मसीही जनों के लिए त्रिएक परमेष्वर की धर्म शिक्षा को समझना महत्वपूर्ण क्यों है? भाग-2

द्वारा: Dr. John Ankerberg Dr. John Weldon; ©2006

क्या मसीहियत का विश्वास चौथी शताब्दी में कलीसिया द्वारा आविष्कार किया था? कुछ पंथ, साथ ही साथ सबसे सबसे उदार धर्मशास्त्रि, त्रिएकता के सिद्धांत को उन शिक्षाओं का भाग नहीं मानते जो मसीह और प्रेरितों द्वारा दिया गया था, मगर कलीसिया द्वारा शताब्दियों के उपरांत अविष्कार किया गया मानते हैं.

क्या मसीहियत का विश्वास चौथी शताब्दी में कलीसिया द्वारा आविष्कार किया था?

कुछ पंथ, साथ ही साथ सबसे सबसे उदार धर्मशास्त्रि, त्रिएकता के सिद्धांत को उन शिक्षाओं का भाग नहीं मानते जो मसीह और प्रेरितों द्वारा दिया गया था, मगर कलीसिया द्वारा शताब्दियों के उपरांत अविष्कार किया गया मानते हैं. उदहारण के तौर पर, अपने अगस्त, 1964, न्यू यॉर्क सिटी में दिए भाषण में, उदारवादी धर्मशास्त्री जेम्स ऐ पाइक ने घोषणा किया, “त्रिएकता जरूरी नहीं है. हमारे प्रभु ने कभी नहीं सुना इसके बारे में. प्रेरित इसके बारे में कुछ भी नहीं जानते थे.” विक्टर पॉल विएर्विल्ले, थे वे इंटरनेशनल के स्थापक, अपने किताब, Jesus Christ Is Not God, में कहा की प्रारंभिक कलीसिया (330 AD तक) ने न तो कभी त्रिएकता पर विश्वास किया और न ही मसीह के देवत्व पर विश्वास किया.

निश्चित रूप से, उस समय के दौरान, कलीसिया के नेतागण ने पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के बारे में बोला, मगर उन्होंने कभी भी उनको तुल्य नहीं माना…वास्तव में, इसका विपरीत मामला था. वो मानते थे की पिता सबसे सर्वोच्च, सच्चा और एकमात्र परमेश्वर है…और बेटे को निचा मानते हैं … जिसका शुरुआद है, जो दीखता है, जो इकलौता है, जो स्थिर है.[1]

क्या वास्तव में हम प्रारंभिक अगुवों के लेखों में ऐसा पढ़ते हैं, या ये केवल उन लोगों द्वारा लगाया आरोप है, जो किसी भी कारणवश, त्रिएकता पर विश्वास नहीं करना चाहते?

निम्नलिखित कालानुक्रमिक उदाहरण यह दिखाते हैं की प्रारंभिक कलीसिया स्पष्ट तौर पर विश्वास नहीं करता था की यीशु परमेश्वर है:

इग्नाटियस (30-107 ई.), जिसका जन्म मसीह की मृत्यु से पहले हुआ था, निरंतर यीशु मसीह के इश्वरत्व होने की बात करते थे. कुछ उदाहरणों को देखें: इफिसियों को भेजी, और दुसरे चित्तियों में, हम इन शब्दों के उचारण को देखते हैं की: “यीशु मसीह हमारा परमेश्वर”; “जो की परमेश्वर और मानव है”; “परमेश्वर का ज्ञान जिसे मिला, वो है, यीशु मसीह”, “क्योंकि हमारा परमेश्वर, यीशु मसीह है”; “क्योंकि परमेश्वर प्रत्यक्ष हुआ इंसान के रूप में”; “मसीह, जो अनंतता से पिता के साथ था”; “परमेश्वर के द्वारा, यीशु मसीह के द्वारा”; “यीशु मसीह हमारे परमेश्वर द्वारा”; “हमारा परमेश्वर, यीशु मसीह”; “मुझे कष्ट पहुँचाया जाना की में एक आवेग का उदहारण बनू परमेश्वर के लिए”; “यीशु मसीह, परमेश्वर” और “हमारा परमेश्वर यीशु मसीह. “[2] वो तथ्य की इग्नाटियस को डांटा न गया, और न ही किसी भी प्रारंभिक कलीसिया या प्रारंभिक अगुवों द्वारा विधर्मी शिक्षाओं को अपने चिट्ठियों द्वारा सिखाने का दोष लगाया साबित करता है की प्रारंभिक कलीसिया, ने 107 AD से पहले, यीशु मसीह के परमेश्वरत्व को स्वीकारा.

