बौद्ध धर्म बनाम ईसाई धर्म

द्वारा: Dr. John Ankerberg / Dr. John Weldon; ©2002

एक ऐसे युग में जहाँ हर बात को बर्दाश्त किया जाता हे, कुछ मसीही विश्वासियों ने बुद्ध धर्म को अपना लिया है जबकि मसीही विश्वास तथा बुद्ध धर्म को संयोजित करने के लिए दोनों धर्मों के धार्मिक एकता के पक्षधर अनुओं द्वारा अनेक प्रयास किए जा चुके है. मसीही विश्वास में ऐसी दुर्बलता नहीं परन्तु जब ऐसा आमना-सामना होता है तो मसीही विश्वास हानि उठाता है. विश्वविद्यालय परिसरों पर मित्रतापूर्ण मसीही और बुद्ध अनुयायियों द्वारा बाद-विवाद प्रचलित हैं. “मसीही धर्म” में ऐसी कोई दुर्बलता नहीं है परन्तु वह अक्सर ऐसे वाद-विवादों में हार जाता है. इस प्रकार, प्रमुख कलीसियाओं के मसीही जो बाइबल आधारित मसीही विश्वास को उचित रूप से समझ नहीं पाए हैं बौधिक आध्यात्मवाद के सूफी सिद्धांत से योग से आकर्षित और प्रलोभित होकर, अपने धर्म को त्याग कर बुद्ध धर्म को अपना लेते हैं: या, वे दोनों धर्मों का एक अंसबद्ध मिश्रण बना देते हैं, जो दोनों धर्मों की निष्ठा नहीं निभाता है. दूसरी ओर, बौद्ध धर्म के लोग जो मसीही धर्म अपनाते हें, वे मसीही धर्म को अपने बौधिक धर्म के अनुसार ही परिभाषित करते हैं. टोक्यो और हार्वर्ड विश्वविद्यालयों के बौद्ध धर्म और जापानी अध्ययन के प्रोफेसर : Masaharu Anesaki बुद्ध के साथ यीशु की तुलना करके इस तथ्य को सिद्ध करता है:

संक्षेप में, हम बौद्धिक लोग मसीही धर्म स्वीकारने के लिए तैयार हैं, नहीं, अधिक, बुद्ध में हमारा विश्वास मसीह में विश्वास हे. हम मसीह को देखते हैं क्योंकि हम बुद्ध को देखते हें…. हम मसीह के पुन: आगमन  की आशा व्यर्थ में नहीं रखते क्योंकि यह बुद्धा के प्रकट होने की भविष्यवाणी के विषय में हे. [1]  (रेखांकित वाक्य मूल लेख से है)

फिर भी, इन धर्मों के बीच “एकता” के भाव लाने के बजाये, सच्चाई ज्यादा करीब Zen Buddhist D.T. Suzuki के हार्दिक विचारों में हे, जो नि:संदेह बौद्धिक कष्टवहन के बौद्धिक सिद्धांत को प्रकट करते हुए कहता है, “जब भी में क्रूस पर लटकाए हुए मसीह की तस्वीर को देखता हूँ तब मैं मसीही धर्म और बौद्ध धर्म दोनों के बीच उपस्थित अंतर के विषय में सोचे बिना नहीं रह सकता.” [2]

सच तो यह है कि बौद्ध धर्म और मसीही धर्म के बीच समानता का आशय मात्र सतही है. उदाहरण के लिए अनेक विचारक, बौद्ध धर्म में बोधिसत्व के रक्षक की भूमिका कई मसीही धर्म में यीशु मसीह की उद्धारक भूमिका में समानता का दावा करते है. लेकिन ये भूमिकाए पूरी तरह से एक दूसरी के विपरीत हैं. मसीही धर्म में, “मसीह हमारे पापों के लिए मारा गया” (1 कुरि. 15:03). इसका मतलब है, कि वह हमारे पापों के दंड को अपनी देह में उठाकर हमें बचाता है. यीशु ने पापियों के स्थान पर मरकर उनके पाप के दण्ड (मृत्यु) को चुकाया. इस प्रकार, वह किसी को भी उद्धार का निर्मोल वरदान प्रदान करता है अगर वह विश्वास करके उसके लिए किए गए मसीह के कार्य को स्वीकार करे (यूह. 3:16). मसीह के उद्धारक कार्य में मुख्य भूमिका है – परमेश्वर की पवित्रता, प्रतिस्थानक प्रायश्चित, पापक्षमा, उद्धार मसीह में विश्वास द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह के निर्मोल वरदान है. यह सब बौद्ध धर्म के लिए नई बातें है.

