सच्चा परमेश्वर केवल एक है

द्वारा: Dr. John Ankerberg / Dr. John Weldon; ©2002

बाइबल मॉरमॉन मत की तरह त्रिदेववाद या बहुदेव वाद की नहीं परन्तु आदि अनंत एक परमेश्वर की ही शिक्षा देती है. जैसे यीशु ने सिखाया, ” और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने” (यूहन्ना 17:3).

निम्नलिखित वचनों से सिद्ध होता है कि केवल एक परमेश्वर है:

  •  ……. एकमात्र सच्चे परमेश्वर……. (यूहन्ना 17:3)
  •  एक को छोड़ और कोई परमेश्वर नहीं (1 कुरिन्थियों 8:4)
  •  एक ही परमेश्वर है, … (1 कुरिन्थियों 8:6)
  •  क्योंकि परमेश्वर एक ही है … (1 तीमुथियुस 2:5)
  •  यहावो यों कहता है ……‘‘मैं यहोवा हूं और दूसरा कोई नहीं, मुझे छोड़ कोई परमेश्वर नहीं…………’’ (यशायाह 44:6)
  •  मुझे छोड़ कोई परमेश्वर नहीं (यशायाह 45:5)
  •  मैं वहाँ यहोवा हूँ जो कोई अन्य (यशायाह 45:6)
  •  मैं ही परमेश्वर हूँ, दूसरा कोई नहीं; और मेरे तुल्य कोई भी नहीं है (यशायाह 46:9)

परमेश्वर त्रिएक है या त्रयात्मक है

इस के साथ ही इस सच्चे परमेश्वर ने, यह प्रकट किया है कि वह एक परमेश्वर में तीन व्यक्ति, या चेतना के तीन केंद्र है. हालाकि इस सिद्धांत को पूरी तरह से समझना संभव नही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि यह सिद्धांत बेतुका है और इसे ठीक-ठीक परिभाषित नहीं किया जा सकता. प्रमुख कलीसिया एतिहासकार Philip Schaff ने त्रिएक की एक बहुत बढि़या परिभाषा दी हैः

परमेश्वर एक में निहित तीन व्यक्ति या निरुपधितत्व (समान प्रकृति के तीन अलग व्यक्ति) है, और हर एक में परमेश्वर के संपूर्ण ईश्वरत्व और सभी गुणों की अभिव्यक्ति है. यह एक दूसरे की व्यक्ति की नकल करना, या छदमवेश में होना नहीं है और न ही अविभाव है (प्रोसोपोन, चेहरा, मुखौटा) हैं, और, न ही उनका कोई स्वतंत्र या अलग आस्तित्व है, बल्कि यह एक प्रकार से इन दोनों धारणाओं के बीच का कोई सिद्धांत है, और इसलिए यह एक तरफ सबेलिअनवाद से बचता है, तो वहीं दूसरी तरफ त्रिदेववाद से. (सबेलिअनवाद की शिक्षा के अनुसार परमेश्वर केवल एक ही व्यक्ति है और उसने स्वयं को तीन रुपों में अभिव्यक्त किया है; अर्थात तीन अलग अलग परमेश्वर में विश्वास). ये दिव्य व्यक्ति एक दूसरे में समाहित हैं, और वे दिव्य तत्व में सतत् अंर्तसंवाद एवं गति उत्पन्न करते हैं. हर व्यक्ति में सभी ईश्वरीय गुण विद्यमान हैं जो दिव्य सार में निहित रहते हैं, लेकिन तब भी हर व्यक्ति का अपना विशेष व्यक्तित्व या स्वभाव रखता है, जो स्वयं में अनूठा होता है, और दूसरे में प्रसारित नहीं किया जा सकता है; पिता अजन्मा है, बेटे ने जन्म लिया था, और पवित्र आत्मा गतिमान रहता है. त्रिएकत्व में कोई भी समय में आगे या पीछे नहीं है, कोई किसी से कम या अधिक नहीं है; तीनो ही समान रुप से अनन्तकालीन और एक दूसरे के बराबर हैं.[1]

बाइबल में दिए त्रिएक परमेश्वर के सिद्धांत को समझना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस बात से संबंध रखता है कि परमेश्वर कौनहै, जो पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के रुप में परमेश्वर के स्वभाव को उचित रूप में समझने के लिए अनिवार्य है. त्रिएकत्व को समझना परमेश्वर को उस रुप में समझना है जैसा उसने स्वयं को प्रगट किया है. त्रिएकत्व को गलत समझना, परमेश्वर को गलत समझना है.

