क्या है ख्रीष्टीयता-मंडनवाद?

द्वारा: Dr. Norman Geisler; ©1999

परिचय

ख्रीष्टीयता-मंडनवाद  मसीही धर्म की शिक्षा की एक शाखा है जो मसीही विश्वास की तर्क युक्त रक्षा से संबन्धित है. यह एक यूनानी शब्द अपोलोगिया  से आता है जिसका अर्थ है कारण या प्रतिवाद देना. ख्रीष्टीयता-मंडनवाद के विरुद्ध आपत्तियों के बावजूद भी इसमें सक्रिय होने के काम में महत्वपूर्ण कारण हैं.

यह परमेश्वर की आशा है.

ख्रीष्टीयता-मंडनवाद करने का सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि परमेश्वर ने हमें इसकी आशा दी है. सबसे युक्त कथन है 1 पतरस 3:15, जो कहता है, कि “पर मसीह को प्रभु जानकर अपने अपने मन में पवित्र समझे. जो कोई तुम्हारी आशा के विषय में तुमसे कुछ पूछे,उसे उत्तर देने के लिए सर्वदा तैयार रहो, पर नम्रता और भय के साथ.” यह हमें सदैव तैयार रहने की चेतावनी देता है. हम ऐसे मनुष्यों का सामना कभी नहीं करेंगे जो हमसे हमारे विश्वास के संबन्ध में कठिन प्रशन पूछे परन्तु हमें सदैव तत्पर रहना है, यदि कभी कोई हमसे प्रशन करें. तैयार रहने का अर्थ यह नहीं कि हमारे पास सब सही जानकारियां हों वरन् यह हमारे विश्वास कोई किसी के साथ बाटने का स्वभाव और तत्परता का स्वभाव है. हमें प्रशन पूछने वालों को कारण बताना आवश्यक है. हमसे यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि सबसे पहले ही सुसमाचार सुनाएं परन्तु जब उन्हें आवश्यकता हो तब हमें उन्हें उत्तर देने के लिए तैयार रहना है.

यह आज्ञा हमारे मन में मसीह को प्रभु का स्थान देने के साथ सुसमाचार सुनाने के कार्य से जुड़ी हुई है. यदि वह वास्तव में हमारा प्रभु है तो हमें उसकी आज्ञा मानना है, “इसलिए हम कल्पनाओं का और हर एक ऊँची बात का, जो परमेश्वर की पहिचान के विरोध में उठती है, खण्डन करते है और हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते है.” (2 कोरी 10:5). इसका अर्थ हे कि हमें अपने मन के और अन्यों के व्यक्त विचारों को जो हमें और उन्हें परमेश्वर के संपर्क से रोकते है, उनको कैद करना है यही ख्रीष्टीयता-मंडनवाद है.

फिलिप्पियों 1:7 में पौलुस इस दौत्य के बारे में कहता है, “सुसमाचार के लिए उत्तर और प्रमाण देने में…” और 16 पद में यह भी कहता हे, “मैं सुसमाचार के लिए उत्तर देने को ठहराया गया हूँ.” इसका आशय स्पष्ट है कि सुसमाचार का पक्षधर ऐसे स्थानों में होता है जहां उसे अन्यों का सामना करना होता है और सुसमाचार की रक्षा करना होता है.

यहूदा ३ में लिखा हे, “हे प्रियों,जब मैं तुम्हें उस उद्धार के विषय में लिखने में अत्यन्त परिश्रम से प्रयत्न कर रहा था जिसमें हम सब सहभागी है; तो मैं ने तुम्हें यह समझाना आवश्यक समझा है कि उस विश्वास के लिए पूरा यत्न करो  जो पवित्र लोगों को एक बार ही सौंपा गया था.” यहूदा जिन लोगों को पत्र लिख रहा था उन्हें झूठे शिक्षक भरमा रहे थे. अतः वह उन्हें अपने विश्वास की रक्षा करने (यत्न करने) के लिए प्रोत्साहित करता है, वह विश्वास जो प्रभु यीशु द्वारा प्रकट किया गया था. पद 22 में यहूदा हमारे स्वभाव के निमित्त एक महत्वपूर्ण बात कहता है “ उन पर जो शंका में हैं दया करो…”

