धर्मविज्ञान, ख्रीष्टीयता-मंडनवाद और सुसमाचार प्रचार

द्वारा: Dr. John G. Weldon; ©2011

धर्मशास्त्र, ख्रीष्टीयता-मंडनवाद और सुसमाचार प्रचार – स्वर्ग और नरक

1 कुरि 10:31 इसलिए…जो कुछ तुम करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए करो.

मैं बहुत समय से यह विश्वास करता हूँ कि धर्मविज्ञान और ख्रीष्टीयता-मंडनवाद कलीसिया के आत्मिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है परन्तु, दुर्भाग्यवश, इन्हें प्राय: उपेक्षित किया गया है. जिसके कारण सुसमाचार प्रचार को हानि पहुंचती है. विडम्बना यह है कि अनन्त स्वर्ग और नरक एक ही संतुलन में लटके हुए हैं. परमेश्वर के अतिरिक्त ये दो क्षेत्र भी ब्रह्माण्ड में भारी सत्य है.मेरी प्रार्थना यह है कि जो भी इस लेख को पढ़ रहा है, उसे अगुवाई मिले कि वह प्रार्थनापूर्वक एक उचित और ईश्वरीय मार्ग निकाले जिसके द्वारा कलीसियाओं को परमेश्वर की महिमा के लिए इन सत्यों के पालन में प्रोत्साहन के निमित सहायता मिले.

परमेश्वर सर्वोच्च सत्य और इस ब्रह्माण्ड का आश्चर्य है, अनन्त सत्य. अनन्त सत्य! परमेश्वर के बिना स्वयं स्वर्ग भी किस काम का? हालाँकि, स्वर्ग का जो अस्तित्व है वह असीमित रूप में उबाऊ दशा का विपरीत है, परमेश्वर के बिना तो अनन्त जीवन के लिए स्वर्ग उबाऊ हो जायेगा.परमेश्वर सब कुछ है और उसे हमारे लिए भी सबकुछ होना चाहिए, इसलिए जोनाथन एडवर्ड का धर्मविज्ञान और जॉन पाइपर का “क्रिस्टियन हेडोनिस्म” (सतही ग़लतफहमी के जोखिम के बावजूद) ऐसे महत्वपूर्ण है. (देखें DesiringGod.org). दोनों ही परमेश्वर की महिमा के लिए पवित्र और पूरी रीति से परमेश्वर केंद्रित हैं.

नि:सन्देह यही तो, धर्मविज्ञान है, परमेश्वर के बारे में अध्ययन, अनन्त महिमामय परमेश्वर का अध्ययन, जिसमें उसके द्वारा उद्धार पाए हुओं के पास ये अविश्वसनीय अधिकार है कि वे सदा आनन्दित रहें और हमारी कल्पना से परे – हमेशा के लिए इसकी सहभागिता प्राप्त करते रहे. जिस प्रकार Jonathan Edwards इसे कहते हैं, “परमेश्वर की महिमामय श्रेष्टता और सौंदर्य ही है जो अनन्तकाल के लिए पवित्र जनों के मन को मनोरंजित करते रहेंगे और परमेश्वर का प्रेम उनके लिए सदा का उत्सव बन जाएगा.”[1] और Dr. Piper इस विषय में समीक्षा करते हैं, “हम इसीलिए जीवित भी हैं कि परमेश्वर की महिमा को प्रकट करें. मानव जीवन पूरा का पूरा परमेश्वर के बारे में है.मनुष्य होने का अर्थ यही है. यह हमारा सृजित स्वभाव है कि हम परमेश्वर को अधिकाधिक प्रकट करें. हमारी महिमा इसी में है कि हम परमेश्वर की महिमा की आराधना करें…. मानव उसके उद्देश्यों को पूरा न करना उस तत्व की छाया मात्र ही होगी जिसे अपने में बनाए रखने के लिए हम सृजे गए हैं. सब बातों से बढकर परमेश्वर में आनंद द्वारा उसकी महानता को प्रकट न करना उस संगीत की मात्र गूंज है जिस संगीत के लिए हम सृजे गए हैं.”[2]

पवित्र जनों के अनन्त आनन्द की महिमा का एक अंश यह है कि परमेश्वर के साथ आनन्द,प्रेम में अधिकाधिक बढना ही पवित्र जनों की अविनाशी महिमा है. ठीक इसी प्रकार दण्ड के भागियों की अनन्त पीड़ा का भाग है कि उनके लिए हर एक ईश्वरीय बात और सिद्ध मानवता में सदाकालीन घटी है.

