ऐतिहासिक तथ्य के रुप में पुनरुत्थान?

द्वारा: Dr. John Weldon; ©2011

‘‘इस बात में मुझे कोई संदेह नहीं कि मैं अभिशप्त लोगों में से एक था.’’

– पीटर हिचेन्स, ब्रिटेन के सबसे प्रसिद्ध पत्रकारों में से एक, पुरस्कार जीतने वाले कोलमनिस्ट (प्रसिद्ध नास्तिक क्रिस्टोफर हिचेन्स के भाई)  The Rage against God: How Atheism Led Me to Faith, पृ. 75

ऐतिहासिक:  ‘‘इतिहास के चरित्र का व उससे संबंधित; इतिहास में हुई घटनाओं पर आधारित या उनसे जुड़ी बात.’’ (अमेरिकी विरासत शब्दकोश, चौथा संस्करण)[1]

तथ्य:  ‘‘सत्य घटनाओं पर आधारित जानकारी या सूचना; किसी के आस्तित्व में होने का प्रदर्शन अथवा किसी के आस्तित्व में होने की जानकारी; एक वास्तविक घटना; एक प्रसंग……कानूनी, कानून में अभियोग का पक्ष जिसमें प्रमाणों द्वारा नियत घटनाएँ सम्मिलित होती हैं.’’(अमेरिकी विरासत शब्दकोश, चौथा संस्करण)  कानून   [2]

ऐतिहासिक तथ्य:  ‘‘ऐसा कुछ जो हुआ था और जिसे प्रमाणीकरण की प्रक्रियाओं द्वारा इतिहासकार ‘‘खोजने’’ की कोशिश करते हैं.”[3]

प्रमाण:  ‘‘किसी की सत्यता को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत, या उसके सत्य में विश्वास पैदा करना.’’ “कानून.  सबूत के परिणाम या प्रभाव, सबूत द्वारा तथ्य की स्थापना या इनकार.” (Dictionary.com; American Heritage dictionary, fourth edition)[4]

‘‘…..यदि यह सत्य है, तो यह इतिहास का सबसे बड़ा तथ्य है, और इसकी प्रासंगिकता के साथ अपने जीवन का समंजन न कर पाने का अर्थ है एक ऐसा नुकसान, जिसकी कभी भरपाई नहीं हो सकती.’’[5]  — स्व. J.N.D. Anderson, LL.D., इस्लामी विधि के विश्वस्तरीय विशेषज्ञों में से एक, केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में इस्लामी व्यवस्था पर प्राचार्य, विधि विभाग के डीन, ओरिएंटल और अफ्रीकी अध्ययन के स्कूल, लंदन के विश्वविद्यालय में उन्नत कानूनी अध्ययन संस्थान के निदेशक, ‘‘वह कौन सी बात है जो मुझे भी मसीह के पुनरुत्थान पर विश्वास करने को प्रेरित करती है?’’ [6]  -Ludwig Wittgenstein, 20वीं सदी के प्रमुख दार्शनिकों में से एक, केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर, 20वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक लेखन में से एक Tractatus Logico-Philosophicus (Logical-Philosophical Treatise) के लेखक; 1900 में Wittgenstein ने दो प्रमुख दार्शनिक आंदोलनों को प्रेरित किया था, जिसमें तार्किक निश्चयात्मकता भी शामिल है. ,

संपूर्ण इतिहास में यीशु मसीह से अधिक प्रभावशाली और कोई नहीं है, और मानव इतिहास में, किसी भी व्यक्ति के जीवन में हुई कोई भी घटना, यीशु के पुनरुत्थान की घटना से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है –  लेकिन यदि ऐसा हुआ था तो. Peter Hitchens को विश्वास हैं कि वह अब अभिशप्त लोगों की संगति में नहीं हैं – और मेरी प्रार्थना है कि जल्द ही यह बात उनके भाई के लिए भी सच होगी.