तीतुस 1:9 मसीही प्रमाणों के ज्ञान को कलीसियाई अगुआई के लिए अनिवार्य कहता है. कलीसिया के धर्मवृद्ध “ विश्वास योग्य वचन पर जो धर्मोपदेश के अनुसार है स्थिर रहे कि खरी शिक्षा से उपदेश दे सके और विरोधियों का मुंह भी बन्द कर सके.” पौलुस भी इस कार्य में हमारे स्वभाव के प्रति संकेत करता है-2 तीमु. 2:24-25, “प्रभु के दास को झगडालू नहीं होना चाहिए ,पर वह सब के साथं कोमल और शिक्षा में निपुण और सहनशील हो. वह विरोधियों को नम्रता से समझाए, क्या जाने परमेश्वर उन्हे मन फिराव का मन दे कि वे भी सत्य को पहचानें.” अविश्वासियों के प्रश्नों का उत्तर देते समय विश्वासी के साथ बुरा व्यवहार किया जाएगा और उसपर धीरज खो देने की परीक्षा आएगी परन्तु हमारा मुख्य लक्ष्य है कि वे सत्य का ज्ञान ग्रहण करें और वह है कि प्रभु यीशु उनके पापों के लिए मरा. ऐसा महत्वपूर्ण कार्य हाथ में हो तो हमें इस आज्ञा के पालन से चूकना नहीं चाहिए.

तर्क की यह मांग है.

परमेश्वर ने मनुष्यों को अपने स्वरुप में इसलिए बनाया कि वे उसके स्वरुप का अंश होने के कारण तर्क सम्मत सही प्रकार से सोचे और विचार करें (उत्पत्ति. 1:27; cf कुलु 3:10). निश्चय ही, तर्क के कारण ही मनुष्य “क्रूर जानवर” से अलग होते हें ( यहूदा १०). परमेश्वर अपने लोगों से चाहता हे कि वे वाद विवाद करें (यशा 1:18) कि वे सत्य को असत्य से अलग पहचान सके(1 यहुन्ना 4:6) और उचित एवं अनुचित में भेद कर सकें (इब्रा 5:14). तर्क का मूल सिद्धांत यह है कि उसमें विश्वास के लिए पर्याप्त आधार है. जो विश्वास परखा न गया हो वह विश्वास नहीं.

सोक्रेटस का कहना था, “ जो जीवन परखा न गया हो वह जीने योग्य नहीं है.” वह निश्चय ही यह भी कहना चाहता होगा कि जो विश्वास परखा न गया हो वह विश्वास करने योग्य नहीं. अतः विश्वासियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपनी आशा का तर्क प्रस्तुत करें. यह उस महान आशा का एक भाग है जिसमें हमें अपने सारे मन और सारे प्राण से परमेश्वर से प्रेम करने को कहा गया है(मत्ती 22:36-37).

दुनिया को इसकी जरूरत है.

प्रमाणों के अभाव में मनुष्य द्वारा अस्वीकार करना उचित ही है क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्यों को बुद्धिजीवी बनाया है. इसलिए चाहता है कि वे तर्क युक्त जीवन जीए-कूदने से पहले सोंचे. इसका अर्थ यह नहीं कि विश्वास का कोई महत्त्व नहीं है परन्तु परमेश्वर चाहता है कि हम प्रमाणों के प्रकाश में विश्वास का कदम उठाएं न कि अन्धकार में कूद पड़ें.

सत्य का प्रमाण विश्वास से पहले होना चाहिए. कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति लिफ्ट में पैर नहीं रखता जब तक कि उसके पास तार्किक प्रमाण न हो कि वह ऊपर जाएगा. कोई भी बुद्धिमान मनुष्य ऐसे वायुयान में नहीं बैठेगा जिसका एक पंख टुटा हुआ हो और भीतर धुंए की गन्ध हो. मनुष्य विश्वास के दो क्षेत्रों को मानता है: “किसी बात पर”   किसी बात में. विश्वास है कि  सबूत देता हे और विवेकशील तरीके से भरोसे जिसका जरुरत हे स्थापित करने को किसी बात में. एक बार “किसी बात पर”  जाहिर होता हे, तो कोई भी अपना भरोसा रख उसमें  सकते हें. इसलिए, एक समझदार व्यक्ति सबूत चाहता हे की परमेश्वर का अस्तित्व हे अपना भरोसा परमेश्वर पर करने से पहले. समझदार अविश्वासी अपना भरोसा यीशु पर करने से पहला इस बात का सबूत चाहते हें की वो परमेश्वर का पुत्र हे.