पोल्य्कार्प (69-155 ई) ने संभवतः बोला “हमारा प्रभु और परमेश्वर यीशु मसीह.”[3]

जस्टिन शहीद (100-165 ई.) ने यीशु के विषय में लिखा, “कौन,… जो परमेश्वर का पहला उत्पन्न शब्द था, अब भी परमेश्वर है.”[4]

अपने Dialogue with Trypho, उसने कहा की “परमेश्वर एक कुंवारी द्वारा जन्मा था” और यह की यीशु “आराधना के योग्य” और “प्रभु और परमेश्वर” कहलाने के योग्य था. [5]

तातियन (110-172 ई.), प्रारंभिक पक्षसमर्थक ने लिखा, “हम मूर्खों की तरह काम नहीं करते, हे यूनानियों, न ही झूटे किस्से सुनते हें जब हम घोषणा करते हें की परमेश्वर मानक रूप में पैदा हुआ.” [6]

इरेनायूस (120-202 ई.), ने लिखा की यीशु “उत्तम परमेश्वर और उत्तम मानव” था; “न की साधारण मानव…मगर पूरा परमेश्वर था”; और यह की “वो पूर्णता में स्वय…परमेश्वर, और प्रभु, और अनंतता का राजा है” और बोला की “यीशु मसीह, हमारा प्रभु, और परमेश्वर, और मसीहा और राजा”[7]

तेर्तुल्लियन (145-220 ई.), ने यीशु के बारे में कहा “मसीह परमेश्वर भी है” क्योंकि “वो जो परमेश्वर की ओर से आया है [कुंवारी के द्वारा] वो एक ही समय परमेश्वर और परमेश्वर का पुत्र है, और दोनों एक है..उसके जन्म में, परमेश्वर और मानव मिल गए.”[8]

सायस (180-217 ई.), एक रोमी पुरोहित, ने विश्वव्यापी सत्यापन में यीशु के इश्वरत्व के विषय में लिखा था अर्तेमों को इनकार करते हुए, जो इस बात पर कायम था की यीशु एक मानव ही था. ध्यान दीजिये की 217 ई. से पहले सायस ने प्रारंभिक लेखकों से अनुरोध किया जो सिखाते थे मसीह के इश्वरत्व के विषय में: “जस्टिन और मिलितिस्देस, और तातियन और क्लेमेंट, और बहुत सारों, – जो अज्ञात हैं इरेनेऔस और मेलितो, और बाकियों से, जो घोषित करते हें मसीह के परमेश्वर और इंसान होने से? सारे भजन संगीता, भी और भाइयों के गीत भी, जो शुरू से ही विश्वासियों द्वारा लिखा गया है, मनाये मसीह परमेश्वर का शब्द, जिसको दिव्यता दिया गया है…[यह] कलीसिया का सिद्धांत, इसलिए, बहुत सालों पहले घोषित किया गया है,…”[9]

ग्रेगोरी थौमतुर्गुस (205-265 ई.) ने त्रिएकता के विषय में कहा की, “सारे [लोगों] का एक स्वभाव, एक निष्कर्ष, एक इच्छा, हो वोही पवित्र त्रिएकता कहलाते हैं; और ये नाम निर्भर करतें हैं, तीनों व्यक्तियों के एक स्वभाव में, और एक वंश के आधार पर.”[10]

नोवातिओं (210-280 ई.) ने अपने किताब On The Trinity, में यीशु को स्पष्ट तौर में मानव कहा मगर, “वो परमेश्वर भी था शास्त्रों के अनुसार…शास्त्रों ने यीशु मसीह के मानावता के बारे विस्तृत रीती से बताया, इसके अतिरिक्त इसमें ऐसा भी वर्णन किया है की मसीह परमेश्वर है. “[11] (ध्यान दें, की तीसरी शताब्दी में त्रिएकता के विषय में बहुत बातचीत हुआ.)

अथानासिउस (293-373 ई.), नए नियम का मुख्य परिरक्षक प्रारंभिक एरियन विधर्मियों के विरोध में, जो कहते थे की यीशु मसीह प्रभु नहीं है, उन्होंने यीशु के विषय में कहा, “वो हमेशा परमेश्वर और पुत्र था और है” और “वो जो अनंतता से परमेश्वर था,…मानव भी बना हमारे लिए. “[12]
अलेक्जेंड्रिया के एलेग्जेंडर ने यीशु के संदर्ब में “उसके महान और जरूरी दिव्यता” में कहा और यह की वो “पिता के छवि के सामान थे. “[13]

कैसरिया के यूसेबिउस ने कहा की, “परमेश्वर का पुत्र किसी भी उत्पन्न जीवों के सामान नहीं है मगर…सामान है अपने पिता जिससे वो उत्पन्न हुआ है और उसमें किसी और का कुछ भी अंश नहीं है पिता के आलावा . “[14]