पिछले 2,000 सालों से, ‘पुनरुत्थान’ ने पूरी दुनिया को कौतुहल में डाला हुआ है.’’……..दुनिया का लगभग हर विद्वान इस बात से सहमत है कि यीशु को रोमियों द्वारा मृत्युदंड दिया गया था, लेकिन यीशु को क्रूस से उतारने के बाद जो हुआ था, वह पिछले 35 वर्षों से, 3400 से अधिक शैक्षिक पुस्तकों और लेखों का विषय रहा है.’’[7]  तर्कबुद्धिपरक धर्मनिरपेक्ष संशयवादी, बाइबल आलोचक, धर्मशास्त्री, इतिहासकार, विश्वासी मसीही और वह हर एक व्यक्ति जिसने इस विषय का अध्ययन किया है इस बात को निर्विरोध स्वीकारता है कि मसीही धर्म बाइबल में मसीह के पुनरुत्थान पर ही स्थिर है अन्यथा उसका पतन निश्चित है. पुनरुत्थान — एक इतनी विरल घटना थी कि वह न तो इससे पहले कभी हुई थी और न ही कभी इसके बाद. वे इस बात पर भी सहमत हैं कि मसीह का पुनरुत्थान एक ऐसी घटना है और थी जो खोजबीन का विषय है और खंडन का स्वागत करती है.

यदि पुनरुत्थान हुआ था, तो सभी धर्मों में केवल मसीही धर्म एक सच्चा धर्म है; यदि ऐसा नहीं हुआ था, तो मसीहत एक धोका और झूठ है. बाइबल इस विषय में बिल्कुल स्पष्ट है. ‘‘और यदि मसीह नहीं जी उठा, तो तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है; और तुम अब तक अपने पापों में फँसे हो.’’ (1 कुरिन्थियों 15:17).

इस बात को देखते हुए कि क्या कुछ दाँव पर लगा है, यह बात बहुतों को हैरान करती है कि पुनरुत्थान एक ऐतिहासिक तथ्य है. पिछली दो सदियों के दौरान, पुनरुत्थान में विश्वास न रखनेवाली इस दुनिया के ऐसे आलोचनात्मक रवैये के बावजूद, – और 2000 सालों से दुनिया के सबसे बेहतरीन संशयवादियों और आलोचनात्मक पांडित्य को देखते हुए, यह बात अति विस्मयकारी है कि पुनरुत्थान के विचार को अब तक खत्म नहीं किया जा सका है. इसके विपरीत, वह स्वतः ही, और ऐतिहासिक प्रमाणीकरण, तार्किक व विधिसम्मत तर्क-वितर्क, पूरी हुई भविष्यद्वाणियों, साक्ष्यों और अन्य प्रमाणों के आधार पर एक ऐसा ऐतिहासिक तथ्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता है, और न ही कभी झुठलाया जा सकेगा.

पूरे 2000 सालों से, इस दुनिया ने इसके विरुद्ध अपनी बौद्धिक युक्तियों को अपनाकर देख लिया है और विफल रही है.

हाल ही में इतिहास के अध्ययन, बाइबल विद्वता, शाब्दिक आलोचना, पुरातत्व विज्ञान, मानव मनोविज्ञान और पुनरुत्थान के विषय पर प्रभाव डालनेवाले संबंधित क्षेत्रों में हुई वैज्ञानिक तरक्की को देखते हुए यह बात विशेष रुप से सत्य ठहरती है. यदि ऐसा नहीं है, तो फिर पुनरुत्थान के ऐतिहासिक तथ्य को झुठलानेवाले नए प्रमाण कहाँ हैं?

यदि मेरे पास खर्चने के लिए 10 लाख डॉलर होते, तो देखिए मैं क्या करता; मैं 100 अखबारों में यह विज्ञापन छापता: ‘‘विद्वान हो या जन साधारण, जो भी यीशु मसीह के पुनरुत्थान को ऐतिहासिक दृष्टि से झूठा प्रमाणित कर सकता है, उसे 10 लाख डॉलर का इनाम, और इतिहास, कानून, दर्शनशास्त्र, तर्क व ज्ञानवाद, बाइबल और मूलग्रंथो के अध्ययन, विज्ञान के दर्शन, गणित, और धर्मशास्त्र के क्षेत्रों के मसीही व लौकिक, तटस्थ विद्वानों के समूह द्वारा उसका आँकलन होगा.’’