बोधिसत्व के उद्धारक की भूमिका मसीह की भूमिका की तुलना में बिल्कुल भिन्न है. बोधिसत्व में अनन्त पाप के विषय से कोई संबन्ध नहीं है, उनकी चिन्ता का विषय पीड़ा का अंत है. उसमे पाप के विरुद्ध परमेश्वर के क्रोध या प्रतिस्थापन प्रायश्चित का कोई विचार नहीं है. वे व्यक्तिगत अनन्त परमेश्वर में विश्वास नहीं करते है जिसने स्त्री और पुरुष को अपने स्वरुप में बनाया. वह प्रेमी परमेश्वर को भी नहीं मानते जिसने पापियों को निर्मोल मुक्ति प्रदान की है. उनका एक ही आत्मत्याग है जिसके द्वारा वह निर्वाण को प्राप्त करने में विलम्ब करें जिससे कि वे मनुष्यों को बुद्ध प्रदर्शित ज्ञान प्राप्त करने में सहायता कर पाएं. आत्म सिद्धि प्राप्त करके बोधिसत्व में मरणोपरान्त स्वतंत्रता  पूर्वक निर्वाण प्राप्त का सकता है परन्तु वे पुनर्जन्म पाना चाहते हैं कि वे आत्मसिद्धि प्राप्त करने में मनुष्यों की सहायता कर पाए और अधिक शीघ्रता से निर्वाण प्राप्त करें.

इस प्रकार, जो बौद्ध और मसीही धर्म में मसीहा में समानता का तर्क करते हें गलत हैं. सच तो यह है, कि मूल में, बौद्ध धर्म और मसीही धर्म एक दुसरे से कदापि मेल नहीं खाते वरन् पूर्व और पश्चिम के अन्तर पर हैं. यथातथ्य, लगभग हर एक प्रमुख मसीही सिद्धांत का बौद्ध धर्म विरोध करता है और विपरीत. इसलिए हम कहते हें कि इन दोनों धर्मों का जुड़ना दोनों धर्मों को ही नुकसान पहुंचाता है.

जहां तक बौद्ध धर्म का प्रशन है, वहां मसीही विश्वास और बौद्ध धर्म में अन्तर को स्पष्ट देखा गया है. एक ज्ञानवान बुद्ध अनुयायी भलिभांति जानता है कि बाइबल आधारित मसीही शिक्षाएं मित्रतापूर्ण नहीं, बैरभाव से पूर्ण है क्योंकि मसीही विश्वास स्पष्ट रूप से जोशिक्षाएं देता है उन्हें बुद्ध अनुयायी अज्ञान और/ या आत्मिक बाधा कहकर उनका परित्याग करते है; दूसरी ओर मसीही धर्म उन सब शिक्षाओं का प्रत्यक्ष विरोध  करता है जिन्हें बौद्ध धर्म सच्चा प्रकाशन कहता है.

उदाहरणार्थ, मसीही विश्वास में अनन्त परमेश्वर का वैभव व्याप्त है (यहू 17:3; यशा 43:10-11, 44:6); बुद्ध धर्म अनीश्वरवादी और यथार्थ में, नास्तिक है (या उत्तरकालीन पक्ष में, बहुदेववादी).