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि हमें परमेश्वर की आराधना ‘‘आत्मा और सच्चाई’’ से करना है (यूहन्ना 4: 24), जैसा कि यीशु का आदेश है, तो यह ज़रुरी है कि हम उस एकमेव परमेश्वर को उसके वास्तविक रुप में जानें और उसकी आराधना करें. ऐसा न कर पाने का अर्थ होगा उसे जानने और उसकी आराधना करने में विफल होना, और यह उसके लिए महिमा नहीं ला सकती. इसलिए, वे जो त्रिएकत्व को नकारते हैं, वे वास्तव में परमेश्वर के स्वभाव को नकारते हैं. बाइबल के अनुसार परमेश्वर का निरुपण नहीं करने से अप्रामणिक मत पैदा होते हैं. इसके परिणामस्वरुप, लोग उस एकमेव परमेश्वर को त्याग कर किसी झूठे परमेश्वर की आराधना कर सकते हैं. बाइबल स्पष्ट कहती है कि झूठे देवताओं की आराधना लोगों को उनके पापों से मुक्ति नहीं दिला सकती है. परमेश्वर के विषय में उचित ज्ञान के महत्व पर बल देते हुए स्वयं यीशु ने कहा था, ‘‘ और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने.’’ (यूहन्ना 17:3).

अपने Christian Theology, में मसीही धर्मशास्त्री Millard J. Erickson, त्रिएकत्व के सिद्धांत की उचित समझ के लिए 6 ज़रुरी बातें बताते हैं.(लेखक अपने शब्दों में एरिक्क्सों के वाक्यांश के विषय में कहता है):

1.  परमेश्वर केवल एक है

2.  परमेश्वर में समाहित हर व्यक्ति समान रुप से ईश्वर है.

3.  परमेश्वर की त्रिएकता और एकता में विरोधाभास या विरोध सा दिखाई देता है जो केवल देखने से लगता है और, वास्तव में है नहीं. ऐसा इसलिए है कि परमेश्वर की त्रिएकता और एकता समान विषय से संबंधित नहीं होती है; अर्थात् वे एक ही बात की, एक ही समय में, एक ही रीति से, एक साथ पुष्टि नहीं करते या इन्कार नहीं करते हैं. परमेश्वर की एकता उसके दिव्य सत्व के संदर्भ में है और उसकी त्रिएकता उसमें समाहित व्यक्तियों की बहु संख्या के संदर्भ में.

4.  त्रिएकत्व अनन्त हैं: तीनों व्यक्ति सदा थे, और तीनों ही समान रुप से ईश्वर हैं. ऐसा नहीं था कि एक या दो व्यक्ति समय के किसी बिंदु में पहले आस्तित्व में आए, और कालान्तर में ईश्वर बन गए. त्रिएक परमेश्वर की दिव्य प्रकृति में कभी कोई बदलाव नहीं हुआ है. परमेश्वर जैसा था वैसा ही आज भी है, और हमेशा वैसा ही रहेगा.

5.  यह संभव है कि किसी समय त्रिएकत्व का एक व्यक्ति बाकी दोनों के या किसी एक के अधीन कार्य करे. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसे में वह बाकी दोनों से निचे के स्तर का हो जाता है. त्रिएकत्व के हर व्यक्ति का समय के साथ विशेष कार्य रहा है. दूसरे शब्दों में, त्रिएकत्व में किसी व्यक्ति विशेष को दिया विशेष काम, किसी विशेष उद्देश्य को पूरा करने के लिए निभाई जानेवाली अस्थायी भूमिका होती है. त्रिएकत्व का दूसरे व्यक्तित्व, यीशु, बेटे के रुप में देह्धारण के बाद, अपने सत्व में पिता से कम नहीं था, हालाकि उस समय वह अपने पिता के अधीन काम कर रहा था. इसी तरह, आज पवित्र आत्मा बेटे की सेवकाई (यूहन्ना 14-16) और पिता की इच्छा के लिए कार्य कर रहा है, लेकिन वह पिता और बेटे से कम नहीं है. इस बात को कुछ उदाहरण बहुत अच्छी तरह समझा सकते हैं. जैसे कि एक पत्नी की भूमिका उसके पति के अधीन होती है, लेकिन वह अपने पति के बराबर होती है. व्यापारिक उद्यम में शामिल लोग, अपने में से किसी एक व्यक्ति को थोड़े समय के लिए, उसके दर्जे या ओहदे में बिना कोई बदलाव किए, अपना अध्यक्ष चुन सकते हैं. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, सबसे ऊँचे दर्जे के पायलट को अपने से निचले दर्जे के बमाबार्डियर के अधीन होकर निर्णय लेना होता था.