मैं यह पैसे हार ही नहीं सकता. क्यों? जैसा कि लंदन के बिशप थॉमस शेरलोक ने एक बार कहा था, कि यह प्रमाणित करना कोई मुश्किल नहीं है कि यीशु मुर्दों में से जिलाया भी गया था या नहीं. यह जानने के लिए बस मुर्दे और जीवित व्यक्ति के बीच के अन्तर को जानने की योग्यता भर चाहिए, जो कि स्पष्ट रुप से उसके चेलों में थी; और बिशप शेरलोक कहते हैं, कि अवश्य ही, हर जीवित व्यक्ति – यहाँ तक कि संशयवादी भी यह मानता है कि उसमें भी यह योग्यता है.’’

संसार के निष्पक्ष बाइबल विद्वानों अथवा आलोचक विद्वानों में से शायद ही किसी को यीशु के क्रूस पर मरने की बात पर संदेह हो; और कब्र के खाली होने की बात को भी बहुत से लोग संदेह की दृष्टि से नहीं देखते हैं, और अधिकांश इस बात से भी सहमत हैं कि चेलों को इस बात का पूरा विश्वास था कि उन्होंने पुनजीर्वित यीशु को देखा था. यीशु के मुर्दों में से जिलाए जाने के अलावा मसीही धर्म के आस्तित्व का कोई तार्किक स्पष्टीकरण नहीं है, और इन 2000 सालों में कोई वैकल्पिक सिद्धांत, आंशिक रुप से भी, ऐतिहासिक आँकड़ों को समझाने में सफल नहीं रहा है. विवाद लगभग यही खत्म हो जाती है.

ऐसे सात प्रमुख बिंदु हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि पुनरुत्थान एक ऐतिहासिक तथ्य है, बस थोड़ी ही देर में हम उन पर चर्चा करेंगे. तो भी, क्योंकि यह एक ऐतिहासिक तथ्य है, इसके आत्मिक प्रभावों को व्यक्तिगत रुप से समझा जाना चाहिए – कि अपने दावे के अनुसार, यीशु मसीह मानवजाति के पापों का प्रायश्चित कर चुका है, कि वह परमेश्वर का पुत्र और यहूदियों का मसीह था और है, और यीशु मसीह को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता स्वीकारने पर हमारे लिए सभी पापों की मुफ्त क्षमा (कुलुस्सियों 2: 13) और अनन्तकाल के लिए धर्मी ठहराये जाने का मुफ्त उपहार (रोमियों 4: 25) और अनन्त जीवन का मुफ्त उपहार उपलब्ध है (रोमियों 06:23; १ यहुन्ना 5 :10-13)

सचमुच सबसे अच्छी खबर, जो संसार ने पहले कभी नहीं सुनी थी, सबसे अच्छी खबर, जो मनुष्य फिर कभी न सुनेगा. यदि लाखों रुपयों के उपहार को ठुकराने की बात तार्किक रुप से अजीब लगती है, तो ज़रा सोचिये कि एक अनन्त महानतम् उपहार – परमेश्वर के साथ अनन्तकाल के लिए मेल-मिलाप, और स्वर्ग में सदा के अनन्त आनन्द, सुख, प्रसन्नता, परमानंद, रोमांच और अपूर्व अनुभवों के उपहार को ठुकराने की बात और कितनी अजीब होगी? लेकिन, एक बार फिर, यदि मसीह मुर्दों में से नहीं जिलाया गया था, तो हम अब भी पापों में हैं; और यह कोई अच्छी दशा नहीं है, हमें तो एक ऐसे परमेश्वर की उपस्थिति में होना चाहिए जो असीम रुप से पवित्र और धर्मी है.

