परमेश्वर

द्वारा: Dr. John G. Weldon; ©2012

परिचय

मानवीय भाषा में एक-अत्यधिक महत्वपूर्ण शब्द है, परमेश्वर क्योंकि यह शब्द संपूर्ण जगत में एक मात्र महत्वपूर्ण व्यक्ति का परिचय देता है.

तर्क के आधार पर तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि परमेश्वर दो हों अर्थात दो सर्वोच्च व्यक्तित्व! सच्चा परमेश्वर तो एक ही हो सकता है, चाहे मनुष्य नानाविध देवी-देवताओं का दावा करें. अन्य सब सर्वोच्च, अनादि र्इश्वर परमेश्वर नहीं हो सकते. उदाहरणार्थ, जैसे कि किसी के पास कोर्इ भी अंग दो नहीं हो सकते उसी प्रकार अनादि व्यक्तित्व भी दो नहीं हो सकते.

अत: सर्वोच्च, अनन्त एवं सिद्ध व्यकितत्व एक ही हो सकता है.[1]   यदि हमारी सहज बुद्धि कुछ कहे तो वह है ”निश्चय ही यह है,“ तर्क के आधर पर स्पष्ट होता है कि अनन्त, स्व-अस्तित्ववान आत्म-निर्भर अनादि व्यक्तित्व जिस पर अन्य सब कुछ निर्भर है, एक ही हो सकता है.[2]

यदि एकमात्र परमेश्वर को मान लिया जाए तो स्वभाविक है कि उसका प्रतिद्वंदी दूसरा नहीं है, क्योंकि अन्य कोई भी नहीं है. वे है ही नहीं क्योंकि उनका असितत्व नहीं है.

एक महान आनन्द

परमेश्वर से सदा के लिए विलग प्राणी, हमारा एक महान आनन्द एवं अनन्त हर्षातिरेक यह है कि इस सच्चे एवं एकमात्र सिद्ध परमेश्वर को घनिष्ठता से जानें  उसकी सहभागिता में रहें साथ  कि सदा सर्वदा उसके प्रेम पात्र बने रहें और उस अनन्त आनन्द वरन स्वयं उसे परिभाप का असीमित आनन्द लें..[3]  (परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से जानने के लिए पढ़ें Dr. J. I. Packer, Knowing God   God’s Words.)

कल्पना करने का प्रयास करें कि एक आनादि एवं सिद्ध परमेश्वर का आनन्द लेना और उसकी अनन्त महिमा मे मगन हो जाना कैसा होगा. यह अनादि-अनन्त एवं सिद्ध परमेश्वर कौन है? परमेश्वर जो अपने गुणों में अचूक हैं, असीम प्रेम, अनन्त आनन्द, अनन्त महिमा, अविनाशी शुद्धता, अविनाशी धार्मिकता, अनन्तहीन करुणा, अनन्त पवित्रता, अनन्त सत्य, अनन्त भलाई, असीम दया, अविनाशिता, अपरिवर्तनीयता, असीम ज्ञान, सर्वव्यपिता आदि का परमेश्वर. अब ऐसे परमेश्वर के साथ जीवन बिताने की कल्पना करें जो आनन्द में असीमित तथा सृजनशक्ति में अनन्त है. वह तो हमारी कल्पना के परे सिद्ध व्यक्तित्व रखता है.

उसे जानना वर्णन से परे है परन्तु परमेश्वर को जानना और परमेश्वर के बारे में जानने  में महान अन्तर है, उसे अपने घनिष्ठ मित्र के रूप में जानना जो आपको शर्त-रहित प्रेम करता है और जिसने इस संसार में आपको सर्वोत्तम उपहार दिया है अर्थात अपने आपको दे दिया. यह केवल उसके अस्तित्व को जानना और उसकी बौद्धिक कल्पना करने के विपरीत ज्ञान है. नि:सन्देह यदि मनुष्य यह जान ले कि इस सिद्ध व्यक्तित्व को परमेश्वर एवं प्रभु व्यक्तिगत रूप से जानने में वरन एक सर्वोच्च मित्र स्वरूप जानने में जो शंकित है तो वे सब कुछ वरन संपूर्ण संसार का त्याग कर देंगे कि यह सब उसके समक्ष महत्वहीन है, या कोर्इ स्थान ही नहीं रखता है. पृथ्वी का सब सोना, आदर्श से अब तक कर, संपूर्ण मानव इतिहास का ज्ञान एवं उपलबिध्यां उसके सामने फीकी पड़ जाती हैं. क्या यह संभव है कि वे एक क्षण की परमेश्वर की वास्तविक उपस्थिति के अनुभव के निमित्त संपूर्ण संसार का त्याग कर सकते हैं. अब उसकी विस्मयकारी एवं अवाक रह जाने वाली उपस्थिति के बिना एक पल तो क्या लाखों वर्ष भी क्या अनन्त समय जीवन व्यतीत करने की कल्पना करें. ऐसा हो सकता है….

इस स्पर्श गम्य आनन्द दिव्य महिमा की कल्पना कीजिए. यदि हमारी पांचों इन्द्रियां महिमामय शक्ति, विस्मय घनिष्ठता, उपासना के अद्भुत ज्ञान, सांसारिक ज्ञान, आनन्द[4]  एवं हर्ष, प्रेम, उल्लास, रोमांच, चुनौतियां आदि अथाह अनन्त अजूबे सौ गुणा बढ़ जाएं तो भी हम कैसे जान सकते हैं कि उनका अन्त न होगा? परमेश्वर ने इनकी रचना की है और उसने इन्हें समाप्त होने के लिए नहीं रचा है, इस जीवन का सर्वोच्च-अति-सर्वोच्च अनुभव आने वाले समय की तुलना में अन्धियारा हम ही है,[5]  परन्तु इस जीवन का आनन्द एवं उल्लास हमें संकेत देते हैं. परमेश्वर के गुणों को देखते हुए, यदि अनन्त जीवन है तो वह भविष्य में अनन्त है और इस जीवन से उत्तम है. उदाहरणार्थ केवल एक इन्द्री-सुनना, संगीत के भावात्मक सौंदर्य के क्षेत्र को ही लें, हेन्डेल के मसीहा का हाल्लेलूयाह गान जो हजार गुणा सौदंर्य विस्मय है. हमारी बुद्धि से परे अति विकसित एक दर्जन नई इन्द्रियों की कल्पना करें. एक ऐसे अनन्त जगत की कल्पना करें जो कभी न बदले और सदा का घर हो और एक सार न हो कि हम ऊब न जाएं. (जैसे कि एक अनादि परमेश्वर के साथ रहना ऊबाउफ नहीं हो सकता).

बाइबल के अद्भुत वचन में से एक है फिलिप्पियों की पुस्तक अध्याय 2 पद 13, वहाँ लिखा है कि प्रभु यीशु जिसे अधिकार दिया गया है कि सब कुछ अपने अधीन कर ले, वह हमारे अकिंचन शरीर को बदल देगा कि वह उसकी महिमामय देह के समान हो जाए.”यह वास्तव में एक अद्भुत बात है. हम इसकी कल्पना नहीं कर सकते कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है परन्तु परमेश्वर क्या है इसके बोध् के निमित्त नवदीक्षित को 10,000 गुणा बुद्धि की आवश्यकता पड़ेगी जो सोचने की गति की क्षमता पर है. (प्रकाश की गति से भी अधिक) जैसा कि सी.एस. लूइस ने देखा, कि एक नश्वर मनुष्य को ईश्वर मानकर उसकी उपासना करे?

जी हाँ, परमेश्वर को जानना और अपने अस्तित्व के लक्ष्य को समझना ही हमारा उद्देश्य है.

परमेश्वर के अस्तित्व का आनन्द लेना ही एकमात्र संभाव्य उल्लास है जो हमारी आत्मा का अनन्त सन्तोष है क्योंकि यही हमारी सर्वोच्च नियति है. प्रत्येक परिचमित बाधा जो क्षणिक है और जीवन की लालसाओं के अधीन बौद्धिक कीमत की माँग करती है. अनन्त समय को देखते हुए परमेश्वर से कम कोई भी बात वास्तव में अनन्त पीड़ा ही उत्पन्न करेगी. उदाहरणार्थ, अन्तरिक्ष में निर्जन क्षेत्र में सदा-सर्वदा के लिए अकेले रहने की कल्पना करें. ऐसा जीवन कल्पना से परे अन्नतहीन भयावह अवस्था है. अतः परमेश्वर के अस्तित्व का तर्क हमें ऐसी नियति वरन् इससे भी भयान नियति से बचाना है. यदि निश्चय जानना हो कि इस जीवन में हमें सन्तोष देने वाली कोई  बात है तो प्राचीन युग के एक सबसे अधिक बुद्धिमान राजा के वचन पढ़ें जो सभोपदेश की पुस्तक (बाइबल) में व्यक्त हैं. इस राजा की बुद्धि पौराणिक बन चुकी है. यह पुस्तक एक गैर मसीह व्यक्ति के लिए अनुशंसित पुस्तक है जो की मसीह जन कभी किसी को सुझाए. इस राजा के पास आत्म-सन्तोष प्राप्ति हेतु सब कुछ था परन्तु वह अन्ततः निराश होकर कहने लगा, ”व्यर्थ, सब द्वर्थ है“ सुलैमान राजा का जीवन व्यक्ति जीवनवाद का एक सिद्ध प्रमाण है. (जो प्रतिदिन लाखों मनुष्यों के जीवन में पुनरावृत होता है) कि  परमेश्वर ही है जो हमें अन्ततः सन्तोष प्रदान कर सकता है. भौतिक संसार के विषय राजा सुलैमान का निष्कर्ष सभोपदेशक अध्याय 12 पद 13 में व्यक्त घोषणा है ”सब कुछ सुना गया; अन्त की बात यह है कि परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर; क्योंकि मनुष्य का संपूर्ण कर्तव्य यही है.”

सर्वोच्च बुलाहट, परम विज्ञान तथा सर्वोत्तम दर्शनशास्त्र जो मनुष्य वरन् परमेश्वर की सन्तान का ध्यान आकर्षित करें वह है एकमात्र वैभवशाली परमेश्वर का अस्तित्व, उसकी महिमा, उसका स्वभाव, उसका व्यक्तित्व, उसके काम, उसका प्रेम ही मुख्य बाते हैं.

