हाइड्रा – धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद का कई सिरों वाला दानव

द्वारा: Dr. Steven Riser; ©2004

अपने लगातार लौकिक होते समाज का क्या अर्थ निकालें

परिचय

क्या विचारों की दुनिया की बात करते समय व्यावहारिक हुआ जा सकता है, विशेष रुप से जबकि आपके सामने कई तरह के दार्शनिक व धार्मिक विश्वदर्शन हों? चूँकि व्यक्तिगत व सामूहिक, दोनो ही स्तर पर हमारे विचार हमारे कामों को प्रभावित करते हैं, यह व्यवहारिक ही नहीं महत्वपूर्ण भी है कि हम उन ‘‘इस्साकारियों’’ की तरह हों ” “जो अपने ‘‘समय को पहचानते थे’’ (1 इति. 12:32).मैं इस लेख को बाइबल पर आधारित व उपयोगी होने के साथ छोटा व सरल रखना चाहता हूँ. लेकिन लोगों की सोंच पर विचार-विमर्श करते समय ऐसा करना आसान नहीं होगा, तो भी, चलिए कोशिश करते हैं.

यूनानी मिथक में, हाइड्रा नौ सिरोंवाला एक साँप था जो हरक्यूलीस के हाथों मारा गया था. उसे मारना हरक्यूलीस को मिले 12 कामों में से एक काम था. हाइड्रा की विशेषता थी कि उसके किसी सिर को काटने पर, उसकी जगह दो और सिर उग आते थे. हमारे आज के समाज में भी एक ‘‘हाइड्रा’’ खुला घूम रहा है, और यह कोई मिथक नहीं है; यह हाइड्रा, कई सिरोंवाला यह दैत्य, पहले से कहीं अधिक खतरनाक यह दैत्य, सेक्यूलरिज़म अथवा लौकिकवाद कहलाता है, और यह आपको, आपके विश्वास को, आपके परिवार को, कलीसिया और पूरे राष्ट्र को डरा रहा है. दुख की बात है कि अमेरीका दिन प्रतिदिन लौकिक होता जा रहा है, और यह बात कई रुपों में सामने आ रही है, और उसका हरेक रुप हाइड्रा के सिर की तरह है. हाइड्रा शब्द का अर्थ होता है: कई कारणों व स्रोतोंवाला दुष्ट.

लौकिक शब्द का अर्थ शायद हम सभी जानते हैं, लेकिन लौकिकवाद क्या चीज़ है? अंत में लगा ‘‘वाद’’ उस शब्द को एक विचार-प्रणाली में बदल देता है जो जीवन के प्रति हमारे नज़रिये को प्रभावित करती है. विचारों की इस प्रणाली को ‘विश्व-दर्शन’ अथवा ‘वल्र्ड-व्यू’ कहते हैं. लौकिकवाद हमारे समाज का एक प्रमुख ‘‘वाद’’ है.

बुनियादी स्तर पर लौकिकवाद अनन्तता की अनेदखी करना है. यह सांसारिक हो कर ऐसे जीना है मानो कोई परमेश्वर न हो, और हमारे किए कामों का कोई शाश्वत परिणाम न हो. यह मूर्ख होने की निशानी है. “एक मूर्ख उसमें उसके दिल, ‘कोई परमेश्वर है ही नहीं कहते हैं” (भजन 14:01). यह अनन्तता के प्रकाश में बीतनेवाला जीवन नहीं है. यह देखना बहुत आसान है कि ऐसी विचारधारा परमेश्वर के आस्तित्व को नकारने का एक तर्कसंगत नतीजा (नास्तिकता) होती है..