नीचे दी गई जानकारी, आंशिक रुप से नए नियम में उद्घोषित बातों की ऐतिहासिक विश्वसनीयता पर आधारित है, जिसे अब सामान्यतया कई विद्वान आलोचकों द्वारा एक विश्वसनीय ऐतिहासिक दस्तावेज़ मान लिया गया है. आरंभिक पांडुलिपियों के प्रमाण इतने जबर्दस्त हैं कि उनसे कोई और तार्किक निष्कर्ष निकल ही नहीं सकता है. नए नियम के 27 ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अलावा, जिनमें से हरेक दस्तावेज़ मसीह के मुर्दों में से जी उठने की बात सिखाता है, नए नियम से बाहर भी 39 ऐतिहासिक संदर्भ हैं जो यीशु मसीह के जीवन और सेवकाई से जुड़े 110 तथ्यों को प्रमाणित करते हैं.   [8]

जैसा कि प्रतिवादी वकील, Craig A. Parton, JD, सुसमाचारों के लिए कहते हैं ‘‘…. हर मोड़ पर वैधानिक जाँच-पड़ताल का सामना करते…… मूल स्रोत दस्तावेज़.’’ [9]  सांसारिक अग्रणी बुद्धिजीवियों में से एक, Dr. John Warwick Montgomery का तर्क है: ” यदि कोई नए नियम के लेखों को प्राचीन युग के सर्वस्वीकृत अन्य लेखों से तुलना करे तो नया नियम सत्य सिद्ध होता है. कुछ साल पहले, मैं ब्रिटिश कोलंबिया के विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर एव्रुम स्ट्रोंग से इस विषय पर वाद-विवाद कर रहा तो उन्होंने जवाब दिया: ‘ठीक है मैं शास्त्रीय दुनिया की मेरी समस्त जानकारी बाहर फेंक देंगे.’. जिस पर क्लासिक्स विभाग का अध्यक्ष पुकार उठा,: ‘हे भगवान, अव्रुम, नहीं!’ “[10]

सात प्रमुख बिंदु नीचे दिए गए हैं. वैसे ये बातें, आँकड़ों का अध्ययन कर चुके आलोचक विद्वानों द्वारा स्वीकृत और मान्य समझी जाती हैं:

1.पुनरुत्थान से जुड़े इतने सारे तथ्यों पर आलोचक विद्वानों की सहमति है कि उसे नकारना पूरी तरह से तर्क रहित है.

जीवन भर पुनरुत्थान के विषय पर अध्ययन करनेवाले Dr. Gary Habermas को यीशु मसीह के पुनरुत्थान का विश्वस्तरीय विद्वान माना जा सकता है. उनकी खोज इस बात का संकेत करती है कि बहुत आलोचक विद्वान भी यीशु मसीह के पुनरुत्थान से जुड़े कम से कम दर्जन भर तथ्यों को मानते हैं. पुनरुत्थान पर हज़ारों अध्ययन सामग्री पढ़ने के बाद, Dr. Habermas अपना निष्कर्ष देते हुए कहते हैं, कि ‘‘……खाली कब्र के अलावा, वे लगभग पूरी सूची को ऐतिहासिक मानते हैं, वैसे कई तो कब्र के खाली होने की बात को भी मानते हैं……….ये तथ्य लगभग सभी आलोचक विद्वानों द्वारा स्वीकृत ही नहीं है, वरन् इनमें से हरेक तथ्य दूसरे आँकड़ों द्वारा सत्यापित भी हैं.[11]

2. प्रमाणों के आधार पर संशयवादियों का मसीही विश्वास को मानना.

संशयवादी जिन बातों का तार्किक, भावनात्मक या किन्हीं दूसरे कारणों से पुरज़ोर विरोध करते हैं, उन्हें वे आसानी से नहीं मानते. तो भी, पहली सदी से, (और हर सदी में), लौकिक विद्वानों, दूसरे संशयवादियों, और मसीहत के आलोचकों ने पुनरुत्थान से जुड़े प्रमाणों के आधार पर अपना मत-परिवर्तन किया है और मसीह के पक्ष में बहस की है. [12]  यहाँ तक कि मसीह में आस्था न रखनेवाले कुछ यहूदी विद्वानों तक ने मसीह को सदेह के मुर्दों में से जिलाये जाने की बात को माना है-सच में, तर्कों के आधार पर मत-परिवर्तन होना कोई छोटी गवाही नहीं है. आज मसीही विद्वानों की इस बड़ी संख्या में से बहुत से पहले अविश्वासी या संशयवादी थे; यदि मसीह के पुनरुत्थान से जुड़े प्रमाणों में दम न होता, तो आज वे विश्वास में न होते.