[6] असीमित उत्कृष्टता उसको व्यक्त नहीं कर सकती है. क्योंकि परमेश्वर से बढ़कर कुछ भी नहीं है, इसलिए परमेश्वर के विषय ज्ञानोपार्जन से बढ़कर कोई अध्ययन नहीं है. ”परमेश्वर के प्रेम के वशीभूत हो जाना सब रोमांचों में सबसे बड़ा रोमांच है और उसकी खोज करना साहसी कार्यों में सबसे बड़ा कार्य है“ उसे खोज लेना मानवीय उपलब्धि में सबसे बड़ा काम है. (रापफेल साइमन) उदाहरणार्थ, परमेश्वर के गुणों का अध्ययन संभवतः सबसे अधिक लाभकारी अध्ययन है जो निरंतर आनन्द की लहर उत्पन्न करता है. (सुभावित अध्ययन देखें) जैसा सी.एस. लूइस ने अति उचित देखा, ”हम आधे मन के प्राणी हैं जो अधव्यसन तथा योनाचार एवं लालसाओं में समय गंवा रहे हैं जबकि हमें अनन्त आनन्द दिया जा रहा है. यह वैसा ही है जैसा कि एक झुग्गी वाली बालक जो समुद्री तट पर छुट्टी बिताने की कल्पना नहीं कर सकता, अतः वह अपने ही परिवेश में मिट्टी में खेलता है. हम बड़ी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं.“ और सैम स्टामर्स कहते हैं. ”हम दयनीय अकिंचन आनन्द जैसे अवैध योनाचार मधव्यसन एवं सांसारिक धन-सम्पदा में मग्न है जबकि परमेश्वर हमें आनन्द एवं हर्ष की परिपूर्णता प्रदान करता है जो वशवर्ती सन्तोष की क्षमता से कभी वंचित होते हैं.”[7]

सच्चा परमेश्वर कौन है?

एक विख्यात गायक बाब डायलन ने अपने गीत में लिखा है, “आप चाहे कोई भी हों आपको किसी न किसी का दास तो होना ही है.”

हमारी विशेषता है कि हम सोचते हैं कि हम अपने जीवन को अपने हाथों में लेकर चल रहे हैं परंतु सच तो यह है कि ऐसा कदापि नहीं है. हम अपने जीवन के सच्चे परमेश्वर के हाथों में हैं, वह चाहे कोई भी हो. “कुछ के लिए वह परमेश्वर है और कुछ के लिए शैतान.” और अधिकांश मनुष्यों के लिए इन दोनों के बीच की बाते हैं.

हर एक मनुष्य अपनी व्यक्तिगत पहचान किसी न किसी आधार पर बनाता है जैसे उसका व्यक्तित्व, उसकी नौकरी, उसकी उपलब्धियां, उसकी सुरक्षा, उसका जीवन साथी, उसकी धन-सम्पदा, उसका ऐश्वर्य आदि. तथापि “यदि परमेश्वर न हो तो ये सब हमें अनन्त पीड़ा देंगे.” अतः यह स्पष्ट हो कि पाप परमेश्वर की अपेक्षा हमारी पहचान अन्य किसी भी आधार पर बनाता है.[8]

यदि हमारी पहचान और हमारा जीवन जो इन बातों से जाना जाता है पूर्णरूपेण परमेश्वर अन्तिम एवं सिद्ध सत्य, पर आधारित न हो तो हम अवश्यंभावी अनेक नश्वर छोटी-छोटी बातों से कठिन होते हैं जो बड़ी आसानी से हमारे दुःख या व्यसन बन जाते हैं. यही कारण है कि जैसा अनेक दार्शनिकों एवं धर्मज्ञानियों ने समझा है, परमेश्वर से विलग आनन्द तथा सुरक्षा संभव नहीं है.[9]  (टिप्पणी देखें) नश्वर एवं सीमित मनुष्य होने के कारण ऐसा आनन्द एवं सुरक्षा अनन्त समय में प्राप्त कर लेना हमारे लिए संभव नहीं है.

यद्यपि हम अपनी पहचान सब सांसारिक बातों पर बनाए, परमेश्वर के स्थान पर जो भी रखा जाए हमें तथा अन्यों को प्रकट एवं चतुर युक्तियों द्वारा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष हानि ही पहुंचाता है. यहाँ तक कि प्रेम तथा परिवार जैसे अद्भुत अनुकल्प भी हमारा व्यसन एवं मूर्तियां बन जाते हैं. यही कारण है कि संसार में समस्याएं एक मुख्य स्रोत से उत्पन्न होती हैं, परमेश्वर की अपेक्षा अन्य किसी बात को अपना सर्वोच्च प्रेम बना लेना. संसार के दुःख की सीमा उसी अनुपात में होती है जिस अनुपात में हम परमेश्वर की पहली आज्ञा को अनसुना करते हैं.[10]  अतः एक ही अर्थ यह निकलता है, “पाप उन युक्तियों में आनन्द की खोज का संकल्प है जो भ्रष्ट एवं स्वार्थपूर्ण संकल्प है और वहां शून्यता एवं प्रेम ही पाया जाता है. परमेश्वर द्वारा हमारी आत्मिक भूख को मिटाने के लिए परिपूर्ण भोजन का परित्याग ही पाप है.”[11]

परमेश्वर के बिना स्वर्ग भी आनन्द का स्थान कैसे हो सकता है? अविनाशी स्वर्गलोक जो कल्पना से परे है कभी न कभी तो उबाऊ और खिन्नता का कारण होगा क्योंकि वहाँ असीम सिद्धता का परमेश्वर नहीं होगा जिसके साथ हम घनिष्ठ सम्बन्ध बना सकें एवं आनन्द ले सकें. जैसा कि जनमान्य फ्रांसीसि नास्तिक जीन पाल सारत्रें ने कहा कि एक नश्वर प्राणी को अनश्वर संदर्भ चाहिए  कि जीवन में वास्तविक उद्देश्य एवं अर्थ हो अन्यथा सब कुछ व्यर्थ है.

अनन्त वृद्धिमान आनन्द

परन्तु सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है क्योंकि परमेश्वर है और उसने हम पर स्वयं का  प्रकट किया है. यह परमेश्वर महत्व रखता है. यही कारण है कि जोनाथन एडवडर्स और जान पाइपर जैसे धर्म के ज्ञाताओं का मान महान है. वे केवल परमेश्वर की महिमा के निमित्त परमेश्वर केन्द्रित है. धर्मज्ञान निश्चय ही यही हैµ अनन्त महिमा के परमेश्वर, जिसने सब कुछ अपनी महिमा के लिए सृजा है, जिसमें उद्धार प्राप्त मनुष्यों का चिर स्थाई आनन्द भी है. उस परमेश्वर की स्तुति एवं ज्ञानोपार्जन करना ही कर्मज्ञान है.[12] “टिप्पणी देखिए” यह परमेश्वर के विषय ज्ञानोपार्जन है जिसका कभी अन्त न होगा, अनन्तकाल में भी इस ज्ञानोपार्जन का अन्त नहीं होगा. न ही यह कभी समाप्त होगा क्योंकि सीमित प्राणियों के लिए  अनन्त परमेश्वर से अद्भुत एवं विस्मयकारी बातें सीखने का क्रम चलता रहेगा. मुझे विश्वास है कि पुनरुत्थान में परमेश्वर ने हमें ऐसा रचा है कि हम सर्वदा नई-नई बातें सीखते रहेंगे जो हमारे आनन्द एवं हर्ष को सर्वदा बढ़ाते और हमारे प्रेम को वृद्धिमान करते रहेंगे, साथ ही साथ अनेक अन्य चमत्कार भी होंगे. यदि व्याख्यानुसार, हम सीमित प्राणियों के लिए अनन्त सिद्ध परमेश्वर का ज्ञान सर्वदा बढ़ता रहे तो हमारा आनन्द भी सर्वदा बढ़ता रहेगा क्योंकि परमेश्वर के चमत्कारों के विषय ज्ञान ग्रहण करना एक सत्त आनन्द की बात है और यदि परमेश्वर का ज्ञान तथा उसमें हमारा आनन्द सर्वदा वृद्धिमान होगा तो उसके प्रति हमारा प्रेम भी वृद्धिमान होगा. ज्यों-ज्यों परमेश्वर की महिमा और महानता का हमारा ज्ञान और आनन्द बढ़ेगा तो उसकी अनुपात में उसके प्रति हमारा प्रेम भी बढ़ेगा तथा उसका अन्त न होगा. यह वर्णन से परे महिमामय होगा.[13]

एकमात्र सच्चा आनन्द अनन्त आनन्द है. यही तो हर एक मनुष्य को चाहिए कि वह आनन्दित रहे. एक आत्म-हत्या करने वाला जो प्रयास में विफल रहा. उसने यही कहा था कि यदि मनुष्य आनन्दित न रहे तो उसे जीने की आवश्यकता नहीं है. एक शुभ सन्देश है हम अब और सदैव आनन्दित रह सकते हैं अपने स्वप्नों से भी अधिक आनन्दित एवं हर्षित.

अब दोहराते हुए, विशेष ध्यान दें तो यह सच है कि ऐसा एक भी मनुष्य नहीं जो आनन्दित रहना न चाहेगा. हर एक मनुष्य आनन्दित रहना चाहता है और इतना अधिक कि आनन्द की उसकी खोज विश्व-व्यापी है इससे एक भी जन अछूता नहीं है. “… प्रत्येक प्राणी में आनन्द की एक कभी न बुझने वाली भूख है. आनन्द और हर्ष का अन्तहीन दर्द.”[14]  ”… आनन्द और हर्ष तथा मोह और उत्साह के लिए मनुष्य के मन की लालसा एवं ललक तथा मनोवेग सार्वजनिक है.[15]  परन्तु ऐसा क्यों है? आनन्द प्राप्ति की यह सार्वजनिक आवश्यकता क्यों है? इसका एक कारण है.

आनन्द को ऐसे सुवास से चाहने का कारण हमारा आत्मिक लहू है या कहें कि इसका कारण है, हम परमेश्वर की समानता में सृजे गए हैं,[16]  एक अनन्त आनन्द और उल्लासित परमेश्वर की समानता में.[17]  यह सच है कि परमेश्वर में अनन्त आनन्द है और उसके अनन्त आनन्द और हमारे सीमित आनन्द में तुलना करके देखें कि वह कैसा हो सकता है. हमारा महान हर्षातिरेक इस तुलना की लघुतम छाया के बराबर भी नहीं है. फिर भी, मसीह यीशु में विश्वास करने वाले हम लोग इस अनन्त आनन्द में सदाकालीन सहभागी होंगे और यदि हम विश्वासी नहीं हैं, तो जब तक हम उसमें आनन्द प्राप्त न कर लें जो हमारा वास्तविक उद्देश्य है तो हमें वास्तविक आनन्द प्राप्त नहीं होगा. निश्चय जानियेः ”सांसारिक दुःख एवं अनन्त कष्टों की अपेक्षा मसीही धर्म हमें सुख से वंचित नहीं करता है.“[18]  दूसरे शब्दों में कहें तो एक अर्थ में यह भी है कि पाप ऐसे आनन्द की खोज करता है जहाँ अन्ततः निराशा ही पाई जाती है परमेश्वर से हटकर हर स्थान एवं हर रीति में. दूसरे शब्दों में, एक भूखे मनुष्य के लिए पाप परमेश्वर के बड़े भोज को तुच्छ जानकर भूसे को खाने पर विवश करता है जो आरंभ में तो आकर्षक लगता है परन्तु उसमें पोषक तत्त्व नहीं होते हैं.

दूसरी ओर परमेश्वर हमसे अधिकाधिक मनोकामना रखता है जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की है.