मसीही विश्वास में, उसका प्रमुख शिक्षा पापों के लिए व्यक्तिगत उद्धार के लिए मसीह यीशु में विश्वास की आवश्यकता प्रकट करती है (यहू 14:6; प्रेर 4:12; 1 टीमो 2:5-6); बुद्ध धर्म में पाप से उद्धार दिलाने वाले मसीह नहीं है और महायान प्रथा में, जैसा हमने देखा हे, उद्धारकर्ता का सिद्धांत बिलकुल अलग है.

मसीही धर्म केवल विश्वास के द्वारा अनुग्रह से उद्धार पाने को महत्त्व देता है (इफि 2:8-9; यहू 3:16); बौद्ध धर्म ध्यानावस्थित अभ्यासों के माध्यम से कर्मों द्वारा प्रकाशन को महत्त्व देता है जिसमें अज्ञान और अभिलाषाओं के निवारण की खोज की जाती है.

मसीही धर्म सभी पापों की वर्तमान क्षमा  करता है (कुलु 2:13; एफि 1:07) और अनंत काल के लिए पाप और कष्ट के निवारण को महत्व देता है. (प्रका 21:3-4) दूसरी ओर, बौद्ध धर्म, परमेश्वर को नहीं मानता कि वह क्रोधित है. अत: उसमें पापों की क्षमा और पाप निवारण की प्रतिक्षा की अपेक्षा कष्टों का परम निवारण और अन्त में मनुष्य ही का निवारण है.

हम जहाँ भी दार्शनिक दृष्टिकोण से देखेंगे इन धर्मों के बीच के अंतर को ही देखा जा सकता हैं. मसीही धर्म पाप से मुक्ति पर जोर देता है न की जीवन से मुक्ति पर(1 यूह 2:2). मसीही धर्म मनुष्य के व्यक्तिगत अस्तित्व को गौरवान्बित करता हे, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के अपने रूप में बनाया गया था, और अनन्त जीवन और एक व्यक्तिगत परमेश्वर को सहभागिता की प्रतिज्ञा करता है (उत 1:26, 31; प्रका 21:3-4). मसीही धर्म में मरने के बाद के जीवन की शिक्षा स्पष्ट व्यक्त है (स्वर्ग या नरक उदाहरणार्थ, मत्ती 25:46; प्रका 20:10-15,) और मनुष्य के लिए मानव रूप में ही अनन्त अमरता की प्रतिज्ञा देता हे—मगर हर हालात में सिद्ध ठहराते हुए (प्रका. 21:3-4).

दूसरी ओर, बौद्ध धर्म पुनर्जन्म और अस्थिर निर्वाण सिखाता है जिसमें मनुष्य मनुष्य नहीं रहता, या जहां, महायान में, अस्थायी स्वर्ग या नरक का विचार हे और अन्त में सर्वेश्वरवाद संबंधी -ब्रह्मांडीय बुद्ध प्रकृति के द्वारा मनुष्य का देवात्मा हो जाने की शिक्षा देता है. लेकिन मसीही धर्म में पुनर्जन्म को प्रमाणिक विश्वास नहीं माना गया है क्योंकि उसके पाप के लिए मसीह की प्रतिस्थानक प्रायश्चित मृत्यु पर आधारित विश्वास है. दुसरे शब्दों में मसीह सबके पापों की क्षमा के निमित्त मर गया इसलिए मनुष्य को अपने ही पाप के दंड को भुगतने (“कर्म”) की जरुरत नहीं हे (कुलु 2:13; इब्रा 09:27; 10:10, 14; इफि 1:07).

इसके अतिरिक्त भी विषमताएं हैं, देखें, बाइबिल आधारित मसीही धर्म अन्य धर्मों के सूफी सिद्धान्त योग और सभी आध्यात्म शिक्षाओं का परित्याग करती है (उदा, व्यव 18:9-12); बौद्ध धर्म उन्हें स्वीकारता हे या उनका सक्रिय समर्थन करता हे.