वास्तव में, अनन्त स्वर्ग और नरक यदि एक वास्तविकता है, तो अपनी गलती के कारण संशयवादी बहुत बड़े खतरे में हैं. उदाहरण के लिए, James Dietz, यात्री रेल परिवहन के विशेषज्ञ हैं, और जनरल इलेक्ट्रिक कम्पनी के लिए 10 सालों तक रेल परिवहन के लिए प्रणोदन और सहायक नियंत्रण प्रणाली का डिज़ाइन बनाने के बाद, आजकल वे संयुक्त राष्ट्र के बहुत से रेल प्रोजेक्टों के लिए सलाहकार की भूमिका निभा रहे हैं. वह एक तकनीकी पेपर में लिखते हैं कि: मसीहत से जुड़े परिणामों की गंभीरता बहुत अधिक है. बाइबल की बस 25 भविष्यद्वाणियों की संभाव्यता के मूल्यांकन दिखाते हैं कि मसीही धर्म के सही होने की संभावना बहुत अधिक है. सार्वजनिक परिवहन को सुरक्षित बनाने के लिए जोखिम के मूल्यांकन हेतु जिस पद्धति का प्रयोग किया जाता है, इन आँकड़ों के मूल्यांकन में उसी पद्धति का प्रयोग करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि मसीही धर्म पर पूरी गंभीरता से सोच-विचार करना चाहिए, वह भी बिना देर किये.’’[13]

3. कानूनी अपोलोजेटिक्स का वज़न

‘‘कानूनी अपोलोजेटिक्स’’ यीशु के पुनरुत्थान की वास्तविकता से जुड़े तथ्यों को इस रीति से प्रमाणित करने पर केन्द्रित होता है कि न्यायालय की विधि पर उसे सिद्ध किया जा सके. कानून के कई विद्वान मसीह के पुनरुत्थान को कठोर कानूनी मूल्यांकन और अन्य प्रमाणों के आधार पर स्वीकारते हैं. इतिहास में और आज भी, मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान से जुड़े प्रमाणों की सावधानीपूवर्क खोजबीन करनेवाले प्रमुख अनुभवी वकीलों की संख्या बहुत प्रभावित करनेवाली है. तर्क-विर्तक द्वारा प्रमाणों के मूल्यांकन में वकील दुनिया के विशेषज्ञ होते हैं. वे जिस कारण मसीही विश्वास के प्रति इतने आकर्षित होते हैं, वह है प्रमाणों की उपलब्धता. इतिहास के बेहतरीन वकीलों में से एक, Simon Greenleaf कई सैकड़ों वकीलों में से एक है जिन्होंने कानूनी नियमों और अन्य प्रमाणों के आधार पर मसीह के पुनरुत्थान को ऐतिहासिक तथ्य के रुप में स्वीकारा है. प्रतिवादी वकील Craig A. Parton, सांटा बारबरा के एक प्रमुख कानूनी फर्म में साझेदार हैं, और सांटा बारबरा काउंटी बार एसोसिएशन के अभियोग विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष हैं. ऐसे वकीलों की सूची देख कर जिनके प्रमाण-पत्र और विद्वता में कोई दोष नहीं है, वे निष्कर्ष निकालते हैं, ‘‘वे लोग, जो मानते हैं कि यीशु मसीह के पुनरुत्थान के पक्ष में दिए प्रमाण दुनिया की किसी भी सामान्य कानूनी अदालत में स्वीकार्य है, उनकी इस सूची में Hugo Grotius, Matthew Hale, William Blackstone, Simon Greenleaf, Edmund Bennett, Jacques Ellul, Sir Norman Anderson, Lord Hailsham and John Warwick Montgomery जैसे नाम शामिल हैं.’’[14]

4. प्रमाणों के आधार पर मसीह के पुनरुत्थान की स्वीकृति सभी शैक्षिक विषयों के पार तक जाती है.

