके काम को ग्रहण करते हैं.

13. हमें प्रभु यीशु में विश्वास करना होगा.

“उन्होंने कहा, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा.”  (प्रेरितों 16:31).

“”क्योंकि मेरे पिता की इच्छा यह है कि जो कोई पुत्र को देखे ओर उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए; और मैं उसे अंतिम दिन फिर जिला उठाऊँगा  (यूहन्ना 6:40).

“यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, ‘परमेश्वर का कार्य यह है: कि तुम उस पर जिसे उसने भेजा है, विश्वास करो ‘”  (यूहन्ना 6:29).

“अतः जब हम विश्वास से धर्म ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें ”  (रोमियों ).

14. प्रश्नः क्या मुझे प्रभु यीशु को ग्रहण करने के लिए बहुत अधिक विश्वास की आवश्यकता होगी? यदि मुझे आश्वासन न हो कि मेरा विश्वास पर्याप्त है तो?

उत्तरः इस बात को भली-भांति समझ लें कि यह विश्वास की मात्रा नहीं जो आपको उद्धार दिलाती है वरन् यह कि आपका विश्वास किस में है. अतः आपको जो प्रश्न: पूछना है वह यह है “क्या मेरा उद्धारकर्ता सामर्थी एवं विश्वासयोग्य है कि मेरी प्रार्थना सुन कर मेरा उद्धार कर पाए?”

एक दो मंजिल ईमारत में आग लगने की कल्पना करें जिसमें आप ऊपर की मंजिल पर खड़े हैं. आग नीचे से ऊपर की ओर उठ रही है और बचने का कोई मार्ग नहीं है. आप छत की ओर भागते हैं तो आपके वहाँ से अग्निशमन की गाड़ी दिखाई देती है जिसमें से पांच हृष्ट-पुष्ट कर्मी निकल कर एक जाल फैलाते हैं. वे आपको देखकर कहते हैं, “कूदो!”

आपके मनमें पहला विचार आता है, “आप व्यंग करते हैं. मैं दो मंजिल से कैसे कूद सकता हूँ?”

कर्मी कहते हैं, “आपको हम पर विश्वास नहीं? हम आपको संभाल लेंगे?”

आपको इतना अधिक विश्वास तो नहीं कि आंख बन्द करके कूद पड़ें परन्तु डर से कांपते हुए कूद ही पड़ते हैं और कर्मी आपको थाम लेते हैं. यहाँ आप अपने विश्वास के कारण नहीं बचाए गए. आपको बचाने वाले अग्निशमन कर्मी थे परन्तु वे आपको तब ही बचा पाए जब आप कूदे.

अब हम इस कहानी को थोड़ा बदलकर सुनते हैं. एक और व्यक्ति की कल्पना करें जो छत पर खड़ा है और आग की लपटें उसकी ओर उठ रही हैं. वह भी देखता है कि वहाँ अग्निशमन कर्मी खड़े हैं और उसमें आपसे अधिक विश्वास है और वह छत से कूद पड़ता है परन्तु आधी दूरी पार करने के बाद वह देखता है कि उनके हाथ में जाल नहीं है वे केवल एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खड़े हैं. अब उसका विश्वास उसे कहाँ तक बचाएगा? वहाँ अग्निशमन कर्मियों को ही होना है और उनके हाथों में जाल भी फैला हुआ होना आवश्यक है अन्यथा आपका विश्वास आपको बचा नहीं पाएगा.

उद्धार में आपके विश्वास की मात्रा और आपकी विश्वासयोग्यता नहीं गिनी जाती है. सब कुछ आपके विश्वास के कर्ता पर निर्भर करता है. क्या आपने एक सच्चे उद्धारकर्ता पर विश्वास किया है. अतः आपका विश्वास नहीं प्रभु यीशु आपका उद्धार करता है. आपको बस आगे बढ़कर स्वयं को उसके हाथों में छोड़ देना है.

हम जितना अधिक गहराई से विश्वास करें कि हमारे उद्धार को हम तक पहुंचाने के लिए परमेश्वर ने वह सब किया जो आवश्यक है उतना ही अधिक हमारे उद्धार का आश्वासन हमें प्राप्त होगा जब हम उसमें विश्वास करते हैं. हो सकता है कि आरंभ में हमारा विश्वास बहुत कम हो (प्रभु यीशु ने कहा कि राई के दाने के बराबर विश्वास ही पर्याप्त होता है) परन्तु यह जान लें कि समय के साथ हमारा विश्वास भी बढ़ता जाएगा. परन्तु हमारा विश्वास चाहे कम हो या अधिक वह प्रभु यीशु में ही हो. क्योंकि परमेश्वर उन्हीं को ग्रहण करता है जो उसके पुत्र को ग्रहण करते हैं.

15. उद्धारक विश्वास क्या है?

प्रभु यीशु ने कहाः

“मैं तुमसे सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उस का है; और उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है ”  (युहन्ना 5:24).