हालांकि, मुझे विश्वास है कि धर्मविज्ञान, ख्रीष्टीयता-मंडनवाद और सुसमाचार प्रचार कलीसिया के लिए तीन मुख्य विषय हैं, इनमें से केवल एक ही सदा के लिए रहेगा क्योंकि अन्य दो की फिर आवश्यकता नहीं होगी. इस जीवन में, केवल इसी जीवन में हमें सौभाग्य प्राप्त है जिसमें कि हम ख्रीष्टीयता-मंडनवाद और सुसमाचार प्रचार का आनन्द ले- अनन्तकाल में इनकी आवश्यकता नहीं होगी. बस इतना, सम्पूर्ण अनन्तकाल में हमारे पास केवल एक ही जीवन है जिसमें कष्टों के बीच में हमें परमेश्वर की महिमा करना है. परमेश्वर की महिमा के लिए हम इन दोनों का लाभ उठाएं.

कल्पना करने का प्रयास करें कि परमेश्वर की उपस्थिति में स्वर्ग कैसे होगा. परमेश्वर के अद्भुत कार्य और उसके प्रेमी,बुद्धिमान,आनन्द दायक,मनोरंजक,पवित्र और सिद्धता के आश्चर्य और महिमा की खोज के करोडों वर्षों  बाद भी ऐसा नही हैं कि हमने परमेश्वर की सतह को खरोंचा है–सच तो यह है कि हम उसकी सतह को भी खरोंचा  नहीं पाए है वरन् कहा जाएतो हम कभी भी खरोंच नही पाएंगे. यद्यपि हम “पूर्ण रूपेण जान पाएंगें जैसे कि हम जाने गए है.” परन्तु जिसे जानना शेष रह गया है वह अनन्त है.

कुछ मिनट के लिए सोचो अनंत परिमित के बीच अथाह दूरी. समय ले लो – मैं मिले . वा सबसे अद्भुत हैं अनुभवों से अधिक उदात्त एक दूसरे उसमें स्वर्ग जो एक हजार जन्मों उसमें कहना है कि – मैं स्वर्ग जो यह जीवन की पेशकश कर सकता सबसे अच्छा अनुभव सौ से हजार गुना बेहतर जो कि क्या कह संप्रेषित करने की कोशिश कर सकते हैं , यह अभी भी विशालता से कम होना होगा. परमेश्वर जो जो होने के लिए साथ हो लिए उसमें स्वर्ग जो होने के लिए. गोदभराई परे खुश. “उसकी खुशी जो परमेश्वरs महिमा का एक बड़ा हिस्सा …. खुश होने के लिए गौरवशाली जो होना करने के लिए …. परमेश्वरs महिमा वह हमारे सोची imaginings से परे खुश जो तथ्य यह है कि कितना उसमें होते हैं.”[3] 

“असीमित शक्ति एवं मनोवेग के साथ परमेश्वर का आनन्द लेने के योग्य होने की कल्पना कीजिए.”[4]

“परमेश्वर के राज्य का मुख्य प्रतिफल, सब वस्तु में और सब वस्तुओं से बढकर यह है कि हम उसके राज्य में उसकी महिमा को देखे और परमेश्वर की प्रसन्नता में उस महिमा का आनन्द ले…स्वयं परमेश्वर का आनन्द…यही आत्मा की परिपूर्णता है-एकमात्र आशीष जिसके परे और भी अधिक अच्छे की कल्पना नही की जा सकती है,मन में भी सोचा नही जा सकता है,एक

सदाकालीन,अनन्त,व्यक्तिपरक,पिता परमेश्वर और पुत्र परमेश्वर के मध्य पवित्र आत्मा परमेश्वर द्वारा प्रवाहित प्रेम एवं आनन्द की पवित्र उर्जा और युही मुक्तिप्राप्त मनुष्यों की आत्मा को असीम एवं अनन्त आनन्द से भर देता है.”[5]

नि:सन्देह इसका विपरीत नरक के बारे में सच है. नरक अनन्त पवित्र के द्वारा आवश्यक सिद्ध न्याय की संरचना है. वह इससे न तो कम है और न ही अधिक है. यद्यपि बाइबल में व्यक्त नरक की पीड़ा से भी अधिक अनन्त दण्ड की धारणाएँ है. जो परमेश्वर के अनन्त न्याय के कारण कभी व्यावहारिक नहीं हो सकते क्योंकि परमेश्वर जो चाहता है, वह पूर्णरूपेण निष्पक्ष तथा न्याय सम्मत होता है. नरक पाप की भयानकता के अनुकूल अनन्त पवित्रता के परमेश्वर के समक्ष अनिवार्य सिद्ध दण्ड है. अनन्त जीवन में प्रवेश करने के बाद हर एक मनुष्य इस तथ्य से अवगत होगा,चाहे वह नरक ही में क्यों न हो, परन्तु विशेष करके स्वर्गवासी आत्माएँ जो परमेश्वर के दृष्टिकोण से सब कुछ देख पाएंगे. नरक को उसके योग्य सिद्ध न्याय के लिए स्वीकार किया जाएगा जो वास्तव में वह है.