दैत्य तो लौकिकवाद है, लेकिन इस हाइड्रा के अनेक सिर किस चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं? लौकिकवाद के तत्व क्या हैं? नीचे दिए ये ‘‘वाद’’ हमारे समाज को लगातार लौकिक होने में सहायता करते हैं. (इनमें से कुछ विचारधाराएँ पुरानी हैं तो कुछ नई, लेकिन ये सभी हमारी संस्कृति के प्रमुख विश्व-दर्शन, लौकिकवाद के साथ सुसंगत हैं और उसे बल देते हैं.)

1. निराशावादी अस्तित्ववाद- बजाय मानव महत्व के मूल्यांकन के लिए नए मानक बन सत्य की मानवद्वेषी और भाग्य पर भरोसा रखनेवाली विश्वास की यह प्रणाली इस बात पर बल देती है कि मनुष्य एक बेकार और भावुक जीव है, जिसके जीवन का का कोई बुनियादी उद्देश्य नहीं है.Feelings,. ‘‘आप क्या सोचते हैं?’’ के स्थान पर ‘‘आप क्या महसूस करते हैं?’’ सबसे महत्वपूर्ण सवाल है. समस्या कैसे हम महसूस सच जो क्या करने के लिए कोई पत्राचार मिले सकता है कि जो. “ऐसा मार्ग है, जो मनुष्य को ठीक देख पड़ता है, परन्तु उसके अन्त में शोक होता है (नीति. 14:12). पौलुस हमें बताता है कि हमें भलाई के लिए बुद्धिमान, परन्तु बुराई के लिए भोले बनना है. नीतिवचन 18:2 कहता है कि लेकिन, “मूर्ख का मन समझ की बातों में नहीं लगता. ”

2. नैतिक सापेक्षवाद- विश्वास की यह प्रणाली परमेश्वर के आस्तित्व में विश्वास नहीं रखती. इसलिए इसमें संपूर्ण नैतिकता में विश्वास करने का कोई आधार नहीं होता; यही कारण है कि इसमें ‘‘सब कुछ सापेक्षिक है (जो मुझे ठीक लगता है वह मेरे लिए ठीक है और जो आपको ठीक लगता है वह आपके लिए ठीक)’’ – यहाँ तक कि नैतिकता और मूल्य भी. क्या सही है या क्या गलत, यह व्यक्ति के अपने विचार या समूह की आम राय पर निर्भर करता है, और ये दोनो ही घटक लगातार बदलते रहते हैं. जार्ज बर्ना के अनुसार, 71 प्रतिशत अमेरीकी, किसी न किसी रुप में इस मत से सहमति रखते हैं. न्यायियों 17:6 कहता है, ” … जिसको जो ठीक सूझ पड़ता था वही वह करता था. ”  यही है नैतिक सापेक्षवाद का तर्कसंगत परिणाम.

3. व्यावहारिक उपयोगितावाद– यह पूछने की बजाय कि ‘‘क्या यह सही है?’’ व्यावहारिकतावाद पूछता है, ‘‘क्या इससे काम बन सकता है?’’ यह काम निकालने का नज़रिया है, जो कहता है कि परिणाम ही काम को करने के तरीके को सही या गलत ठहराता है. इसका नारा है: ‘‘जहाँ चाह, वहाँ राह.’’ आधुनिक मानव में व्यावहारिक होने की प्रवृत्ति है और नैतिक व धार्मिक पक्ष की अनदेखी करता है. ‘‘यह सही है, इसलिए यह कारगर है’’ कहने की बजाय वह कहता है ‘‘यह कारगर है, इसलिए सही है.’’ परमेश्वर की इच्छा परमेश्वर की रीति से ही की जानी चाहिए, और परिणाम हमेशा काम को किए जाने की रीति को सही या गलत ठहराने का सही मानदंड नहीं होते हैं.

