बाइबिल- विश्व की सबसे अनोखी पुस्तक- भाग 1

द्वारा: Dr. John Ankerberg, Dr. John Weldon; ©2002

बाइबिल, मानव आविष्कार या चतुराई का उत्पाद नहीं है, और न ही यह सत्य और झूठ का एक मिश्रण है. यह एक गुप्त किताब नही है, जिसकी सही व्याख्या के लिए “उच्च” या “प्रबुद्ध” चेतना की आवश्यकता हो. न ही बाइबिल, एक अधूरा प्रकाशन है जिसे समझने या परमेश्वर के उद्देश्य को पूरा करने के लिए अतिरिक्त शास्त्र की आवश्यकता होती है, जैसा कि विविध पंथ दावा करते हैं. बाइबिल के दावे हमारे लिए बहुत कम विकल्प छोड़ते हैं. बाइबिल या तो परमेश्वर का त्रुटिहीन शाब्दिक वचन है- जैसा की वह दावा करती है-या फिर, यह जानना संभव ही नही है कि क्या परमेश्वर ने खुद को सच्चाई से हमारे सामने प्रकट किया है.

बाइबल के तथ्यों को मानवीय सिद्धांतों के सहारे द्वारा समझाया नहीं जा सकता है, और बाइबिल के आँकड़े स्वयं इसकी सामग्री की त्रुटिहीनता का एकमात्र विकल्प छोड़ते हैं. बाइबिल के परमेश्वर ने स्वयं को सत्य के परमेश्वर के रूप में प्रकट किया है, इसलिए उसके ऑटोग्राफ (मौलिक लेखन) में त्रुटियों का होना यह साबित करेगा कि परमेश्वर उसका लेखक नही है. वास्तव में, क्योंकि बाइबिल के अलावा और कोई धर्म अपने परमेश्वर में विश्वास के प्रामाणिक सबूत प्रदान नहीं करता है, इसलिए बाइबिल के बाहर, हम संशयवादी होने के लिए मजबूर हो जाते है. उसका आस्तित्व हो सकता है, लेकिन उसके सामान्य प्रकाशन से परे, उसके बारे में हम कुछ भी नहीं जान सकते हैं. बाइबल क्या है, यह समझने के लिए, निम्नलिखित सात बातें आवश्यक हैं.

1. बाइबिल प्रेरणा

बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा शब्द होने का दावा करती है. “हर एक पवित्राशास्त्रा परमेश्वर की प्रेरणा [Theop-neustos] से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है. ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए” (2 टिमोथी 3: 16). क्या मायने में बाइबिल प्रेरित है? बाइबिल प्रेरित है (a) मौखिक ( सही शब्दों को ओर बढ़ा, शास्त्रों कि केवल सोच नही ), (b) पूर्ण (इंजील के हर हिस्से के लिए समान रूप से विस्तार) और (c) सुबोध (विद्वानों या तकनीकी जानकारी के लिए सहारा के बिना समझने और आध्यात्मिक मनुष्य होने के लिए औसत व्यक्ति के लिए पर्याप्त रूप से स्पष्ट). प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, बाइबिल दावा या सूचित करती है दिव्य प्रेरणा का सैकड़ों बार. यहाँ कई उदाहरण हैं:

यहोवा की ओर से यह वचन यिर्मयाह के पास पहुंचा, एक पुस्तक लेकर जितने वचन मैं ने तुझ से योशिय्याह के दिनों से लेकर अर्थात् जब मैं तुझ से बातें करने लगा उस समय से आज के दिन तक इस्राएल और यहूदा और सब जातियों के विषय में कहे हैं, सब को उस में लिख। (यिर्मयाह 56:1-2)

उस ने उत्तर दिया; कि लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा. (मत्ती 4: 4)

क्योंकि कोई भी भविष्यद्वाणी मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं हुई पर भक्त जन पवित्रा आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्वर की ओर से बोलते थे. (2 पीटर 1: 21)

क्योंकि मैं ने अपनी ओर से बातें नहीं कीं, परन्तु पिता जिस ने मुझे भेजा है उसी ने मुझे आज्ञा दी है, कि क्या क्या कहूं? और क्या क्या बोलूं?….और मैं जानता हूं, कि उस की आज्ञा अनन्त जीवन है इसलिये मैं जो बोलता हूं, वह जैसा पिता ने मुझ से कहा है वैसा ही बोलता हूं. (12:49-50 यूहन्ना)

यीशु मसीह का प्रकाशितवाक्य जो उसे परमेश्वर ने इसलिये दिया, कि अपने दासों को वे बातें, जिन का शीघ्र होना अवश्य है. (प्रकाशितवाक्य 1: 1)

पूर्व युग में परमेश्वर ने बापदादों से थोड़ा थोड़ा करके और भांति भांति से भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें करके…. (इब्रियों 1: 1)

यहोवा का वचन बेरी के पुत्रा होशे के पास पहुंचा…. (होशे 1: 1) यहोवा का वचन बूजी के पुत्रा यहेजकेल याजक के पास पहुचा (ईजेकील 1: 5)

तब मूसा ने यहोवा के सब वचन लिख दिए. (निर्गमन 24:4; भी 31:24 देखें)

कि तुम उन बातों को, जो पवित्रा भविश्यद्वक्ताओं ने पहिले से कही हैं और प्रभु, और उद्धारकर्ता की उस आज्ञा को स्मरण करो, जो तुम्हारे प्रेरितों के द्वारा दी गई थी…. और हमारे प्रभु के धीरज को उद्धार समझो, जैसे हमारे प्रिय भाई पौलुस न भी उस ज्ञान के अनुसार जो उसे मिला, तुम्हें लिखा है…. वैसे ही उस ने अपनी सब पत्रियों में भी इन बातों की चर्चा की है जिन में कितनी बातें ऐसी है, जिनका समझना कठिन है, और अनपढ़ और चंचल लोग उन के अर्थों को भी पवित्रा शास्त्रा की और बातों की नाईं खींच तानकर अपने ही नाश का कारण बनाते हैं. (2 पीटर 3: 2, 15, 16 nas)

2. पवित्र शास्त्र शक्तिशाली आधिकारिक है

“यहोवा की यह भी वाणी है कि क्या मेरा वचन आग सा नहीं है? फिर क्या वह ऐसा हथौड़ा नहीं जो पत्थर को फोड़ डाले?” (यिर्मयाह 23:29). क्योंकि बाइबल परमेश्वर का वचन है, यह सब पृथ्वी में सबसे महत्वपूर्ण साहित्य है. यह महत्वपूर्ण है कि वह क्या है और वह क्या करता है. ” ‘उसी प्रकार से मेरा वचन भी होगा जो मेरे मुख से निकलता है… वह व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा, परन्तु, जो मेरी इच्छा है उसे वह पूरा करेगा, और जिस काम के लिये मैं ने उसको भेजा है उसे वह सुफल करेगा” (यशायाह 55:11). “क्योंकि परमेश्वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है, और जीव, और आत्मा को, और गांठ गांठ, और गूदे गूदे को अलग करके, वार पार छेदता है; और मन की भावनाओं और विचारों को जांचता है” (इब्रानियों 4: 12). अपनी दिव्य प्रकृति के कारण, बाइबिल की अज्ञानता आध्यात्मिक और अन्यथा भी खतरनाक है.. जैसा यीशु ने अपने दिन के पाखंडी धार्मिक नेताओं से कहा, “यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि तुम पवित्र शास्त्र और परमेश्वर की सामर्थ नहीं जानते; इस कारण भूल में पड़ गए हो” (मत्ती 22:29).