जोनाथन एडवडर्स कहता है, “परमेश्वर ने मनुष्य को आनन्द की अपेक्षा अन्य किसी बात के लिए नहीं सृजा है. उसने उसकी सृष्टि इसलिए की है कि वह उसे आनन्द पहुंचाए.”[19]  यह भजन 16:11 जैसे धर्मशास्त्र के वचन से सिद्ध होता है, “… तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दाहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है,“ हम ”तेरे आनन्द के सोते से सर्वदा अपनी प्यास बुझाते रहेंगे”[20]  , “अनन्त आनन्द”[21]  तथा ”अनन्त आशिषें.“[22]  , दोनों उद्धार प्राप्त मनुष्यों की अविनाशी धरोहर है.

परमेश्वर का सर्वोच्च आनन्द

दुर्भाग्य से अधिकांश जनों को इस जीवन के दोनों सुरक्षित एवं सदाकालीन आनन्द (परिस्थितियों के कारण आने वाले आनन्द से अलग.[23]) – और आने वाले जीवन में उनका अनन्त आनन्द एवं कल्याण की समझ ही नहीं है कि वह परमेश्वर की महिमा पर निर्भर है जो हर बात में सबसे बड़ी है. परमेश्वर स्वयं की एवं अपनी महिमा की सबसे अधिक चिन्ता नहीं करता है, उदाहरणार्थ उसकी सर्वोच्च सिद्धता, सुन्दरता, वैभव महानता और असीम मान वह उस हद तक अन्यायी है… और    अपनी सृष्टि के प्रति प्रेम से रहित है. हम तो अन्तिम प्राणी हैं जिनमें यह इच्छा हो कि परमेश्वर की सर्वोच्च रूचि उसी में केन्द्रित हो क्योंकि वहीं तो हमारी अनन्तकालीन रूचियां एवं सुरक्षा पाई जाती हैं. तथापि, ”क्योंकि सर्वोत्तम भलाई तथा सर्वोत्तम आनन्द परमेश्वर में अवस्थित है, हमारे आनन्द में परमेश्वर का आनन्द उसके व्यक्तित्व में पाया जाता है… प्राणी के आनन्द की चरम सीमा परमेश्वर की महिमा की चरम सीमा के साथ एक होती है. (जोनाथन एडवर्डस का संदर्भ) यह सर्वोच्च अन्त दो बातों से बना है. परमेश्वर की अनादि सिद्धता परमेश्वर के आत्म-महिमान्वन द्वारा व्यक्त एवं प्रभावित है और दूसरी बात, उसका असीम आनन्द संचारित होकर मनुष्य को आनन्दित करता है. इन दोनों बातों को धर्मशास्त्र में एक उक्ति में व्यक्त किया गया है, परमेश्वर का महिमान्वन हों… (जैसा कि जान पाइपर कहता है) जब हम उसमें पूर्णरूपेण सन्तोष पाते हैं तब परमेश्वर हम में सर्वाधिक महिमा पाता है.”[24]  यह निश्चय जानकर कि परमेश्वर अपनी महिमा के प्रति चिन्तित नहीं है, वह गुण-निर्दशन के अनुसार अविनाशी सिद्धता की चिन्ता नहीं करता है और इस प्रकार सब कुछ कुप्रभावित होता है जिसमें वह भी आता है. धन्यवाद का विषय तो यह है कि वह इस बात की अनुमति कभी नहीं देगा[25]  अन्यथा ऐसा नहीं है कि ”संपूर्ण ब्रह्माण्ड में परमेश्वर ही एकमात्र ऐसा है जिसके लिए स्वयं को महिमान्वित करना प्रेम का कार्य है.“ ”परमेश्वर हमारी सर्वोच्च भलाई की कामना करता है परन्तु इस जगत में परमेश्वर से बढ़कर भलाई क्या है? उसके लिए आवश्यक है कि वह हमारे मनों में हर्षातिरेक की स्तुति तथा उत्तम कोटी के आनन्द की जानकारी प्राप्त करे क्योंकि जैसा लूइस कहता है, ‘ आनंद अनायास प्रशंसा में overflows.'”[26]

दूसरे शब्दों में, हम फुटबाल का खेल, प्रेमलीला, कविता, सिनेमा, शराब, प्राकृतिक सौंदर्य और संसार में हर एक अच्छी बात जो वास्तव में परमेश्वर और हमारे लिए उसके प्रेम से नीचे है, उसका आनन्द क्यों लेते हैं? उसकी प्रशंसा क्यों करते हैं? यह समझ में आने वाली बात नहीं है. जब हम परमेश्वर की असीम महिमा और उसके स्वभाव एवं प्रेम पर ध्यान देते हैं तो उसकी तुलना में सब कुछ फलहीन है. इसमें तर्क कहां तक है कि अनन्त परमेश्वर को कुछ समय के महत्व में बदल दें? आनन्द, भोग-विलास, उल्लास, उत्साह और मोह परिभाषा के अनुसार यदि भोग विलास और सांसारिकता की अपेक्षा परमेश्वर में पाए जाए तो हर प्रकार से अच्छे हैं और अधिक उत्कृष्ट अधिक विस्तृत, अधिक उत्तम, अधिक भव्य अधिक ठोस, अधिक तुष्टिकर होते हैं;[27]  इस संसार में हर एक अच्छी बात और सब स्वीकार्य सुख (स्पष्ट है कि अभिलाषाएं इसमें नहीं हैं.) आदि सब अधिक आनन्द-दायक होते हैं यदि हम व्यक्तिगत रूप से जान लें कि परमेश्वर ने अपने शर्त-रहित प्रेम एवं अनुग्रह में होकर हमें यह सब निर्मोल दिया है. इसके अतिरिक्त आज या कल यदि कोई किसी बुरी आदत को खोज लेता है तो एडवर्ड कहते हैं ”कि वह“, बाहरी आनन्द की मधुरता को नष्ट कर देती हैं. [28]

एक अनन्त सिद्ध व्यक्तित्व होने के नाते, “परमेश्वर जो  प्रेम है.”[29]  और परमेश्वर का अनन्त जटिल जीवन अनादि आत्म-त्यागी प्रेम है.[30]  इससे प्रकट होता है कि परमेश्वर की चिन्ता का प्रथम विषय स्वयं से और उसकी महिमा से सम्बन्धित है, महिमा जो कृतज्ञतापूर्वक हमारे लिए अन्तर्निहित आत्म-त्यागी है. अतः यह समझना कि 1. परमेश्वर ही परम-प्रधान है[31]  2. “सब वस्तुएं परमेश्वर के प्रेमपूर्ण नियन्त्रण में रहती हैं.”[32]  और 3. धर्मशास्त्र में परमेश्वर की अतुल्य एवं अद्भुत प्रतिज्ञाएं जैसे रोमियों 8:28[33], को जानना हमें और अधिक आश्चर्य में डाल देता है. (टिप्पणी देखें) क्या यह आश्चर्य की बात है कि धर्मशास्त्र हमें आनन्द मनाने को कहता है. ”प्रभु में सदा आनन्दित रहो. मैं फिर कहता हूँ आनन्दित रहो!”[34]  या, “प्रभु में सदैव  आनन्द मनाओ! मैं फिर कहता हूँ: सदैव (सर्वदा) आनन्द से भरे रहो!“[35]  “सदा आनन्दित रहो.”[36]  “हमेशा के लिये आनन्द.”[37]

यहां  स्तुति के योग्य कुछ अवश्य है. यहां  आराधना के योग्य भी कुछ है, जो फिर वही है- मुख्यतः परमेश्वर आनन्द, हर्ष एवं प्रसन्नता जो उसके महिमान्वन की ओर ले चलते हैं. परमेश्वर ने हमें उसका आनन्द लेने के लिए बनाया है. इसकी तुलना में संसार की हर एक बात भूसा है. तथापि, हम परमेश्वर पर ध्यान न देकर भूसे की सराहना करते हैं. क्या इससे बढ़कर अशोभनीय बात और कोई हो सकती है?

कृतज्ञता

हम प्रायः परमेश्वर को तो क्या उसके वरदानों के लिए भी उसको धन्यवाद नहीं कह पाते हैं. अन्ततः संपूर्ण संसार में ऐसा क्या है जो परमेश्वर का वरदान नहीं है? जीवन,[38]  प्रेम, स्वास्थ्य (यहाँ तक कि रोग एवं त्रासदी भी उसके वरदान तथा आशिषें[39]हो सकते हैं.), भोजन, पानी, संगीत, मनोरंजन, सुख, सन्तान, हंसना, परिवार, ज्ञानोपार्जन, समुद्री तट, शिशु, खेल, सौंदर्य, आनन्द, बर्फ, रोमांच, साहसी कार्य, प्रसन्नता, शक्ति, नींद, उत्साह, प्रकृति का वैभव, हर्ष, पालतू पशु, कला, मन बहलाव, इंद्रियां, संस्कृति, परिवार, शारीरिक घनिष्ठता, सुविधा के साधन और समय बिताना आदि. यह तो इन आनन्ददायक वस्तुओं का आरंभ भी नहीं है. ध्यान दें कि इन वर्गों में हजारों व्यक्तिगत वरदान गिने जा सकते हैं. (यहाँ तक कि भोजन के व्यंजन ही असंख्य होते हैं.) यह सब मांगे बिना ही निर्मोल हैं. ”क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल-बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है.”[40].

परन्तु उन दस कोढि़यों के समान जिनमें से एक ही प्रभु यीशु को धन्यवाद देने लौटा था,[41]  हम में से कितने लोग ऐसा आनन्द प्रदान करने वाले इन असंख्य वरदानों और आशिषों के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं- परमेश्वर ने जो स्वयं को हमारे लिए दे दिया उसकी तो बात ही कुछ और है! यही कारण है कि वे उसकी स्तुति एवं उसके सदाकालीन आनन्द के परिमाप के सबसे बड़े आनन्द से वंचित हो जाते हैं. संभवतः पाप की मुख्य प्रकृति यह है- कि परमेश्वर में विश्वास न करने वाला उसे ”परमेश्वर होने का सम्मान नहीं देता है या उसे धन्यवाद नहीं देगा.”[42]  शायद जो   – कि उसे वह जो है उसके योग्य सम्मान प्रदान करने की इच्छा न रखें, उसे उसके योग्य महिमा एवं स्तुति न दे और उसकी प्रतिज्ञाओं को व्यर्थ जाने और यहाँ तक कि क्रूस और उसके भयानक दृश्य का परित्याग करें. पाप सदा ही अपनी रूचियों को परमेश्वर से बड़ा बनाता है और परमेश्वर को सिंहासन से उतारकर हमें जगत के सिंहासन पर बैठाता है, हमें ईश्वर बनाता है. सच तो यह है कि हम परमेश्वर को छोड़ किसी अन्य बात की लालसा करते हैं तो हम वास्तव में मूर्तिपूजक हैं. (कुलुस्सियों 3:5) ”… बुरी लालसा और लोग जो मूर्ति पूजा के बराबर हैं.“ (कुलुस्सियों 3:5)[43]