परन्तु स्वर्ग भी परमेश्वर के बिना,अभी या आगे जाकर, नरक या नरक के तुल्य ही होगा. परमेश्वर के बिना इस जीवन में जो सर्वोतम वस्तु है,वह है विघ्नों से परिपूरित नरक क्योंकि परमेश्वर सब कुछ है इसलिए क्या हम परमेश्वर के बिना अनन्त जीवन बिताने की कल्पना कर सकते है चाहे हम स्वर्ग में ही क्यों न हों? वह तो एक भयानक समय होगा.सबसे अधिक भव्य और अनन्त समय की कल्पना कीजिए तथा उसमे से परमेश्वर को सदा के लिए अलग कर दीजिए तो आज नहीं तो कल वह नरक होगा या कम से कम नरक के समान होगा.

अब कल्पना कीजिए कि बाइबल जिस नरक का वर्णन करती है वह वास्तव में कैसा स्थान होगा. यहाँ समझ रखें कि नरक की वास्तविकता बाइबल के विवरण से कही अधिक भयानक है क्यों कि बाइबल के शब्द सीमित एव सिद्धता से रहित है. कहा जाता है कि विचार हवा में उड़ते है और शब्द पैदल चलते है. यदि किसी ने इस जीवन में पीड़ा की चरम सीमा का अनुभव किया है चाहे वह सिर फटने वाला दर्द हो या गुर्दे का दर्द हो, असाध्य दाद, हड्डी का कैंसर या अन्य कोई भी अति कष्टकारी रोग हो. अब इस पीड़ा को एक लाख गुणा अधिक बढा दीजिए या नरक के एक पल की कल्पना कीजिए जो आपके एक हजार जीवन काल की भयानक से भयानक पीड़ाओं का कुल योग से कही अधिक हो. परन्तु यह पीड़ा कैसी भी भयानक हो,नरक की शरीरिक पीड़ा,नरक की मानसिक एव आत्मिक पीड़ा की तुलना में कुछ भी नहीं है.

नरक एक अपश्चातापी मनुष्य, जिसने स्वेच्छा से अपना अनन्त जीवन चुना, उस पर अनन्त क्रोध द्वारा उंडेला गया दण्ड तो है वरन् साथ साथ ही परमेश्वर की अनन्त अनुपस्थिति भी है. इस शरीरिक,मानसिक तथा आत्मिक दण्ड के बिना भी यदि कोई कल्पना में भी परमेश्वर की अनुपस्थिति का बोध करें तो वह वर्णन से परे भयानक एव पीड़ा दायक होगा.

मनुष्य यथार्थ में अनन्त प्रेम एवं आनन्द के परमेश्वर की उपस्थिति से अनन्तकाल के लिए अलग हो जाने के बारे में सोच भी नहीं सकता,विशेषकर के इस वास्तविकता का शणिक अनुभव पाकर भी. परन्तु मन फिराव और मसीह में विश्वास के बिना एक दिन वे इसी प्रकार बाहर कर दिए जाएंगे और उसपल से अनन्त काल तक कोई आशा न रहेगी.

यदि अनंत महिमा को पाना या खोना तथा अनंत पीड़ा को खोना है या पाना है आध्यात्मिक शिक्षा (परमेश्वर का अध्ययन),ख्रीष्टीयता-मंडनवाद (सत्य की रक्षा), सुसमाचार प्रचार (खोये हुओं को बचाना) के महत्व की वास्तविकता का बोध न करवा पाए तो फिर ऐसा क्या है जो यह बोध करवाएगा?

प्रस्तावित अध्ययन

(स्मरण रखें, जैसे धरती के लिए स्वर्ग हे, वैसे ही दुसरे किताबों के लिए पवित्र शास्त्र है.)

Theology – John Piper, The Pleasures of God Jonathan Edwards, The End For Which God Created The WorldReligious Affections Arthur Custance, The Sovereignty of Grace.

Apologetics – Timothy Keller, The Reason for God: Unbelief in an Age of Skepticism Douglas Groothius,Christian Apologetics: a Comprehensive Case for Biblical Faith.

Evangelism – Kirk Cameron, Ray Comfort, The School of Biblical Evangelism: 101 Lessons: How To Share Your Faith Simply, Effectively, Biblically.… The Way, Jesus Did; Jonathan Edwards, Sinners In The Hands of An Angry God

नोट्स

1. ↑ Cited in John Piper, Pierced by the Word 2003,

2. ↑ Ibid., 26, emphasis original

3.  John Piper, The Pleasures of God, 2000, 26

4. ↑ Ibid.

5. ↑ John Piper, The Pleasures of God, 2000, 311-12