6.  अंत में, त्रिएक परमेश्वर को पूरी तरह समझना असंभव है. पूरी तरह उद्धार पाकर स्वर्ग में होने पर भी, हम परमेश्वर को पूरी रीति से नहीं समझ सकेंगे, क्योंकि किसी सीमित जीव के लिए उस अनन्त आस्तित्व को समझना असंव है. इसलिए, ‘‘परमेश्वर के वे पक्ष, जिन्हें हम कभी भी पूरी तरह समझ नहीं पाएंगे, उन्हें तर्क के अनुसार विरोधाभास मानने की अपेक्षा, अपनी समझ से परे गूढ़ रहस्य मानें.’’ [2]

उद्धार पाने के लिए किसी व्यक्ति को त्रिएक परमेश्वर का पूर्वज्ञान होना ज़रुरी नहीं है. लेकिन उद्धार पाने के बाद, मसीहियों के लिए ज़रुरी है कि वे उस सच्चे परमेश्वर की वास्तविक प्रकृति को जानें जिसने इतने अनुग्रह से उन्हें क्षमादान दिया है. इससे पता चलता है कि कलीसिया ने क्यों परमेश्वर की सही व उचित समझ के महत्व को हमेशा महत्वपूर्ण समझा है, और अपनी इस बात पर कायम रही है कि वचन में दी गई परमेश्वर की व्याख्या को ठुकरानेवाले लोग जब तक उसे ठुकराएँगे, तब तक उद्धार से वंचित ही रहेंगे. अथनेसियन विश्वास वचन के बारे में डा स्चाफ्फ़ की टिप्पणी देखें:

यह एक गंभीर घोषणा के साथ शुरु होकर खत्म हो जाती है कि त्रिएक परमेश्वर और देहधारण में कैथालिक (सार्वभौमिक कलीसिया की) विश्वास, उद्धार पाने की अनिवार्य शर्त है, और उसे स्वीकार न करनेवाले सदा के लिए खो जाएँगे. यह अनाथेमा (परमेश्वर का श्राप), अपने स्वभाविक ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह केवल विधर्म की शिक्षा के खतरे के विरुद्ध एक गंभीर चेतावनी ही नहीं है, और न ही दूसरी ओर, यह उद्धार पाने की शर्त है, अर्थात धर्म सिद्धांत के प्रतिपादित तार्किक अभि कथन का पूर्ण शान एवं स्वीकरण है. (यह विश्वासियों के एक विशाल समूह को दोषी ठहरायेगी); लेकिन अवश्य ही, यह उन सभी लोगों को स्वर्ग से वंचित करता है जो इसके निहित सत्य की शिक्षा को ठुकराते हैं. इसमें अनिवार्य है कि जो भी उद्धार पाना चाहता है, उसके लिए ज़रुरी है कि वह एकमेव सच्चे और जीवित परमेश्वर – पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा पर विश्वास करे, जो अपने तत्व में एक है, तीन व्यक्तियों में है, और यीशु में वह पूरी रीति से परमेश्वर और पूरी रीति से मनुष्य है.[3]

जैसा कि व्लादिमीर लोस्स्की ने एक बार बेधड़क होकर कहा था, कि ‘‘त्रिएक परमेश्वर और नरक के बीच कोई विकल्प नहीं है.[4] पंथों द्वारा बाइबल में निहित त्रिएक परमेश्वर को नकारना केवल पंथों की व्यक्तिगत पक्षपात की भावना या अज्ञानता ही है. यह बात महत्वपूर्ण है कि त्रिएक परमेश्वर को नकारनेवाले कुछ यूनिटेरियन (एकेश्वरवादी) भी स्वीकार करते हैं की यह अपने प्रकट और अक्रत्रिक अर्थ में बाइबल की शिक्षा हैं. 19वीं सदी के यूनिटेरियन अगुवे, जॉर्ज

एलिस के ये शब्द, बाइबल नहीं वरन् व्यक्तिगत आधार पर त्रिएक परमेश्वर को नकारनेवाले विरोधी समूहों और उदारपंथियों के पूर्वाग्रहों की व्याख्या करते हैं. ‘‘इस पुस्तक बाइबल के प्रति हम उदारवादियों का चतुराई भरा, विशेष, भेदभावपूर्ण, और साफ शब्दों में कहना चाहूँगा, ज़ोरजबर्दस्ती भरा व्यवहार इसे रूदिवाद की अपेक्षा और कुछ सिखाने नहीं देगा.’’[5]  प्रिंसटन के महान धर्मशास्त्री वर्फ़िएल्द के स्थर के विशेषज्ञ समझे जानेवाले एक विद्वान् कहते हैं कि परमेश्वर के वचन में त्रिएक परमेश्वर का सिद्धांत हर जगह ‘‘पहले से मान कर चलता है.’’[6]  यह बात, उदाहरण के लिए, साफ तौर में दर्शायी गई है एडवर्ड बिच्केर्स्तेथ के शानदार काम, The Trinity में.

नोट्स

1. Philip Schaff, ed., rev. by David S. Schaff, The Creeds of Christendom: With a History and Critical Notes—Vol. 1: The History of the Creeds (Grand Rapids, MI: Baker Book House, 1983). The Greek term was transliterated by the authors.

2. Millard J. Erickson, Christian Theology (Grand Rapids, MI: Baker, 1986, one vol. edition), pp. 337-338.

3. Schaff, ed., Creed, pp. 39-40.

4. Vladimir Lossky, The Mystical Theology of the Eastern Church (1957), p. 66.

5. In E. Calvin Beisner, God in Three Persons (Wheaton, IL: Tyndale, 1984), p. 25.

6. Ibid., p. 26.