संसार का ज्ञान सचमुच बहुत प्रभावित करनेवाला है. अधिकांश शैक्षिक विषय पुनरुत्थान की चर्चा में सशक्त सकारात्मकता या नकारात्मकता ले आते हैं. फिर भी, शैक्षिक व अन्य विषयों के अधिकांश विद्वानों और शोधकर्ताओं ने प्रमाणों के आधार पर मसीह के पुनरुत्थान को ऐतिहासिक तथ्य माना है, जिनमें वैज्ञानिक, दार्शनिक, और इतिहासकार भी शामिल हैं. उदाहरण के लिए, कई शैक्षिक विषयों में पेशेवर मसीही समाज हैं. दूसरे शब्दों में, पुनरुत्थान शिक्षा के कई विषयों की जिरह में खरा उतरा है.

5. 2000 साल पहले की दुनिया में, कोई भी इस बात पर विश्वास नहीं करता था कि कोई व्यक्ति शारीरिक रुप से मुर्दों में से जिलाया जा सकता है.

इसलिए, ऐतिहासिक रुप से यह असंभव है कि मसीह के पुनरुत्थान के अलावा भी कोई ऐसा कारण था जिससे मसीही धर्म की शुरुआत हो सकती थी. विस्तारपूर्वक और सावधानी से सोचा गया विचार कि यीशु का पुनरुत्थान ही मसीही धर्म का मुख्य तथ्य है.[15]

6. पुनरुत्थान खंडन करने की क्षमता रखता है.

मसीही धर्म, परखे जाने और पुनरुत्थान (और अन्य माध्यमों) के माध्यम से खंडन करने की क्षमता रखता है. तीसरे दिन के बाद मसीह के पुनरुत्थान का खंडन करना सरल होता, लोगों की सोंच से भी अधिक सरल. जैसा कि Craig A. Parton अवलोकन करते हैं, कि ढेरों अवसर होने के बावजूद, ‘‘पुनरुत्थान के समय उसका खंडन करने के लिखित अभिलेख (रिकॉड) बहुत ही रहस्यमय और अजीब तरह से चुप हैं.’’ [16]  यदि मसीही आंदोलन को मसलने की कोई संभावना रही थी, तो वह तभी के तभी पूरी की जा सकती थी – बलवंत प्रेरणा और आसान अवसर सफलता की गारंटी थे. उदाहरण के लिए, बस वे उसकी लाश को पेश कर देते, और मसीही धर्म का आरंभ ही नहीं होता. या, सचमुच यदि चेलों ने उसकी देह को चुराया था (जैसा कि पहला वैकल्पिक मत कहता है), तो बस चेलों में से किसी एक पर कड़ी कार्यवाही करते और काम बन जाता. यह करना बहुत ही आसान होता, क्योंकि लोग कभी उस बात के लिए इतना अधिक दर्द व यातना (जैसे कि कई बार 40 कोड़े खाना) नहीं सहते जिसके बारे में उन्हें पता है कि वह झूठ है. वास्तव में, मसीह के पुनरुत्थान की एक अकेली बुनियाद पर ही यहूदी और रोमी संस्कृतियों के प्रतिकूल वातावरण में कलीसिया ने बहुत जल्दी और तेज़ी से विकास किया था – और 20-30000 यहूदियों के आरंभिक समूह से बढ़ कर, चौथी सदी में पूरा रोमी साम्राज्य आधिकारिक रुप से मसीही हो गया था. यदि पुनरुत्थान कभी नहीं हुआ था, तो यह बात किसी ऐतिहासिक चमत्कार से कम नहीं है.

7. हर दूसरे सिद्धांत की विफलता इस बात पर बल देती है कि ऐतिहासिक प्रमाणोंवाला कोई भी विश्वसनीय और तार्किक विकल्प कभी नही मिलेगा.