संभवतः सबसे बड़ा पाप है, विद्रोह का पाप जिसके कारण शैतान का पतन हुआ था. हमारे प्रथम माता-पिता का पतन हुआ था और परिणामस्वरूप हम सबका पतन जो अपने पापों और मूर्तिपूजा से मन फिराकर प्रभु यीशु की ओर न फिरे. इससे प्रभु यीशु की बात समझ में आती है कि केवल वे जो अपने आपको बालकों की नाईं दीन बनाएंगे, वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे. “मैं तुमसे सच कहता हूँ, यदि तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने नहीं पाओगे.”[44]  यही कारण है कि रोमियों 14:23 में लिखा है “…जो कुछ विश्वास से नहीं वह पाप है.” श्रीनर की व्याख्या है, विश्वास परमेश्वर का महिमान्वन करता है क्योंकि विश्वास के द्वारा वह विश्वासयोग्य माना जाता है और अविश्वास परमेश्वर का अपमान करता है क्योंकि अविश्वास उसे तथा उसकी प्रतिज्ञाओं को निर्भर करने योग्य एवं सच नहीं मानता है. अविश्वास में परमेश्वर को वचन का वक्ता नहीं माना जाता है और इस प्रकार उसे महिमा से वंचित किया जाता है. अतः “हम परमेश्वर में विश्वास करके उसका महिमान्वन करते हैं और उसके वचन में विश्वास करने से चूकते हैं तो उसका अपमान करते हैं. अतः हम जब भी ऐसा कोई काम करते हैं जो विश्वास का परिणाम नहीं है वह पाप एवं परमेश्वर का अपमान है.”[45]

सबसे अच्छा समाचार: सबसे बढ़कर परमेश्वर का आनन्द लेना

शुभ सन्देश यह है कि मसीह यीशु की प्रायश्चित मृत्यु में विश्वास के द्वारा हमारे पाप सदा के लिए क्षमा कर दिए गए हैं. यह मसीही सुसमाचार का एक भाग है. “प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा.”[46]  “… और हमारे  अपराधों को क्षमा किया.”हमारे पापों. “[47]  “मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ, कि जो कोई विश्वास करता है उस का  अनन्त जीवन है.[48]परन्तु सच तो यह है कि सुसमाचार क्षमादान से कहीं अधिक है चाहे क्षमादान महान एवं अद्भुत अवश्य है परन्तु उस व्यापक परिप्रेक्ष्य में मनुष्य का उद्धार है.”[49]  वरन् परमेश्वर को अपना कर उसके साथ आराधना करना भी है जिसे अधिकांश मसीही विश्वासी समझ नहीं पाते हैं.

उदाहरणार्थ, “प्लेज़र्स फोर एवरमोर”, “परमेश्वर का आनन्द लेने वाला जीवन बदलने वाली शक्ति”  के लेखक, पास्टर सम स्टोमर्स कहते हैं, परमेश्वर के लिए हमारी निजि स्तुति वास्तव में आत्म-त्यागी प्रेम प्रदान करने में परमेश्वर की अभिव्यक्ति को प्रकट करती हैः “मेरे द्वारा परमेश्वर की स्तुति करने में परमेश्वर का ध्येय दुर्बल स्वार्थ नहीं, अपितु आत्म-त्यागी प्रेम की पराकाष्ठा है! यदि मेरा सन्तोष उसमें तब तक अपूर्ण है जब तक उसकी स्तुति में व्यक्त न हो कि मैं उससे सन्तुष्ट हो जाऊं (विशेष ध्यान दें: उससे, न कि उसके वरदानों एवं आशिषों से परन्तु परमेश्वर की आन्तरिक सुन्दरता एवं उसके वैभव से जो परमेश्वर के हैं.) इसके बाद परमेश्वर मुझसे आराधना की अपेक्षा करे (जिसे सी.एस.लूइस ने समझने से पूर्व असभ्य स्वार्थ माना था.) तो वह मेरे लिए उसका सर्वोच्च प्रेम और स्वयं के लिए सामान्य महामहिमा दोनों ही हैं. उसमें मेरा आनन्द (उसके वरदानों में नहीं) ही मुझमें उसकी महिमा है.

“यदि परमेश्वर को आपसे सर्वोत्तम प्रेम करने की आवश्यकता हो तो उसके लिए यह भी आवश्यक है कि वह अपना वरदान- महानतम् मूल्य का, अति मूल्यवान धरोह, अपनी क्षमता में सर्वाधिक उत्कृष्ट एवं योग्य वस्तु दे. उसका वरदान निःसन्देह वह स्वयं है. संपूर्ण जगत में परमेश्वर के तुल्य मनोहर, आकर्षक तथा सन्तोषदायक अन्य कोई नहीं है. अतः परमेश्वर यदि आपसे प्रेम करता है तो वह आपके लिए स्वयं को दे देगा और फिर आपके जीवन में काम करेगा कि आपको अपने सौंदर्य और अपने सर्वप्राचुर्य (इस लेख का आशातीत उद्देश्य) के निमित्त जागरुक करें. उसमें आपके आनन्द को गहरा, व्यापक एवं विस्तृत बनाता है… यदि परमेश्वर धर्मशास्त्र में जैसा प्रकट है वैसा महान एवं महिमा से पूर्ण वर्णनातीत है और अथाह वैभवशाली है तो वह हमसे तब तक प्रेम नहीं करेगा जब तक कि वह हमें अपने ज्ञान् और अनुभव और आनन्द में लाने के लिए अनिवार्यताओं को पूरा न करें. अन्य सब कुछ जो निकृष्ट वरदान हैं जैसे बड़ा बनाना, परमेश्वर के प्रेम की परम अभिव्यक्तियां नहीं है. परमेश्वर ही सुसमाचार है! परमेश्वर को प्राप्त करना सुसमाचार है! अन्य सब निकृष्ट वरदान तब ही तक अच्छे हैं जब तक कि वे परमेश्वर प्राप्ति के उच्चतर वरन् सर्वोच्च लक्ष्य का मार्ग तैयार करें. स्वयं को प्रभु यीशु में हम पर प्रकट के द्वारा और अपने आत्मा के द्वारा कार्य करके अपने अस्तित्व की तप्तश्वेत सराहना एवं आनन्द (यह आराधना है) उसके प्रेम का परम एवं अतुल्य कार्य है.”[50]

हमारे अस्तित्व का मुख्य उद्देश्य है कि हम परमेश्वर का महिमान्वन करें. मैं फिर कहता हूँ, केवल सच्चे परमेश्वर का, एकमात्र सर्वोच्च अस्तित्ववान का और जगत के सबसे महान, महत्वपूर्ण व्यक्ति का. “किसी की महिमा करना उसकी स्तुति, आनन्द और उसमें हर्षित होना है… उसकी सेवा करना और उसका आदर करना… आपका परमानन्द उन्हें प्रसन्न देखने में ही होता है.”[51] पाइपर कहते हैं कि परमेश्वर का महिमान्वन करना यह है कि हमारे जीवन का उद्देश्य हो कि संपूर्ण संसार में परमेश्वर का नाम अनमोल माना जाए. हर एक सन्देह से परे, यह जाना कि हमें संपूर्ण अनन्तकाल परमेश्वर को घनिष्ठता से जलने और उसके महिमान्वन का आनन्द प्राप्त होगा. एकमात्र सबसे बड़ी धरोहर है उसमें और केवल उसी में मंत्रमुग्ध होकर स्तुति, आश्चर्य, अनन्त विस्मयकारी परमेश्वर का रसास्वाद एवं आनन्द लेना और नाना प्रकार से अपने प्रति उसके मसीह प्रेम की अविर्णत करुणा का अनुभव करना.

“इसी कारण हमारा अस्तित्व है कि परमेश्वर की महिमा को प्रकट करें. संपूर्ण मानव जीवन परमेश्वर के बारे में ही है. मनुष्य होने का अर्थ यही है. यह हमारा सृजित स्वभाव है कि परमेश्वर का नाम ऊंचा करें. हमारी महिमा इसी में है कि परमेश्वर की महिमा की उपासना करें… मानवीय अस्तित्व के निमित्त इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करना हमारी सृष्टि के तत्व की मात्र एक छाया है. सब वस्तुओं से अधिक परमेश्वर में आनन्दित रहकर परमेश्वर की महानता को प्रकट न करना उस संगीत की मात्र ध्वनि है जिसे उत्पन्न करने के लिए हमें सृजा गया है यह एक (अवर्णित) त्रासदी है. मनुष्यों को केवल छाया मात्र या ध्वनि मात्र होने के लिए नहीं रचा गया है. हमें परमेश्वर के तत्व एवं परमेश्वर-स्वरूप संगीत तथा परमेश्वरीय प्रभाव के निमित्त सृजा गया है. परमेश्वर की समानता में रचे जाने का यही अर्थ है… परन्तु जब मनुष्य अपने सृजनहार का त्याग कर के अन्य वस्तुओं के प्रति अधिक लगाव रखने लगते हैं तब वे उन्हीं वस्तुओं के सदृश्य हो जाते हैं जिनसे वे लगाव रखते हैं- छोटी, अकिंचन, अयोग्य, भारविहीन और परमेश्वर को तुच्छ बनाने वाली वस्तुएं.”[52]

जोनाथन एडवडर्स कहते हैं, “परमेश्वर की महिमामय उत्कृष्टता एवं उसका सौंदर्य पवित्र जनों के मन को सदा आनन्द देते हैं और परमेश्वर का प्रेम उनका सदाकालीन भोज होता है.”[53]  यही कारण है कि परमेश्वर ने अब्राहम से कहा था, “… “मैं हूँ  … तेरा अत्यन्त बड़ा फल मैं हूँ.” (उत्पत्ति 15:1)

खुशी के लिए इसके अलावा, हर कोई प्यार करना चाहता है चाहता है. की सबसे बड़ी बात जो प्यार. एक कौन की छवि – लेकिन फिर, हम चाहते हैं, हम उसमें परमेश्वर की छवि बनाई है प्यार तलाश जरूरत जो  प्यार. केवल बाइबल का त्रिएक परमेश्वर जो  प्यार,[54] केवल वही है जो अपने सृजित प्राणियों के लिए अपने आप का त्याग करता है- हम जैसे भी विद्रोही क्यों न हों! (स्वर्गदूतों के आश्चर्य की कल्पना करें!) केवल वही है जो कल्पना से परे अनन्त आनन्द प्राप्त करता है, “जिससे बढ़कर अधिक उत्तम आशिषों की कल्पना या विचार भी नहीं किया जा सकता हैः असीम, अनन्त, अन्योन्याश्रित, और पिता परमेश्वर एवं पुत्र परमेश्वर के मध्य उपस्थित प्रेम एवं आनन्द की पवित्र उर्जा परमेश्वर के आत्मा के माध्यम से प्रवाहित होकर उद्धार प्राप्त मनुष्य की आत्मा को असीम एवं अनन्त आनन्द से भर देता है.”[55]  निःसन्देह, “… इस वर्तमान समय के कष्ट हम पर प्रकट होने वाली महिमा की तुलना में कुछ भी नहीं है.”[56], तथा “आँख ने नहीं देखी और कान ने नहीं सुनी, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं पढ़ीं, वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिए तैयार की हैं.”[57]

जिसे सच्चा एवं अनन्त प्रेम चाहिए उसे पहले परमेश्वर के पास आना होगा जो प्रेम है.