मसीही धर्म में जीवन उत्तम हे और उसे अर्थ और सम्मान दिया जाता है, बौद्ध धर्म में यह इनकार करना कठिन है कि जीवन अनन्त जीने योग्य नहीं है– क्योंकि जीवन और दुख अविभाज्य हैं. अतः मसीही धर्म में, यीशु मसीह आया ताकि मनुष्यों को “जीवन बहुतायत में मिले” (यहू. 10:10); बौद्ध धर्म में, महात्मा बुद्ध इसलिए आया था कि मनुष्य स्वंय व्यक्तिगत अस्तित्व से मुक्ति पाए.

मसीही धर्म में, परमेश्वर या तो मनुष्य की आत्मा को महिमा या सजा प्रदान करेगा (यूह. 5:28-29), बौद्ध धर्म में आत्मा का विचार ही नहीं है कि महिमा पाए या दंड पाए. मसीही धर्म में नैतिकता मुख्य है (इफि. 1:4) जबकि बौद्ध धर्म में यह परोक्ष है.

मसीही धर्म मुख्यतः परमेश्वर को जानता है और मनुष्य की असहाय नैतिक एवं आत्मिक दशा के हित में परमेश्वर स्वंय को प्रकट करता है और अपनी ओर से अनुग्रहकारी पहल करता है. इस प्रकार बौद्ध धर्म में मनुष्य ही पाप उद्धारक है जबकि मसीही विश्वास इसे पूर्णरूपेण असंभव मानता है क्योंकि मनुष्य में सामर्थ्य नही कि वह अपने आप को पापों से बचा पाए.( तीतु 3:05; इफि. 2:8-9).

हम और भी कह सकते हैं, मगर इतना ही कहना पर्याप्त है कि रोमांचकारी मानवतावाद जो उदार धार्मिक उत्साहियों को प्रेरित करता है कि वे इन दोनों धर्मों में बुनियादी  समानता देखें, उत्कंठित मनोकामना की अपेक्षा अन्य कुछ नहीं है. तथापि यह सर्वथा आश्चर्य की बात नहीं है कि पाश्चात्य धार्मिक मानववादी बौद्ध धर्म को बढावा दे. क्योंकि दोनों ही धर्मों में मनुष्य सब बातों का मानक है (एक प्रकार का परमेश्वर) चाहे बौद्ध धर्म में अन्तिम परिणाम आत्म विलोपन है परन्तु जहां तक दोनों धर्म मानववादी है वे मसीही सिद्धांत को ग्रहण करते हैं जिसका लक्ष्य है मनुष्य की नहीं परमेश्वर की महिमा करना (यिर्म. 17:05, यहूदा 24-25).

जहा तक परमेश्वर को जानने और उसको महिमा देने का प्रशन है, वह बौद्ध धर्म के लिए महत्वहीन एवं अप्रासंगिक है. परन्तु बाइबल के अनुसार परमेश्वर को जितना अनदेखा किया जाएगा; उसका जितना विरोध किया जाएगा उतना ही मनुष्य कष्ट उठाएगा. यहाँ हम बौद्ध धर्म की विडभ्बना को देखते है: वे सोचते है कि परमेश्वर के बिना ही वे कष्टों का निवारण कर सकते है. सच तो यह है कि इससे उनके कष्ट सदाकालीन हो जाएंगे. यह बौद्ध धर्म की त्रासदी है विशेष करके मसीही बुद्ध धर्म की. कष्टों से मुक्ति पाने का एकमात्र साधन ( बाइबल के मसीह में सच्चा विश्वास ) आत्म उद्धार के पक्ष में अनदेखा किया जाता है जिसके कारण केवल अनन्त कष्ट ही उत्पन्न होते है.(मत्ती 25:46; प्रका 20:10-15).

टिप्पणियाँ

1. ↑ Masaharu Anesaki, “How Christianity Appeals to a Japanese Buddhist,” in David W. McKain (ed.),Christianity: Some Non-Christian Appraisals, (वेस्टपोर्ट, सीटी: ग्रीनवुड प्रेस, 1976), pp. 102-103.

2. ↑ D.T. Suzuki, “Mysticism: Christian and Buddhist,” in McKain (ed.), पृ. 111.