“क्योंकि मेरे पिता की इच्छा यह है कि जो कोई पुत्र को देखे और उस पर विश्वास करे वह अनन्त जीवन पाए; और मैं उसे अन्तिम दिन फिर जिला उठाएगा.”  (यूहन्ना 6:40).

R.T.Kendall उद्धारक विश्वास की परिभाषा देते हैं:

“हमारा उद्धार इसलिए हुआ है कि हमें इस बात का आश्वासन दिया गया है कि प्रभु यीशु परमेश्वर का पुत्र है- ईशमानव, और कि उसने क्रूस पर बहाए हुए लहू के द्वारा हमारे पापों का दण्ड चुका दिया है… यदि हमें यह आश्वासन प्राप्त न हो कि प्रभु यीशु ने हमारे पापों का दण्ड चुकाया तो उद्धारक विश्वास का आश्वासन भी हमें नहीं मिलेगा. अतः उद्धार का आश्वासन नहीं. ”

16. कौन सा विश्वास उद्धारक नहीं है?

प्रभु यीशु में विश्वास करना उसके बारे में तथ्यों का ज्ञान मात्र ही प्राप्त करना नहीं है कि वह परमेश्वर है और वह आपसे प्रेम रखता है. और कि उसने क्रूस पर मर कर आपके पापों का दण्ड चुकाया तथा आपके क्षमा करने के लिए तत्पर रहता है. सच्चा विश्वास तो यह है कि आप अपने उद्धार के लिए उस पर व्यक्तिगत रूप से पूर्णतः आश्रित रहें. प्रभु यीशु के जीवन मृत्यु और पुनरूत्थान का ज्ञान मात्र ही होना पर्याप्त नहीं है. मैं दो और दो का योग चार मान सकता हूँ परन्तु उन तथ्यों पर विश्वास करने वाले किसी के प्रति भी व्यक्तिगत समर्पण न रखूं.

यहूदियों का एक अधिकारी, नीकुदेमुस एक रात यीशु के पास आया. (यूहन्ना अध्याय 3 में इसका वृत्तान्त है) उसे पूरा विश्वास था कि प्रभु यीशु परमेश्वर की ओर से भेजा गया गुरू था परन्तु नीकुदेमुस के लिए उद्धारक विश्वास हेतु यह पर्याप्त नहीं था. उसे अपने उद्धार के लिए अपने इस विश्वास को प्रभु यीशु में अवस्थित करना आवश्यक था.

प्रेरितों के काम अध्याय 26 में, प्रेरित पौलुस अग्रिप्पा के समक्ष अभियोग के लिए उपस्थित था. राजा अग्रिप्पा प्रभु यीशु के बारे में अनेक तथ्यों से अवगत था परन्तु वह उद्वार से वंचित था. पौलुस उससे कहता है, “हे राजा अग्रिप्पा क्या तू भविष्यद्वक्ताओं का विश्वास करता है? हाँ, मैं जानता हूँ कि तू विश्वास करता है” प्रेरितों 26:27). परन्तु राजा अग्रिप्पा में फिर भी उद्धारक विश्वास उत्पन्न नहीं हुआ क्योंकि उसने अन्त में पौलुस से कहा, “तब अग्रिप्पा ने पौलुस से कहा, तू थोड़े ही समझाने से मुझे मसीही बनाना चाहता है” प्रेरितों 26:28).

बाइबल के अनुसार विश्वास आस्था को समाविष्ट करता है. अतः प्रभु यीशु में विश्वास उससे सम्बन्धित तथ्यों को स्वीकार करना ही नहीं है वरन् स्वयं प्रभु यीशु के हाथों में छोड़ देना है.

उदाहरणार्थ, मैंने कई बार नाएग्रा जल प्रपातो के क्षेत्र में प्रचार किया है. वहां मुझे यह बताया गया कि कभी किसी रस्सी पर चलने वाले ने कनाडा की ओर से अमेरीका तक उस प्रपात पर रस्सी बांघी और चकित दर्शकों के समक्ष उस रस्सी पर चल कर जल प्रपात पार किया. इसके बाद उसने उस रस्सी पर एक पहिये की बोझा उठानेवाली गाड़ी रखी और 225 पाउंड्स की रेत की बोरियां उसमें रखीं तथा उस गाड़ी को उस रस्से पर चलाकर जल प्रपात चलकर पार किया. जब वह लौट कर आया तब वहाँ खड़े हुए लोगों से उसने कहा, “आपमें से कितने सोचते हैं कि में किसी व्यक्ति को उस गाड़ी में बैठाकर उस जल प्रपात के पार ले जाकर फिर सुरक्षित लौटा कर ला सकता हूँ.”

सब ने कहा, “हम मानते है कि आप ऐसा कर सकते हैं.”

उसने कहा, “आप में से कौन सबसे पहले चलेगा?”