सच्चे परमेश्वर का ज्ञान

यदि हम संपूर्ण मानवीय इतिहास तथा धर्म की खोज करें तो हम पाएंगे कि केवल बाइबल का परमेश्वर ही सच्चा परमेश्वर है- और वही बेजोड़ एवं योग्य है. केवल वही जो.[58]  केवल उसी ने अपने अस्तित्व का अदम्य प्रमाण दिया है. यही कारण है कि इतने अधिक विद्वान और पूर्वकालिक संशयवादियों ने यह निष्कर्ष निकाला कि बाइबल का मसीही धर्म “सब धर्मों में सर्वाधिक प्रबुद्ध एवं अस्तित्वात्मक सुसंगत विकल्प है.” जो मसीही धर्म प्रतिवाद के बौद्धिक अनुशासन द्वारा प्रकट होता है.”[59]  (टिप्पणी देखें) उसके स्वयं को अपने वचन, बाइबल में प्रकट किया है. केवल वही अनुग्रह का परमेश्वर है. केवल वही पवित्र है. केवल वही एकमात्र परमेश्वर है जो आत्म-त्यागी प्रेम का प्रदर्शन करता है. केवल वही अनन्त त्रिएक परमेश्वर है.

“…मुझे छोड़ कोई परमेश्वर नहीं.”[60]  जैसा प्रेरित पौलुस ने कहा, “…मूरत जगत में कोई वस्तु नहीं, और एक को छोड़ और कोई परमेश्वर नहीं.”[61]  प्रभु यीशु की शिक्षा है, “और अनन्त जीवन  है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को जिसे तूने भेजा है जानें.”[62]

केवल यही एक सच्चा परमेश्वर है जिसने अपने मुंह के उच्चारण द्वारा जगत को उत्पन्न किया और इसके उपरान्त भी वह चरनी में जन्मा; अनन्त एवं महान महिमा जिसने दयामय होकर मानव रूप धारण किया; अनन्त आनन्द का परमेश्वर रोया भी था; परिपूर्ण जीवन का परमेश्वर अवर्णित घावों से क्षतिग्रस्त होकर मर गया कि विद्रोही प्राणी बिना कीमत चुकाए अनन्त जीवन के वारिस हो जाएं.[63]  यही परमेश्वर जो क्रूस पर मरने के लिए भी आज्ञाकारी रहा, अपनी अनन्त महिमा के निमित्त मृतकों में से जी भी उठा है और उसके पुत्र, प्रभु यीशु मसीह में विश्वास करने वालों के अनन्त जीवन के लिए भी उसका मृतोत्थान हुआ है.

यह मानना कि मरणोपरान्त हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाता है एक भयानक भूल है. हमें अपने भीतर अनन्त जीवन का बोध होता है क्योंकि हम अनन्त है  हम या तो स्वर्ग में या नरक में अनन्त जीवन व्यतीत करेंगे और न्याय का दिन संभवतः अतिशीघ्र आता है, “क्योंकि उसने एक दिन ठहराया है, जिसमें वह उस मनुष्य के द्वारा धर्म से जगत का न्याय करेगा, जिसे उसने ठहराया है और उसे मरे हुओं में से जिलाकर, यह बात सब पर प्रमाणित  कर दी है.”[64]  यदि संसार के लिए वह दिन शीघ्र ही नहीं आता, तो हमारे मरणोपरान्त वह हमारे लिए व्यक्तिगत रूप से अवश्य आएगा और वे जिन्हें प्रभु यीशु की धार्मिकता दी गई है उस दिन से बचकर निकल पाएंगे. “जो पाप से अज्ञात था, उसी को उसने हमारे लिए पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएं.” (2 कुरिन्थियों 5:21)

Knowing God जो संभव. यदि पाठक यथोचित जानना चाहें कि परमेश्वर कौन है और वह कैसा है तो उन्हें बाइबल में सुसमाचार वृत्तान्त पढ़ना और प्रभु यीशु को निहारना होगा, “क्योंकि उसमें ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है.” (कुलुस्सियों 2:9)

निश्चय जानें:

“लेकिन परमेश्वर दर्शाता  है हमे उसका अपना प्रेम इसके लिए: कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिए मरा.”[65]

इसी मसीह ने हमसे प्रतिज्ञा की है “मैं तुमसे सच-सच  हूँ, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवनहोगा  . उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती  क्योंकि उन्होंने पहले ही  मृत्यु के पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है.”[66]

“उसी की महिमा अब भी हो, और युगानुयुग होती रहे.”[67]

यही  है वह जो हमारे विश्वास को देखता है, अन्य कोई नहीं चाहे वह कुछ भी हो. यदि हम उसे वास्तव में पहचानते हैं तो अनन्त प्रेम, आनन्द, श्रद्धालुमय, प्रसन्नता एवं उल्लास हमारी नियति होंगे और इससे भी बढ़कर स्वयं हमारा भाग होगा.

यदि आप मसीह को नहीं मानते हैं और आप जानना चाहते हैं कि मसीही विश्वासी कैसे बनें, तो JAshow.org का होम पेज देखें.

जो उद्धार की खोज में हैं तो उनके लिए जोनाथन एडवर्ड्स के शब्द अति उपयुक्त हैं:

परमेश्वर की दया को मानकर चलने का दुस्साहस न करें कि अपने आपको पाप करने का प्रोत्साहन दें. अनेक जनों ने सुना है कि परमेश्वर की दया असीम है और इस कारण वे सोचते हैं कि यदि वे वर्तमान में उद्धार की खोज में विलम्ब करें और जीवन के उत्तरकाल में उसकी खोज करेंगे तौभी परमेश्वर उन्हें अनुग्रह प्रदान करेगा. परन्तु ध्यान दें, यद्यपि परमेश्वर का अनुग्रह पर्याप्त है. वह परमप्रधान है और अपनी इच्छा के अनुसार ही वह निर्णय लेगा कि वह आपका उद्धार करे या न करे. यदि आप उद्धार को अपने जीवन के अन्तिम समय तक टालते रहेंगे तो उद्धार आपके वश में नहीं है, वह परमप्रधान परमेश्वर की इच्छा पर निर्भर करता है कि आपको प्राप्त हो या न हो. अतः इस परिदृश्य में आप परमेश्वर पर इतना अधिक निर्भर हैं कि अच्छा होगा कि आप इसकी खोज में परमेश्वर के निर्देशों का पालन करें जो उसकी वाणी को सुनना है, “…भला होता कि आज तुम उसकी बात सुनते! अपना-अपना हृदय ऐसा कठोर मत करो…” (भजन. 95:7-8)

“हतोत्साह होने से भी सावधान! निराशा के विचारों पर ध्यान दें क्योंकि आप एक महापापी मनुष्य हैं क्योंकि पाप बहुत लम्बे समय से पाप में रहे हैं और पिछड़कर पवित्र आत्मा का विरोध किया है. परन्तु स्मरण रखें कि आपकी जो दशा है चाहे आप कैसे महापापी क्यों न हों परमेश्वर आपकी पवित्रता के मान में जिसको आपने हानि पहुंचाई है, या अपनी महिमा के सम्मान के लिए जिसका आपने आदर नहीं किया है, या उसका न्याय जिसको आपने अपना बैरी बनाया है या उसका सत्य या उसके सद्गुणों का मान नही रखा, वह किसी भी बात का पक्षपात करते हुए आप पर दया दृष्टि करता है. आप चाहे कैसे भी पापी हों, परमेश्वर चाहे तो वह आपके उद्धार में अपना वृहत महिमा करेगा. आमीन” [68]

बिली ग्राहम की भाषा में और भी सरल है, “परमेश्वर से कहें, मैं अपने पापों की क्षमा चाहता हूँ; मैं उनसे विमुख होकर मसीह यीशु की ओर आता हूँ, मैं आश्वासन चाहता हूँ कि मैं स्वर्ग जा रहा हूँ! मैं अनन्त जीवन पाना चाहता हूँ. मैं प्रभु एवं उद्धारकर्ता प्रभु यीशु को अपना जीवन समर्पित करना चाहता हूँ. मैं आज ही से उसका अनुसरण करना चाहता हूँ.”

बड़ा दिन, दिसम्बर 25, 2011

यदि मुझे निम्नलिखित पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रत्येक पाठक को छः-छः करोड़ रूपया भी देना पड़े और मेरे पास कुछ न बचे तो में बड़े आनन्द के साथ ऐसा करूंगा.

र्इश्वरीय ज्ञान हेतु अनुशंसित पाठय सामग्री

J. I. Packer, Knowing God; Knowing God Devotional Journal: A One-Year Guide; God’s Words.

A. W. Tozer, The Attributes of God, Volumes 1 & 2 (study guides included) and The Knowledge of the Holy: The Attributes of God: Their Meaning in the Christian Life. = John MacArthur, Our Awesome God.

Stephen Charnock, The Existence and Attributes of God. (Charnock was the 17th century Puritan chaplain to Oliver Cromwell; hefty at over 1000 pages and written in Elizabethan English, but so was the KJV; pure gold.)

परमेश्वर के विषय अतिरिक्त सर्वोत्तम पाठय सामग्री

The Gospel of John ( अन्य 65 पुस्तकें).

John Piper, The Pleasures of God   Desiring God   When I Don’t Desire God: How to Fight For Joy.

Timothy Keller, The Reason for God.

Jerry Bridges, Trusting God & The Joy of Fearing God.

Tullian Tchividjian, Do I Know God?: Finding Certainty in Life’s Most Important Relationship

Sam Storms, Pleasure Forevermore: The Life-Changing Power of Enjoying God & One Thing: Developing a Passion for the Beauty of God.

Jonathan Edwards, The End for Which God Created the World & The Nature of True Virtue.  The Jonathan Edwards Center at Yale University has made Edwards’ complete writings available in a searchable database at: http://edwards.yale.edu/research  and has published Edwards’ works in a 26 volume scholarly edition. See especially “Major Works” at http://edwards.yale.edu/research/about-je

Douglas Groothuis, Christian Apologetics: A Comprehensive Case for Biblical Faith.

Lee Strobel, The Case for Christ; The Case for the Resurrection; The Case for Faith; The Case for a Creator.