पिछले 2000 सालों के दौरान सामने आया हर वैकल्पिक मत अपनी विद्वता के बावजूद – सच्ची या परिकल्पित – व्याख्या देने में विफल रहा है; साथ ही, संशयी रुप से वे एक दूसरे का खंडन भी करते हैं.[17]  जैसा कि संशयवादी इतिहासकार मानना नहीं चाहेंगे, लेकिन 2000 साल तक हर संभावित वैकल्पिक मतों को पेश करने के बाद भी, उनके मसीही धर्म मसीहत के आस्तित्व को समझाने की एक केवल एक ही पक्की व्याख्या है, और वह है मसीह का मुर्दों में से जिलाया जाना. सच्चाई में, ‘‘तार्किक रुप से पुनरुत्थान के तथ्य की केवल दो प्रकार की व्याख्या या विवेचना संभव हैः पहली, जो स्वयं जिलाया गया व्यक्ति दे, और दूसरी, जो किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी जाए. निश्चय ही, यदि यीशु मसीह मुर्दों में से जिलाया गया था, तो वही इसकी व्याख्या अथवा विवेचना करने की बेहतर स्थिति (वास्तव में केवल वही इस स्थिति ) में है. “[18]

मेरा विश्वास है कि मसीह के पुनरुत्थान को ऐतिहासिक तथ्य सिद्ध करने के लिए ऊपर दिए सात बिंदु पर्याप्त.

तो भी, मैं दो अतिरिक्त बिंदुओं को जोड़ना चाहूँगा. पहला, ऐसे प्रश्नों की एक पूरी कड़ी है जिसका संशयवादी तार्किक और ऐतिहासिक रुप से जवाब नहीं दे सकते हैं. पहला, पुनरुत्थान पर संशयवादियों की आलोचनाओं में हमेशा कमी क्यों रही है? पुनरुत्थान के प्रमुख प्रत्यक्षदर्शियों की विश्वसनीयता को संशयवादी किस बुनियाद पर नकार सकते हैं, जबकि वे – जैसा कि उनके लेखन सिद्ध करते हैं – सच्चे और ईमानदार थे?

दूसरा, हाल ही में दो विद्वानों के लेखन में इसका उल्लेख: NT Wright’s The Resurrection of the Son of God (2003) और Michael R. Licona’s The Resurrection of Jesus: a New Historiographical Approach (2010). The Resurrection of the Son of God The Resurrection of Jesus: a New Historiographical Approach इन पुस्तकों के 1500 से अधिक पृष्ठों में सावधानीपूर्वक किया ऐतिहासिक विश्लेषण है. मैं ऐसा कहने का साहस रखता हूँ कि साफ दिमाग रखनेवाला कोई भी आलोचक, जिसने केवल इन दो पुस्तकों की पड़ताल की है, उसका मत बदले या न बदले, लेकिन वह इनकी विद्वता से अवश्य ही प्रभावित होगा.

क्या पुनरुत्थान के बस इतने प्रमाण हैं? बिल्कुल नहीं. ऐसे कम से कम दर्जनों मुद्दे होंगे जिन पर चर्चा की जा सकती है. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण गवाही स्वयं परमेश्वर की है. यीशु ‘‘और पवित्रता की आत्मा के भाव से मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा है.’’ (रोमियों 1: 4).

‘‘इसी यीशु को परमेश्वर ने जिलाया, जिस के हम सब गवाह हैं.’’ (प्रेरितों. 2:32) (प्रेरितों 2: 32).

‘‘इसलिये परमेश्वर आज्ञानता के समयों में अनाकानी करके, अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है. क्योंकि उस ने एक दिन ठहराया है, जिस में वह उस मनुष्य के द्वारा धर्म से जगत का न्याय करेगा, जिसे उस ने ठहराया है . उसने उसे मरे हुओं में से जिलाकर, यह बात सब पर प्रामाणित कर दी है (Acts 17 :30-31, महत्व दिया गया).