Augustine ने घोषणा किया की मसीही “…विश्वास करें की पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा सारी सृष्टि का एक परमेश्वर, सृष्टिकर्ता और राज्य करने वाला है: की पिता बेटा नहीं है, न ही पवित्र आत्मा, पिता या पुत्र; मगर एक त्रिएकता है तीन आपस में जुड़े लोगों का, और उनके एकता के विषय में” और ये की, “पिता ही परमेश्वर है, बीटा ही परमेश्वर है, और पवित्र आत्मा भी परमेश्वर है; और सबको जोड़कर एक परमेश्वर है. “[15]

ओरीगें मसीह “परमेश्वर आदमी बताया गया है. “[16]

तेर्तुल्लियन ने यीशु के बारे में लिखा की “वो परमेश्वर और मानव है…हमारे पास दोअत्व के हालात है- जो संगलित नहीं बल्कि एक व्यक्तित्व में एकीकृत है, यीशु के परमेश्वर और मानव के रूप में.”[17]

प्रोक्लुस ने लिखा, “वो एक स्त्री से पैदा हुआ था, परमेश्वर होते हुए भी पूरी तरह परमेश्वर नहीं, और मानव होते हुए पूर्ण रीती से मानव भी नहीं…मसीह समय के साथ परमेश्वर नहीं बने-मगर करुना के कारण मानव बने, जैसा हम विश्वास करते हैं. हम एक इश्वरत्व प्राप्त व्यक्ति का प्रचार नहीं करते; हम एक परमेश्वर के रूप का स्वीकार करते हें…सिर्फ उसे जो एक कुंवारी द्वारा पैदा हुआ, परमेश्वर और मानव. “[18]

अलेक्जेंड्रिया ने यीशु के विषय में लिखा, “क्योंकि वो जो था वैसा ही रहा; अर्थात, स्वभाव से परमेश्वर. मगर…उसने अपने आपको मानव भी बनाया” और “ऐसा कुछ भी हमें सोचने से नहीं रोकता की मसीहा अपने पिता का एकलौता पुत्र है और परमेश्वर और पुत्र दोनों है, इश्वरत्व में ओत्तम और मानवता में उत्तम…वो परेश्वर जैसा समझा जाता है और परमेश्वर है,…” के सिरिल[19]

यही कुछ प्रसंग है जिन्हें बताया जा सकता है.

बहुत पहले से निष्कर्ष, चर्च नेताओं तुरंत प्रेरितों के समय के बाद से परे था लगातार माना 4 ᵗ ʰ सदी नाइसिया उसमें की परिषद अप करने के लिए सिखाया यीशु मसीह जो परमेश्वर कि. इसलिए, Wierwille दूसरों है स्पष्ट रूप से गलत है कि वे ट्रिनिटी ” ईसाइयों उसमें 4 ᵗ ʰ सदी “invented गया था बनाए रखने के लिए जब.

सिर्फ एक तार्किक जवाब दिया जा सकता इस प्रारंभिक गवाही यीशु मसीह के इश्वरत्व के विषय में-प्रारंभिक कलीसियाओं के अगुवे सरलता से घोषणा कर रहे यीशु मसीह के विषय में जो यीशु मसीह और प्रेरितों द्वारा पवित्र वचनों में दिया हुआ था–की मसीह निश्चित ही परमेश्वर था. जैसे नाज़िंज़ुस के ग्रेगोरी ने अपने किताब “Third Theological Oration Concerning the Son,” में कहा की “उनके [प्रेरितों] महान और गौरवपूर्ण उपदेशों द्वारा हमने बेटे के इश्वरत्व को ढूँढकर प्रचार किया है.” [20]

सच्चाई ये है की सारे गुट जो मसीहा के इश्वरत्व को नकारते हें–थ वे इंटरनेशनल, येहोवः वित्नेस्सेस, अर्मस्त्रोंगिस्म, च्रिस्तादेल्फिंस, मॉडर्न मोदालिस्ट्स, इत्यादि–जहाँ तक प्रारंभिक अरिंस का विषय है–त्रिएकता उनके तर्कवाद के लिए रूकावट है. जो वो पूरी तरह से नहीं समझते, वो स्वीकार नहीं करते. इसलिए, त्रिएकता का सिद्धांत पवित्र शास्त्र या ऐतिहासिक नज़रिए में नकारा नहीं जा सकता क्योंकि इसके समर्थन में बहुत गवाहियाँ हें;–इन्हें सिर्फ तात्विक या व्यक्तिगत नज़रिए से नकारा जा सकता है जिसका कोई योग्यता नहीं है.