सिस्टमेटिक थियोलाजी. सिस्टमेटिक थियोलाजी का अध्ययन जैसे लूईस स्पेरी चाफर Systematic Theology) एक ऐसा अध्ययन है जो प्रत्येक भले ही जन के दिल में बसा हो क्योंकि वह परमेश्वर के बारे ही में सुव्यवस्थित अध्ययन है. उदारणार्थ, तुलनात्मक धर्मों में मसीही धर्म की आधारभूत शिक्षाएं, पुस्तक सूची, बाइबल के धर्म सिद्धान्त (जैसे प्रेरणात्मक रचना, त्रुटिरहित रचना, पुस्तक संग्रह); उचित थियोलाजी, परमेश्वर सम्बन्धित शिक्षाएं, (ईश्वरवाद, त्रिएकत्व, परमेश्वर के गुण आदि); स्वर्गदूतों की शिक्षा, स्वर्गदूतों के विषय विचार, चयनित एवं भ्रष्ट; मानवविज्ञान, मनुष्य के बारे में विचार, पाप के विषय शिक्षा, पाप का विचार; कलीसिया की शिक्षा, कलीसिया के विषय विचार हूँ (मसीह की दुल्हन स्वरूप-कलीसिया का स्वभाव और उसके साथ एकता; मसीह के विषय शिक्षा, मसीह के बारे में विचार (पुनरूत्थान, परिशुद्ध एकता, उसका व्यक्तित्व एवं कार्य आदि); आत्माओं का ज्ञान, पवित्रा-आत्मा के बारे में शिक्षा (उसका व्यक्तित्व एवं कार्य); और अन्त समय सम्बन्ध्ति चर्चा, अन्तिम बातों पर विचार तथा इतिहास के अन्त का पूर्वानुमान. ये सब शिक्षाएं अन्य धर्मों की तुलना में अद्वैत हैं. थियोलाजी प्रत्येक मुख्य वर्ग में उप-शिक्षाएं हैं. उदाहरणार्थ, उद्धार की शिक्षा में हम भ्रष्ट अवस्था देखते हैं, दोषारोपण देखते हैं, अनुग्रह देखते हैं; प्रायश्चित देखते है, मेल करना देखते है, बुलाहट, नया जीवन, मसीह के साथ एकता, मन फिराव (पश्चाताप/विश्वास) देखते हैं; धर्मी ठहराया जा देखते हैं, परमेश्वर का लेपालक होना देखते हैं पवित्राीकरण देखते हैं, अनन्त सुरक्षा (यत्न करना), चुनाव/पूर्णनियति, उद्धार तथा मृत्यु; पुनरूत्थान तथा अन्तिम दशा देखते हैं. इनमें से एक भी विषय या सब विषयों का अध्ययन असीमित आशिषें प्रदान करेगा.

गैर मसीहियों द्वारा इसाई धर्म का पक्ष

1. डॉ. एंथनी उड़ान भरी, There Is a God (यह एक पूर्णकालिक विख्यात नास्तिक के अति रोचक है जो उसने परमेश्वर को स्वीकार करके मसीही धर्म के विषय दृढ़ संवेदना के साथ, एकमात्र संभावित प्रकाशन स्वरूप लिखे हैं. “The New Atheists and Remembering a Notorious Atheists’ Prayer, “(9 पार्ट्स);http://www.jashow.org/wiki/index.php/The_New_Atheists_and_Remembering_A_Notorious_Atheists%E2%80%99_Prayer.

2. Pinchas Lapide, The Resurrection of Jesus: a Jewish Perspective (एक सुविख्यात रूढि़वादी यहूदी लेखक द्वारा प्रभु यीशु के देहिक पुनरूत्थान का औचित्य निर्धारण! यद्यपि यह प्रभु यीशु का पुनरूत्थान एक परिपेक्ष्य में सिद्ध तो करता है परन्तु उसका वाद प्रबल नही है.)

3. Dr. Randy L. Wysong, The Creation Evolution Controversy, यह एक जानवरों के वैज्ञानिक, पोषणविज्ञानी और मसीही धर्म के आलोचक द्वारा अति उत्तम एवं संतुलित वैज्ञानिक वाद है. (यदि समय मिला तो मैं इस दस वर्शीय समय में लिखित पुस्तक-Solving the Big Questions As If Thinking Matters: Why Materialism, Evolution and Religion Have It Wrong(2010), रचना करने 10 वर्षों की आवश्यकता है कि एक किताब.   क्षण के लिए, मैं सही धर्म पर का इसके बारे में 90% आम तौर पर, दुर्भाग्य से, उचित रूप में पक्षपाती स्रोतों के एक अज्ञात संख्या का उपयोग झूठी मान्यताओं को स्वीकार करने, बाइबिल ईसाई धर्म जैसे एक निष्पक्ष सुनवाई नहीं देना चाहता है कि उल्लेख हो सकता है. हालांकि वह अच्छा धर्म है, वह निष्पक्ष में अच्छी तरह से वाकिफ ईसाई Apologetics (देखा था क्या समझता है के लिए आभारी जैसे परमेश्वर लिए कारण   Christian Apologetics: A Comprehensive Case for Biblical Faith, नीचे 52 क्रमांक देखें) और सावधानी पूर्वक आपने उसी उद्देश्य से धर्मवार्ता और बाइबल के मसीही विश्वास पर विचार करना The Creation Evolution Controversy, जिस उद्देश्य से उसने ज्ीम ब्तमंजपवद म्अवसनजपवद ब्वदजतवअमतेल पुस्तक लिखी थी तो उसका निश्कर्ष भिन्न होता. अभी तो देखने में ऐसा लगता है कि उसकी आलोचना मुख्यतः मानववादी है और अभी तक वह अपने विषय “त्नसमे व िम्दहंहमउमदज” तथा ष्जतनजी पिसजमतेष् (अध्याय 3) को पूरी तरह बाइबल के मसीही विश्वास में सुव्यवस्थित नहीं कर पाया है. उदाहरणार्थ, प्रमाण, तथ्य, अनुभव और तर्क आदि मसीही विश्वास को स्वीकार करते हैं. तथापि, यह एक उचित चेतावनी है कि उसके विवाद उन मसीही जनों को विमूढ़ कर देंगे या भयभीत करेंगे जिन्होंने धर्म का औचित्य निर्धारण तथा थियोलाॅजी का उचित अध्ययन नहीं किया है. वाइसाॅग की यह पुस्तक भी आर्थर कस्टाँग और जी. के. चेस्टरटन की नाई मूल पुस्तक है परन्तु The Coming Darkness), उम्मीद है, यह का डा. Wysong दार्शनिक अपनाया गया है, हालांकि मामलों पर पुनर्विचार करेंगे. भले ही, डा. Wysong के लिए प्रार्थना कर मुझे उसमें में शामिल होने के लिए धन्यवाद. (एक अलग रूप में, डा. Wysong के रूप में पालतू पशु खाद्य पदार्थ के बारे में सत्य   अपने पशु पोषण दृष्टिकोण है अद्वितीय काफी साथी जानवर की जीवन का विस्तार वा बचत हो सकती है, वह पशु चिकित्सा विज्ञान के लिए पूरा करने के लिए मदद करने जो क्या तर्कसंगत पूरक वैकल्पिक चिकित्सा (सीएएम) जो पारंपरिक चिकित्सा के लिए पूरा करने के लिए मदद कर रहा है, जो जाहिरा तौर पर उत्तरार्द्ध दवा जो , मौत उसमें अमेरिका (म Mercola.com, उसमें “Death चिकित्सा टाइप करने खोज इंजन का उपयोग “) के प्रमुख कारण, nutraceuticals सहित जैसे, खुले दिमाग चिकित्सा विज्ञान दवा ध्वनि पोषण,.)

अंत नोट्स (जबतक सभी इंजील संदर्भ है एनआईवी, NASB, ईएसवी.)

नोट्स

1. ↑ Thanks to Dr. Norman Geisler for this idea, unfortunately, given the blessings of age, I can’t remember where.

2. ↑ Donald J. Westblade, “The Sovereignty of God in the Theology of Jonathan Edwards,” in Sam Storms & Justin Taylor, For the Fame of God’s Name: Essays in Honor of John Piper,

3. ↑ John Piper, The Pleasures of God: Meditations on God’s Delight in Being God, 2000, 311. One of the top five books I have read.

4. ↑ See Sam Storms, “Christian Hedonism: Piper and Edwards on the Pursuit of Joy in God,” in Sam Storms, Justin Taylor, eds., For the Fame of God’s Name: Essays in Honor of John Piper.

5. ↑ “Now we see but a poor reflection as in a mirror; then we shall see face to face. Now I know in part; then I shall know fully, even as I am fully known” (१ कुरिन्थियों 13:12).

6. ↑ Adapted From William Lane Craig’s short treatise on molinism, The Only Wise God: the Compatibility of Divine Foreknowledge and Human Freedom, उपसंहार, 153.

7. ↑ Sam Storms, “Christian Hedonism: Piper and Edwards on the Pursuit of Joy in God,” in Sam Storms, Justin Taylor, eds., For the Fame of God’s Name: Essays in Honor of John Piper, pp. 57 (CS Lewis quote), 60.

8. ↑ Timothy Keller, The Reason for God: Belief in an Age of Skepticism, 2008, 191-192, 231. Obviously, this is a general summary statement; in actions, sins are expressed outward from one’s nature and one’s adopted identity.

9. ↑ Illustrated in the following, excerpted from my Handbook of Biblical Evidences: “The late Dr. Mortimer J. Adler was one of the great modern thinkers. He is author of such important than books as Ten Philosophical Mistakes, Truth in Religion, How to Think About God, was chairman for the Board of Editors for the Encyclopædia Britannica, and architect and editor-in-chief for the 54-volume The Great Books of the Western World  library [which I sold in college]. This collection contains the writings of the most influential and greatest intellects and thinkers in Western history—from Aristotle to Shakespeare. In Volume 1 of The Great Ideas: A Syntopicon of The Great Books of the Western World, Adler points out the crucial importance of the issue of God’s existence to the greatest thinkers of the Western world. With the exception of only certain mathematicians and physicists (who would certainly be included today had they been privy to the modern advances in physics and mathematics), “all the authors of the great books are represented. . . . In sheer quantity of references, as well as in variety, this is the largest chapter. The reason is obvious. More consequences for thought and action follow from the affirmation or denial of God than from answering any other basic question.” (Mortimer J. Adler, editor in chief, William Gorman, general editor, The Great Ideas: A Syntopicon of Great Books of the Western World (Chicago: IL: Encyclopædia Britannica, 1952), Vol. 1, 543).

10. ↑ मत्ती 22:37-38. और जाहिर है, दूसरा.

11. ↑ Sam Storms, “Christian Hedonism: Piper and Edwards on the Pursuit of Joy in God,” in Sam Storms, Justin Taylor, eds., For the Fame of God’s Name: Essays in Honor of John Piper, 2010, 55.