इसकी सच्चाई के निमित्त, बाइबल के मसीही धर्म के पक्ष में ऐतिहासिक, कानूनी, सांस्कृतिक, अनुभवजन्य, मानविकिय, पैगम्बरी, गणितिय, वैज्ञानिक, पत्रकारिता संबंधी, साहित्यिक, दार्शनिक, पार सांस्कृतिक, और कई अन्य प्रमाण मौजूद हैं, जो एक साथ मिलकर विश्वास को पक्का करते हैं.

जैसा कि Dr. Montgomery निष्कर्ष निकालते हैं: यीशु के ‘‘…..संदेश पर भरोसा किया जा सकता है क्योंकि यह प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया जा चुका है.’’ इसका अर्थ यह हुआ कि उसकी बात सुनी जानी चाहिए क्योंकि पूरे मानव इतिहास में और किसी ने स्वयं को मुर्दों में नहीं जिलाया था.

‘‘यदि कोई उस की इच्छा पर चलना चाहे, तो वह इस उपदेश के विषय में जान जाएगा कि वह परमेश्वर की ओर से है, या मैं अपनी ओर से कहता हूँ.’’ (यूहन्ना 7:17).

‘‘ और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने’’ (यूहन्ना 17:3).

‘‘क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए.’’(यूहन्ना 3:16).

नोट्स

1. ↑ http://www.thefreedictionary.com/historical.

2. ↑ “http://www.thefreedictionary.com/fact.

3. ↑ Michael R. Licona, The Resurrection of Jesus: a New Historiographical Approach(2010), 93, citing noted historian Richard Evans; see n. 34.

4. ↑ http://dictionary.reference.com/browse/proof; http://www.thefreedictionary.com/proof.

5. ↑ The Evidence for the Resurrection, अंतर विश्वविद्यालय, 1966 Page 4; available online at:http://www.biblicalstudies.org.uk/article_resurrection_anderson.html.

6. ↑ Cited in John Warwick Montgomery, Tractatus Logico-Theologicus, चौथा संस्करण 2009 पृष्ठ .9, citing Norman Malcolm, editor, Wittgenstein: व्यू की एक ReligiousPoint?, पृ.

7. ↑ Michael R. Licona, The Resurrection of Jesus: a New Historiographical Approach (2010), 611

8. ↑ Gary Habermas, Ancient Evidence for the Life of Jesus, 1984.

9. ↑ Craig A. Parton, Religion on Trial, 2008, 95.

10. ↑ Dr. John Warwick Montgomery, “The Jury Returns: A Juridical Defense of Christianity” [An excerpt from Evidence for Faith Chapter 6, Part 2], Issues Etc. Article archive; Http :/ / www.mtio.com/articles/bissart1.htm.

11. ↑ John Ankerberg, Dillon Burroughs, Defending Your Faith (AMG प्रकाशकों, 2007, 92-93.

12. ↑ For a brief list of converted skeptics see John Ankerberg, John Weldon, Handbook of Biblical Evidences. For over 50 examples of skeptics who have argued on behalf of Christianity or converted to it see, W.R. Miller, Earl Albert Rowell, Philip Schaff, “Skeptics for the Christian Faith!” Classical Apologetics; http://www.classicapologetics.com/special/skepfor.htm.

13. ↑ James Dietz, “Christianity For The Technically Inclined: Risk Assessment, Probability and Prophecy,” Global Journal of Classical Theology  [16 अप्रैल 2004];http://phc.edu/journalfiles/dietz_risk_probability.pdf.

14. ↑ Craig A. Parton, Religion on Trial, 2008, 78.

15. ↑ See Bishop of Durham N. T. Wright’s impressive 700 page text, The Resurrection of the Son of God.

16. ↑ Craig A. Parton, Religion on Trial, 2008, 76.

17. ↑ Gary R Habermas, “Explaining Away Jesus Resurrection: The Recent Revival of Hallucination Theories,” http://www.garyhabermas.com/articles/crj_explainingaway/crj_explainingaway.htm#review).

18. ↑ Dr. John Warwick Montgomery, “The Jury Returns: A Juridical Defense of Christianity” [An excerpt from Evidence for Faith Chapter 6, Part 2], Issues Etc. Article archive;http://www.mtio.com/articles/bissart1.htm.