नोट्स

1. ↑ Victor Paul Wierwille, Jesus Christ Is Not God (New Knoxville, OH: American Christian Press, 1975), emphasis added.
2. ↑ Kirsopp Lake, trans., The Apostolic Fathers, Vol. 1, Loeb Classical Library, Harvard University Press, 1965, To the Ephesians I, Greeting; I:I; vii.2; xvii.2; xviii.2; xix.3; To the Magnesians, xiii.2; To the Trallians, vii.1; To the Romans, Greeting; iii.3; vi.3; To the Smyrnaeans द्वितीय, To Polycarp, viii.3, respectively.
3. ↑ The Epistle of Polycarp to the Philippians, Chapter 6, in Alexander Roberts, James Donaldson (eds.), The Ante-Nicene Fathers Translations of the Writings of the Fathers Down to A.D. 325 (Vol. 1 The Apostolic Fathers with Justin Martyr and Irenaeus) (Grand Rapids, MI: Erdmans, 1977), p. 34.
4. ↑ Justin Martyr, “The First Apology,” Chapter 63, in Roberts and Donaldson, The Ante-Nicene Fathers, Vol. 1, पृ. 184.
5. ↑ Justin Martyr, “Dialogue of Justin, Philosopher and Martyr, with Trypho, a Jew,” Chapters 64, 68, in Roberts and Donaldson, The Ante-Nicene Fathers, Vol. 1, 231-233 pp..
6. ↑ Tatian the Assyrian, “Address of Tatian to the Greeks,” Chapter 21, in Roberts and Donaldson, The Ante-Nicene Fathers, Vol. 1, पृ. 74.
7. ↑ Irenaeus, “Against Heresies” Book III, Chpt. 16, Title; Chpt. 19, Title, para.2; Book I, chapt. 10, para. 1, in Roberts and Donaldson (eds.), The Ante-Nicene Fathers, Vol. 1, pp. 440, 448-49.
8. ↑ Tertullian (Quintus Tertullianus), “A Treatise on the Soul,” Chapter 41, and “Apology,” Chapter 21, in Roberts and Donaldson, The Ante-Nicene Fathers, Vol. 3, Latin Christianity: Its Founder, Tertullian (Grand Rapids, MI: Erdmans, 1978), pp. 221, 34-35, respectively.
9. ↑ Caius, “Against the Heresy of Artemon” in “Fragments of Caius” in Roberts and Donaldson, Ante-Nicene Fathers: Fathers of the Third Century, Vol. 5, p. 601, emphasis added.
10. ↑ Gregory Thaumaturgus, “On the Trinity,” para. 2, in Roberts and Donaldson, The Ante-Nicene Fathers, Vol. 6: Fathers of the Third Century (Grand Rapids, MI: Eerdmans, 1975), p. 48.
11. ↑ Novatian, a Roman Presbyter, “A Treatise of Novatian Concerning the Trinity,” Chapter 11, in Roberts and Donaldson, Ante-Nicene Fathers: Fathers of the Third Century, Vol. 5, पृ. 620.
12. ↑ Athanasius, “Against the Arians,” III, para.29, 31, in Maurice Wiles and Mark Santer (eds.), Documents in Early Christian Thought (Cambridge: Cambridge University Press, 1979), pp. 52, 54.
13. ↑ “Alexander of Alexandria’s Letter to Alexander of Thessonalica,” para.37, in William G. Rusch (trans./ed.), The Trinitarian Controversy, (Philadelphia: For tress Press, 1980), pp. 40, 42.
14. ↑ “Eusebius of Caesarea’s Letter to His Church Concerning the Synod at Nicaea,” para.13 in Rusch, p. 59.
15. ↑ Augustine, “On the Trinity,” IX, para.1; XV, para.28, in Wiles and Santer, Documents in Early Christian Thought, 36-37, 91 pp..
16. ↑ Origen, “Dialogue with Heraclides,” 1-4 in Wiles and Santer, Documents in Early Christian Thought, पृ. 23.
17. ↑ Tertullian, “Against Praxeas,” Chapter, 27, in Wiles and Santer (eds.), p. 46.
18. ↑ Proclus, “Sermon I,” paragraphs 2, 4 in Wiles and Santer, Documents in Early Christian Thought, 62-64 pp..
19. ↑ Cyril of Alexandria, “Second Letter to Succensus,” 2, 4, in Wiles and Santer, Documents in Early Christian Thought, 67, 69-70 pp..
20. ↑ Gregory of Nazianzus, “Third Theological Oration Concerning the Son,” 17 in Rusch (trans./ed.), The त्रिमूर्ति विवाद, पृ. 143.