12. ↑ The End for Which God Created the World, Edwards philosophically and scripturally defends the idea that God created the world for His own glory. Because genuine happiness originates and concludes only in God, human joy, particularly eternal joy, is a genuine part of God’s glory. Samuel Hopkins observes in his preface to Edwards book that, “The end which God had in view in creating the world was doubtless worthy of him, and consequently the most excellent and glorious possible. This therefore must be worthy to be known by all the intelligent creation, as excellent in itself, and worthy of their pursuit.” Edward concludes his The End for Which God Created the World with the following discussion: “The more happiness the greater union [with God]: when the happiness is perfect, the union is perfect. And as the happiness will be increasing to eternity, the union will become more and more strict and perfect; nearer and more like to that between God the Father and the Son; who are so united, that their interest is perfectly one. If the happiness of the creature be considered as it will be, in the whole of the creature’s eternal duration, with all the infinity of its progress, and infinite increase of nearness and union to God; in this view, the creature must be looked upon as united to God in an infinite strictness. “If God has respect to something in the creature, which he views as of everlasting duration, and as rising higher and higher through that infinite duration, and that not with constantly diminishing (but perhaps an increasing) celerity [speed, swiftness]: then he has respect to it as, in the whole, of infinite height; though there never will be any particular time when it can be said already to have come to such an height. “Let the most perfect union with God be represented by something at an infinite height above us; and the eternally increasing union of the saints with God, by something that is ascending constantly towards that infinite height, moving upwards with a given velocity; and that is to continue thus to move to all eternity. God who views the whole of this eternally increasing height views it as an infinite height. And if he has respect to it, and makes it his end, as in the whole of it, he has respect to it as an infinite height, though the time will never come when it can be said it has already arrived at this infinite height. “God aims at that which the motion or progression which he causes aims at, or tends to. If there be many things supposed to be so made and appointed, that by a constant and eternal motion, they all tend to a certain center; then it appears that he who made them and is the cause of their motion, aimed at that center, that term of their motion to which they eternally tend, and are eternally, as it were, striving after. And if God be this center, then God aimed at himself. And herein it appears that as he is the first author of their being and motion, so he is the last end, the final term, to which is their ultimate tendency and aim. “We may judge of the end that the Creator aimed at, in the being, nature and tendency he gives the creature, by the mark or term which they constantly aim at in their tendency and eternal progress; though the time will never come when it can be said it is attained to, in the most absolutely perfect manner. “But if strictness of union to God be viewed as thus infinitely exalted; then the creature must be regarded as infinitely, nearly and closely united to God. And viewed thus, their interest must be viewed as one with God’s interest; and so is not regarded properly with a disjunct and separate, but an undivided respect. And as to any difficulty of reconciling God’s not making the creature his ultimate end, with a respect properly distinct from a respect to himself; with his benevolence and free grace, and the creature’s obligation to gratitude, the reader must be referred to Ch. I, Sec. IV, Obj. 4 where this objection has been considered and answered at large. “If by reason of the strictness of the union of a man and his family, their interest may be looked upon as one, how much more one is the interest of Christ and his church (whose first union in heaven is unspeakably more perfect and exalted, than that of an earthly father and his family), if they be considered with regard to their eternal and increasing union! Doubtless it may justly be esteemed as so much one that it may be supposed to be aimed at and sought, not with a distinct and separate, but an undivided respect. “’Tis certain that what God aimed at in the creation of the world was the good that would be the consequence of the creation, in the whole continuance of the thing created. ‘Tis no solid objection against God’s aiming at an infinitely perfect union of the creature with himself, that the particular time will never come when it can be said, the union is now infinitely perfect. God aims at satisfying justice in the eternal damnation of sinners; which will be satisfied by their damnation, considered no otherwise than with regard to its eternal duration. But yet there never will come that particular moment, when it can be said, that now justice is satisfied. But if this don’t satisfy our modern freethinkers, who don’t like the talk about satisfying justice with an infinite punishment; I suppose it will not be denied by any that God, in glorifying the saints in heaven with eternal felicity, aims to satisfy his infinite grace or benevolence, by the bestowment of a good infinitely valuable, because eternal: and yet there never will come the moment, when it can be said, that now this infinitely valuable good has been actually bestowed. (Jonathan Edwards, The End for Which God Created the World (1765), The Jonathan Edwards Center at Yale University;http://edwards.yale.edu/archive?path=aHR0cDovL2Vkd2FyZHMueWFsZS5lZHUvY2dpLWJpbi9uZXdwaGlsby9nZXRvYmplY3QucGw/Yy43OjU6My53amVv.

13. ↑ नोट 12 देखें.

14. ↑ Cited in Sam Storms, “Christian Hedonism: Piper and Edwards on the Pursuit of Joy in God,” in Sam Storms, Justin Taylor, eds., For the Fame of God’s Name: Essays in Honor of John Piper, 2010, 60.

15. ↑ Ibid., 66.

16. ↑ उत्पत्ति 1 :26-27.

17. ↑ John Piper, देखें The Pleasures of God: Meditations on God’s Delight in Being God. For the importance and frequency of joy as found in the old and New Testament see the article on joy in theInternational Standard Bible Encyclopedia  में: biblios; http://topicalbible.org/j/joy.htm  For example: “… joy as a religious [biblical, than Christian] emotion is very frequently referred to in the Old Testament. Religion is conceived of as touching the deepest springs of emotion, including the feeling of exultant gladness which often finds outward expression in such actions as leaping, shouting, and singing. Joy is repeatedly shown to be the natural outcome of fellowship with God. “In thy presence is fullness of joy; in thy right hand there are pleasures for evermore” (भजन 16:11, compare 16:8, 9). God is at once the source (भजन 4: 7; भजन 51:12) and the object (भजन 35:9 यशायाह 29:19) of religious joy. The phrase “rejoice (be glad) in Yahweh” and similar. expressions are of frequent occurrence (जैसे भजन 97:12, भजन 149:2 यशायाह 61:10 जकर्याह 10: 7 .) Many aspects of the Divine character call forth this emotion, such as His lovingkindness (भजन 21:06, 7, भजन 31:7), His salvation (भजन 21:01 यशायाह 25:9 Habakkuk 3: 18), His laws and statutes (भजन 12, 119 passim), His judgments (भजन 48:11), . His words of comfort in dark days (यिर्मयाह 15:15, 16) The fundamental fact of the sovereignty of God, of the equity of the Divine government of the world, gives to the pious a joyous sense of security in life (भजन 93:1, भजन 96:10, भजन 97:1) which breaks forth into songs of praises in which even inanimate Nature is poetically called upon to join (भजन 96:11-13; भजन 98:4-9) …. The element of joy in religion is still more prominent in the New Testament. It is the appropriate response of the believer to the “good tidings of great joy” which constitute the gospel (ल्यूक . 2: 10) “”Jesus confers on His followers not only peace (14:27 यूहन्ना; (16:33 यूहन्ना), but participation in His own fullness of joy (15:11 यूहन्ना; (16:24 यूहन्ना; (यूहन्ना : 13), a joy which is permanent, in contrast to the sorrow which is transient (16:22 यूहन्ना).” “In Christ, the Christian “rejoices with joy unspeakable and full of glory” . (1 पीटर (18), in spite of his temporary afflictions (1 पीटर (16) Christian joy is no mere gaiety that knows no gloom, but is the result of the triumph of faith over adverse and trying circumstances, which, instead of hindering, actually enhance it (5 प्रेरितों: 41 रोमियों 5: 3; याकूब (12, 12; याकूब 5: 11 (1 पीटर 4: 13; तुलना मत्ती 5: 11, 12 ). ”

18. ↑ Sam Storms, “Christian Hedonism: Piper and Edwards on the Pursuit of Joy in God,” in Sam Storms, Justin Taylor, eds., For the Fame of God’s Name: Essays in Honor of John Piper, 2010, 54.

19. ↑ Cited in Sam Storms, “Christian Hedonism: Piper and Edwards on the Pursuit of Joy in God,” in Sam Storms, Justin Taylor, eds., For the Fame of God’s Name: Essays in Honor of John Piper, 2010, 53, citing Jonathan Edwards sermon, “Nothing on Earth Can Represent the Glories of Heaven”.

20. ↑ भजन 36:8.

21. ↑ यशायाह 61:7.

22. ↑ भजन 21:06.

23. ↑ (15:11 यूहन्ना) To my way of thinking, joy is a more settled state of mind independent of circumstances while happiness is typically circumstantially dependent; joy can exist even in the presence of great suffering, persecution or tragedy, as Christ’s disciples often illustrated in the book of Acts and as the apostle Paul demonstrated in his book of Philippians (written while in horrible dungeon conditions), yet joy is one of his most frequently used words. Jesus wanted His disciples to be as joyful as He was: “I have told you this so that my joy may be in you and that your joy may be complete”. Thus, despite the circumstances of life: “Consider it शुद्ध खुशी, my brothers, whenever you face trials of many kinds,…” (याकूब 1: 2), “हम भी उसमें हमारे कष्टों आनन्दित, because we know that suffering produces perseverance;…” (रोमियों 5: 3 CF मत्ती 5: 12; 1 पीटर 16.). “, उस दिन उसमें आनन्द खुशी के लिए छलांग, निहारना के लिए, उनके पिता के लिए अपने प्रतिफल जो महान उसमें स्वर्ग, “(ल्यूक 6:23).” नबियों को एक ही बात थी कि मैं आराम से भर रहा हूँ. मैं आनन्द के साथ अतिप्रवाह  उसमें हमारे दु: ख “(2 कुरिन्थियों 7: 4).” सबसे गंभीर परीक्षण से उनके आनन्द ढेर   अपने चरम गरीबी उसमें अमीर उदारता में आंसू आ गए “(2 कुरिन्थियों 8: 2).” कोई नहीं (16:22 यूहन्ना) Jesus desires “the full measure of my joy [to be] within” those who trust in Him (यूहन्ना अपनी खुशी “दूर ले जाएगा [ सूली पर चढ़ाये जाने पर शोक चेलों दु: ख के बावजूद].: 14:27 यूहन्ना 13) Further, in light of God’s sovereignty and promises, in our hearts and minds Jesus gives us true peace: “I am leaving you at peace. I am giving you my own peace. I am not giving it to you as the world gives. So don’t let your hearts be troubled, and don’t be afraid” (). “Do not be anxious about anything, but in everything, by prayer and petition, with thanksgiving, present your requests to God. And the peace of God, which transcends all understanding, will guard your hearts and your minds in Christ Jesus” (फिलिप्पियों 4 :6-7). “… परमेश्वर की किंगडम ‘ पीने, नहीं खा जो धर्म, शांति, खुशी  उसमें पवित्र आत्मा “(रोमियों 14:17).

24. ↑ Westblade, “The Sovereignty of God in the Theology of Jonathan Edwards,” in Storms & Taylor, For the Fame of God’s Name,, 123.

25. ↑ यशायाह 42:8. God may permit it for a season, in one sense, but only for the most fleeting amount of time compared to eternity. And, in another sense, nothing can rob God of His glory, even human sin and rebellion. As भजन 76:10 observes, even the wrath of man praises God, which is one reason the saints will actually rejoice over the eternal condemnation of the wicked (प्रकाशितवाक्य 19:1-3), knowing such condemnation is perfectly (indeed, infinitely) fair, just and righteous. When true justice and righteousness have been achieved forever, it must be rejoiced over – all people understand this, even those in Hell. Thus, “God is glorified in the judgment of the wicked. The defiant resistance against the Lord by some does not rob him of glory but actually manifests it, for his justice is displayed in the punishment of the ungodly (रोमियों 1: 18 [सीएफ 9:. 22]) “(Thomas R. Schreiner, “A Biblical Theology of the Glory of God,” in Storms and Taylor, 220, emphasis original.)

26. ↑ Cited in Sam Storms, “Christian Hedonism: Piper and Edwards on the Pursuit of Joy in God,” in Sam Storms, Justin Taylor, eds., For the Fame of God’s Name: Essays in Honor of John Piper, 2010, 63, emphasis original.

27. ↑ Ibid., 68.

28. ↑ Ibid.

29. ↑ १ यहुन्ना 4: 8, 16.

30. ↑ Keller, 224.