अतः आप समझ सकते हैं कि यह कहना कि आप प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं परन्तु पूर्णतः स्वयं को उसके हाथों में दे देना पूर्णतः भिन्न बात है. उद्धारक विश्वास वह है कि आप अपने आपको पूर्णतः प्रभु यीशु के हाथों में दे दे और अपने पापों तथा अपने अनन्त जीवन के लिए उस पर पूर्णतः निर्भर करें.

17. आप अब प्रार्थना द्वारा विश्वास से प्रभु यीशु को ग्रहण कर सकते हैं (प्रार्थना करना परमेष्वर के साथ बात करना है).

परमेश्वर हमारे मन को जानता है अतः वह हमारे शब्दों की अपेक्षा हमारे मन के स्वभाव को अधिक देखता है. नीचे एक प्रार्थना सुझाव रूप में दी गई है. आप अपनी स्वयं की प्रार्थना कर सकते हैं. यह हाथ उठाकर करने वाली या आराधना में उद्धार के लिए आगे चलकर आनेवाल प्रार्थना नही है. यह आपके मन का स्वभाव और प्रभु यीशु में विश्वास है जो आपका उद्धार करता है.

“प्रिय प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने पाप किया है. मैं जानता हूँ कि मैं अपना उद्धार स्वयं नहीं कर सकता. क्रूस पर जान देकर मेरा पाप मोक्षक होने के लिए मैं तुझे धन्यवाद कहता हूँ. मैं विश्वास करता हूँ कि तू मेरे लिए मरा और मैं अपने लिए तेरे बलिदान स्वीकार करता हूँ. मैं यथासंभव अपने आत्म-विश्वास को और अपने हर एक प्रयास को तेरे ऊपर डाल देता हूँ. मैं अपने जीवन का द्वार तेरे लिए खोलता हूँ. और विश्वास के साथ तुझे अपना प्रभु एवं उद्रारकर्ता ग्रहण करता हूँ. मेरे पाप क्षमा करने और मुझे अनन्त जीवन देने के लिए धन्यवाद. आमीन.”

18. आप कैसे जानेंगे कि प्रभु यीशु आप के जीवन में है?

“देख मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास उसके भीतर आकर उसके साथ भोजन करूंगा और वह मेरे साथ”  (प्रकाशितवाक्य 3: 20).

इस पद में प्रभु यीशु कहता है कि जो भी उसे अपने जीवन में बुलाएगा तो वह अवश्य आएगा.प्रेरित यूहन्ना ने लिखा हैः

“मैंने तुम्हे, जो परमेश्वर के पुत्र के नाम पर विश्वास करते हो, इसलिये लिखा है कि तुम जानो कि अनन्त जीवन तुम्हारा है”  (१ यहुन्ना 5: 13).

यदि आपने प्रभु यीशु में संपूर्ण भरोसा रखकर उसमे विश्वास किया है तो धर्मशास्त्र कहता है कि अपना निश्चित जानें, अनुमान न लगाएं, कि अनन्त जीवन आपका है.

“क्योंकि जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा”  (रोमियों 10: 13).

उसकी प्रतिज्ञा है कि जब आप उसमें विश्वास करके उसे पुकारेंगे तब वह आपका उद्धार करेगा.

“परन्तु जितनो ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं ”  (यूहन्ना 1: 12).

यदि प्रभु यीशु आपके जीवन में है तो निश्चित जानिये कि वह आपको कभी नहीं छोड़ेगा.In इब्रानियों 13:05, हम पढ़ें:

“मैं तुझे कभी न छोड़ूंगा, और कभी न त्यागूंगा. ‘”

इन शब्दों को पढ़ने के बाद संभवतः परमेश्वर ने आपसे बात की है और आपसे अनुरोध किया है कि आप प्रभु यीशु में पूर्ण विश्वास करें. यदि ऐसा है वो इसी पल परमेश्वर के पास जाएं. आपके लिए स्वयं की जान देने वाले और आपका उद्धार करने वाले प्रभु को ग्रहण करें. प्रभु को पुकारें और उससे वह वरदान पाएं जो आप अपने यत्न से स्वयं के लिए अर्जित नहीं कर सकते हैं. परमेश्वर ने आपके लिए अपनी जान देने हेतु अपने पुत्र को दे दिया कि आपको पापों की क्षमा मिले और आप उसे व्यक्तिगत रूप में जान पाएं. वह इस विषय में अति गम्भीर है. अतः विश्वास के साथ उससे बातें करें. स्वीकार करें कि आप एक पापी हैं. परमेश्वर से कहे कि आप विश्वास करते है कि प्रभु यीशु आपके लिए मरा और अब वह आपका उद्धार करने की इच्छा रखता है.

“उन्होंने कहा, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा.” (अधिनियमों 16:31)

यदि आपने प्रभु यीशु में विश्वास किया है तो पढ़ें कैसे शुरू करें मसीही जीवन.