31. ↑ “There is no wisdom, no insight, no plan that can succeed against the LORD.” (नीतिवचन 21:30) “Everything comes from you, and we have given you only what comes from your hand.” (1 इतिहास 29:14) “For from him and through him and to him are all things. To him be the glory forever! Amen” (रोमियों 11:36). . “Now to the King eternal, immortal, invisible, the only God, be honor and glory for ever and ever. Amen” (1 टिमोथी (117) “O LORD, our Lord, how majestic is your name in all the earth! You have set your glory above the heavens” (भजन 8: 1.) “In him we were also chosen, having been predestined according to the plan of him who works out everything in conformity with the purpose of his will,…” (इफिसियों (111) Jonathan Edwards की स्वतंत्रता विल  (1754), a classic on God’s sovereignty, has been designated, Yale University observes, as one of the 500 most important works in American history. Consider the following description of Edward’s understanding of God’s sovereignty: “Edwards understands God’s absolute right and power to dispose over all things as he wills. Sovereignty presupposes God’s all-sufficiency, his utter independence from all influences, motives, standards, and resources outside of himself, an inexhaustible power to create as he wills, to assign purposes to all the creates, and to serve as cause to every effect in his creation, and an unlimited title to dispose over creation according to the designs he intends for each part. In entry no.1263 Edwards expresses the sum of God’s sovereignty like this: in God ‘there is no other law than only the law of the infinite wisdom of the omniscient first cause and supreme disposer of all things who in one, simple, unchangeable, perpetual view comprehends all existence in its utmost compass and extent and infinite series.'” (Donald J. Westblade, “The Sovereignty of God in the Theology of Jonathan Edwards,” in Storms & Taylor, 108-109; cf. Edwards’ “The Sovereignty of God in Salvation”; http://www.biblebb.com/files/edwards/je-sovereign.htm).

32. ↑ Donald J. Westblade, “The Sovereignty of God in the Theology of Jonathan Edwards,” in Storms & Taylor, 106.

33. ↑ “And हम  कि परमेश्वर कारणों बातें [Panta: all, any, totality, whole, every kind of, every, each] to work together for good to those who love God, to those who are called according to His purpose.” Part of the explanation for रोमियों 8: 28 is described in verses 29-30: “For those God foreknew he also predestined to be conformed to the image of his Son, that he might be the firstborn among many brothers and sisters. And those he predestined, he also called; those he called, he also justified; those he justified, he also glorified.” But the unbroken and unbreakable chain – if you are foreknown [known intimately] you are by definition glorified. The use of foreknown (implying certain and thus fixed knowledge) contextually reminds me of of यिर्मयाह 31:3 “I have loved you with an everlasting love. Therefore I have drawn you with lovingkindness,” which at least suggests this foreknowledge may involve an eternal intimate love as in the Old Testament sense of the man “knowing” a woman, but applied here to God’s eternal love for His people. Obviously the foreknowledge here cannot be universal of all humans because Universalism would then be taught and we know this is not biblical (not all are saved); therefore the knowledge must be restricted. In Gill’s Exposition of the Entire Bible we read: “… this regards the everlasting love of God to his own people, his delight in them, and approbation of them; in this sense he knew them, he foreknew them from everlasting, affectionately loved them, and took infinite delight and pleasure in them; and this is the foundation of their predestination and election, of their conformity to Christ, of their calling, justification, and glorification…” (Biblios, रोमियों 8: 29; http://bible.cc/romans/8-29.htm) इफिसियों 1 देखें: 11; 3: 11.Many अच्छा संकलन को संक्षेप सामयिक, परमेश्वर का वादा किया है, विशेष इलाज एक को पढ़ने के लिए.

34. ↑ फिलिप्पियों 4: 4, आईएसवी.

35. ↑ फिलिप्पियों 4: 4, परमेश्वर के शब्द.

36. ↑ 1 थिस्सलुनीकियों 5: 16, NLT.

37. ↑ 1 थिस्सलुनीकियों 5: 16, वेबस्टर.

38. ↑ Acts 17: 25.

39. ↑ “God may therefore bring many and great afflictions upon the godly, as he intends to bestow upon them an infinitely greater good, and designs them as a means of a far greater good, though all their sins are satisfied for.” (Jonathan Edwards, “The Miscellanies,” No. 414: Sovereignty of God. Affliction of the Godly; http://edwards.yale.edu/archive?path=aHR0cDovL2Vkd2FyZHMueWFsZS5lZHUvY2dpLWJpbi9uZXdwaGlsby9nZXRvYmplY3QucGw/Yy4xMjo0OjUzLndqZW8=).

40. ↑ याकूब 1: 17, सेंट्रल यूरोप.

41. ↑ ल्यूक : 17.

42. ↑ रोमियों 1: 21

43. ↑ Thomas R. Schreiner, “A Biblical Theology of the Glory of God,” in Storms and Taylor, 223

44. ↑ मत्ती 18:03. V.4 देखें, 19:14

45. ↑ Thomas R. Schreiner, “A Biblical Theology of the Glory of God,” in Storms and Taylor, 222

46. ↑ प्रेरितों 16:31.

47. ↑ कुलुस्सियों 2: 13

48. ↑ युहन्ना 6:47.

49. ↑ Regeneration, adoption, justification, union with Christ, sanctification, glorification, etc. See J I Packer, God’s Words Lewis Sperry Chafer, Systematic Theology वॉल्यूम 3: Soteriologवाई (or salvation). See “systematic theology” above.

50. ↑ Sam Storms, “Christian Hedonism: Piper and Edwards on the Pursuit of Joy in God,” in Sam Storms, Justin Taylor, eds., For the Fame of God’s Name: Essays in Honor of John Piper, 2010, 64-65.

51. ↑ Keller, 223.

52. ↑ John Piper, Pierced by the Word, 2003, 24.

53. ↑ Ibid., 19.

54. ↑ १ यहुन्ना 4: 8, 16.

55. ↑ John Piper, The Pleasures of God, 311-12.

56. ↑ रोमियों 8: 18.

57. ↑ In part, this verse , 1 कोर. 2: 9, is true enough considering those prior to the Christian dispensation, and in part, what God has prepared for us has already been revealed to us through Christ’s atoning death, salvation and the word of God generally. However, I believe this verse can be applied to eternity also, in part because it fits by definition, and the next verse refers to “the deep things of God.” True enough, election alone and being with God forever are indescribably wonderful in and of themselves, with nothing more. However, given the wonders and delights of this present yet seriously fallen world, only an eternity in God’s presence and an infinite-eternal Heaven itself with all these imply to our imaginations (and for all purposes infinitely more than our imaginations imply), is what we will actually experience in eternity, and so also accurately fits this verse.

58. ↑ निर्गमन 3: 14.

59. ↑ For example, the late Mortimer Adler was one of the world’s leading philosophers. He was chairman of the board of editors for The Great Books of the Western World Syntopicon, director of the prestigious Institute for Philosophical Research in Chicago, and author of , , How to Think About God, , plus over twenty other challenging books. He simply asserts, “I believe Christianity is the only logical, consistent faith in the world.” How could Adler make such a statement? Because he knows it can’t rationally be made of any other religion. Philosopher, historian, theologian, and trial attorney John Warwick Montgomery, holding 11 graduate degrees in various fields declares, “The evidence for the truth of Christianity overwhelmingly outweighs competing religious claims and secular world views.” How could an individual of such intellectual caliber as Dr. Montgomery use a descriptive phrase as “overwhelmingly outweighs” if it were obviously false? His fifty-plus books and one hundred-plus scholarly articles indicate exposure to a wide variety of non-Christian religious and secular philosophies. The individual considered by many to be one of the greatest philosopher in the world, Alvin Plantinga, recalls, “For nearly my entire life I have been convinced of the सच of Christianity.” On what basis can one of the world’s greatest philosophers make such a declaration if the evidence for Christianity is unconvincing, as critics charge? Dr. Drew Trotter is executive director of the Center for Christian Studies at Charlottesville, Virginia. He holds a doctorate from Cambridge University. He argues correctly that “logic and the evidence both point to the reality of absolute truth, and that truth is revealed in Christ.” If we are looking for obvious truths, then perhaps we should consider the words of noted economist and sociologist George F. Guilder, author of , who asserts, “Christianity is true and its truth will be discovered anywhere you look very far.” Alister McGrath is a former atheist, noted scientist, philosopher and theologian at Oxford and Cambridge universities, and president of the Oxford Center for Christian Apologetics, principal of Wycliffe Hall, Oxford University, and author of Intellectuals Don’t Need God and Other Myths. वहवाणी उस के लिए सबूत के बेहतर प्रकृति ईसाई धर्म जो अच्छा वैज्ञानिक अनुसंधान कर पाया कि उसमें करने जैसा: “When मैं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में मेरे डॉक्टरेट अनुसंधान उसमें आणविक जीव विज्ञान उपक्रम था, मैं अक्सर एक दिया अवलोकन समझाने के लिए पेशकश सिद्धांतों के एक नंबर के साथ सामना किया था . अंत , मैं भविष्य कहनेवाला क्षमता की सबसे बड़ी डिग्री सबसे बड़ी आंतरिक स्थिरता, अनुभवजन्य अवलोकन के डेटा पत्राचार के सबसे बड़ी डिग्री, पास उनमें से जो विषय में निर्णय करने के लिए किया था. मैं अग्रिम उसमें समझ की किसी भी संभावना परित्याग करने के लिए था, जब तक मैं इस तरह के एक निर्णय करने के लिए बाध्य किया गया था. … मैं ईसाई धर्म उसमें अर्थप्रकाशक भावना के ‘श्रेष्ठता’. “डॉ. कार्ल की बात करने के लिए अधिकार का दावा करेंगे. एफ एच हेनरी 20 वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण धर्मशास्त्रियों से एक एक विख्यात ईसाई विद्वान की तीन हजार पेज, छह मात्रा काम विषय लिखा God, Revelation and Authority. After his exhaustive analysis, Henry declared, “Truth is Christianity’s most enduring asset. . . .” How can he make such a claim if it is obviously false? Such accolades could be multiplied repeatedly. While testimonies mean little, if they are undergirded by the weight of evidence they can hardly be dismissed out of hand. Indeed, as Dr. Norman Geisler, author of the  Baker Encyclopedia of Christian Apologetics  and 70 other books, revealing wide exposure to skeptical views, comments, “In the face of overwhelming apologetic evidence, unbelief becomes perverse. . . .”

60. ↑ यशायाह 45:5.

61. ↑ 1 कुरिन्थियों 8:4, परमेश्वर के शब्द अनुवाद.

62. ↑ यूहन्ना 17:3.

63. ↑ उत्पत्ति 1, ल्यूक 2: 7; फिलिप्पियों 2 :5-11, 11:35 यूहन्ना; यूहन्ना 3: 16. Obviously, referring to the second person of the Trinity.

64. ↑ Acts 17: 31.

65. ↑ रोमियों 5: 8.

66. ↑ युहन्ना 5:24, परमेश्वर के शब्द अनुवाद.

67. ↑ 2 पीटर 3: 18.

68. ↑ Jonathan Edwards, “The Sovereignty of God in Salvation,”; http://www.biblebb.com/files/edwards/je-sovereign.htm.