4. तार्किक प्रत्यक्षवाद, या अनुभववाद: इस मत का विश्वास है कि सच्चाई केवल नाक, कान, आँख, जीभ, अँगुलियों के अनुभवों तक सीमित है. इसमें विज्ञान और तकनीकी के द्वारा तार्किकता और अनुभववाद को लागू करना शामिल है. दूसरे शब्दों में, विज्ञान हमारे लिए ‘‘पवित्र गाय’’ या परमेश्वर बन जाता है. इसके अनुसार, जिस सच्चाई को हम देख या अनुभव नहीं कर सकते, जैसे कि नैतिक या आत्मिक सच्चाई, वह सापेक्षिक होती है. कार्ल सेगन जैसे वैज्ञानिक इस आधुनिक आंदोलन के ‘‘महा याजक’’ हैं. नारा: ‘‘ब्रह्माण्ड जितना दिखता है उतना ही है, और सदा उतना ही रहेगा.’’ पौलुस कहाता है कि मसीही को “देख कर नहीं, पर विश्वास से’’ चलना चाहिए. (2 कुरि. 5:7)

5. डारविन का क्रमिक विकासवाद- विश्वास की इस प्रणाली के अनुसार परमेश्वर का आस्तित्व नहीं है, इसलिए इसे सृष्टि और मानव प्रजाति के विकास की एक वैकल्पिक व्याख्या देनी की ज़रुरत पड़ी. यह सृष्टि के आस्तिक नज़रिये के बिल्कुल विपरीत है. यदि परमेश्वर के बिना सृष्टि की व्याख्या हो सकती है, तो फिर सृष्टि की रचना की व्याख्या के लिए सृष्टिकर्ता की क्या ज़रुरत है? यह सिद्धांत केवल अनुमानों पर टिका है और उन्हें प्रमाणित नहीं किया जा सकता, इसलिए, इस पर भरोसा करने के लिए बहुत पक्के विश्वास की ज़रुरत होती है. इब्रानियों का लेखक कहता है, “विश्वास ही से हम जान जाते हैं, कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है. यह नहीं, कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो. (11:3) सच्चाई यह है कि ब्रह्माण्ड की रचना, वैज्ञानिक जाँच की सीमा से बहुत परे की बात है.

6. मूर्तिपूजक सुखवाद- सुखवाद का नारा: ‘‘जीवन बस एक बार मिलता है, इसलिए जितनी हो सके उतनी मौज करो.’’ सत्य और असत्य, या अच्छाई और बुराई पर चिंतन करने की बजाय, सुखवाद सुख-दुख पर केन्द्रित है. सरल शब्दों में, एक सुखवादी व्यक्ति जीवन में दुख से बचता फिरता है और लगातार सुख की खोज में लगा रहता है. वह कहता है, “आओ, खाए-पीएँ, (मौज करें) क्योंकि कल तो मर ही जाएँगे. (1 कुरि. 15:32) पौलुस ने कहा था कि यदि मसीह जिलाया न गया होता, तो इस प्रकार की सोच उचित ठहरती.

7. मूर्ख भौतिकवाद- इसमें बस चीज़े जमा करने की होड़ होती हैं. इसका नारा: ‘‘पैसा सब कुछ नहीं है, लेकिन इसके अलावा बाकी सब बातें इतना महत्व नहीं रखती.’’ यीशु ने इस सिद्धांत का विरोध किया था और कहा था कि, “किसी का जीवन उसकी संपत्ति की बहुतायत से नहीं होता (लूका 12:15). कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता…..तुम परमेश्वर और धन दोनो की सेवा नहीं कर सकते.  (मत्ती 6:24) भौतिकतावादी खरीददारी करने या भोगवाद को एक थेरेपी की तरह मानते हैं. दुर्भाग्यवश, लोभ और मोह-भंग इन लोगों को बुरी तरह डुबो देते हैं.

8. धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद  : यह विश्व-दर्शन परमेश्वर की जगह मनुष्य पर केन्द्रित है. यह मनुष्य को ‘‘सभी चीज़ों के माप’’ की तरह देखता है. इसमें परमेश्वर नहीं बल्कि मनुष्य सब मानकों और मूल्यों का निर्धारक मानक होता है. सारी वास्तविकता और सारा जीवन, केवल मनुष्य पर केन्द्रित होता है. इस विश्वास-प्रणाली का सार मानवतावादी घोषणा-पत्र 1 व 2 में निहित है. इसका नारा: ‘‘मैं स्वयं अपने भाग्य का स्वामी हूँ, मैं अपनी आत्मा का स्वयं कैप्टन हूँ.’’ परमेश्वर-केन्द्रित मसीहत का यह सबसे लोकप्रिय विकल्प है.

9. मार्क्सवादी साम्यवाद  यह समाजवादी अथवा साम्यवादी अर्थव्यवस्था का एक नास्तिक और भौतिकवादी रुप है जिसमें उत्पादन के सभी संसाधनों पर सरकार का स्वामित्व होता है. ऐतिहासिक रुप से, लोगों के जीवन-स्तर को बेहतर बनाने के लिए अर्थव्यवस्था के समाजवादी या साम्यवादी सिद्धांत का लगाया हर गंभीर प्रयास बुरी तरह असफल रहा है. साम्यवाद मानव स्वभाव से मेल नहीं खाता है, यही कारण है कि यह ‘‘वास्तविक’’ दुनिया में कभी कारगर नहीं हुआ. लौकिक विश्वविद्यालय ही शायद अमेरीका में साम्यवाद का अंतिम समर्थक है.

10. नास्तिकता   जो “किसी बात पर” कोई परमेश्वर वहाँ जो. सबसे महत्वपूर्ण कारक उसमें वा नहीं एक उसमें परमेश्वर का मानना है कि क्या जो किसी भी वैश्विक नजरिया. पवित्र शास्त्र परमेश्वर.s अस्तित्व को साबित करने की कोशिश करता नहीं, यह केवल सबूत के आधार पर निष्कर्ष है कि (: 18ff रोमी. 1) में आने के लिए हम हम असफल बहाना बिना है कि राज्यों यह मान लिया गया है. नीतिवचन 14:01 कहते हैं, “मूर्ख अपने मन में कहता है, कोई परमेश्वर है ही नहीं. ‘ अध्ययन बताते हैं कि अधिकांश लोगों के मन में परमेश्वर को लेकर कोई न कोई संकल्पना होती है. खुद को नास्तिक कहनेवाले बहुत से लोग बस परमेश्वर पर नाराज़ होते हैं. बाकी फिर वे लोग हैं जिनके जीने का तरीका परमेश्वर के आस्तित्व से मेल नहीं खाता है, और इसलिए वे उसे अपने जीवन से बाहर कर देते हैं. यदि आपकी परिभाषा में परमेश्वर आपकी निष्ठा का सबसे चरम विषय है, तो इसके अनुसार सभी के जीवन में परमेश्वर है. हम सब किसी न किसी पर विश्वास या भरोसा करते हैं, लेकिन सवाल है किस पर? हम जिस पर निष्ठा रखते हैं, क्या वह इसके योग्य है?

11. ऐतिहासिक संशोधनवाद  : यह लौकिक माननवादियों द्वारा सोचने के तथाकथित ‘‘राजनैतिक रुप से सही’’ तरीके से निकले अनुमानों के आधार पर इतिहास को दोबारा लिखने का प्रयास है. विशेष रुप से, वे हमारे देश की स्थापना के इतिहास को दोबारा लिखना चाहते हैं ताकि वे इस तथ्य पर पर्दा डाल सकें कि हमारे संस्थापक पिताओं में गहरी धार्मिक बुनियाद थी और अपने लेखन के लिए उन्होंने बाइबल को आधार बनाया था. वे नियमित रुप से प्रार्थना करते थे और हमारे राष्ट्र के आधिकारिक दस्तावेज़ों और कार्यवाहियों में असंख्य बार परमेश्वर को शामिल करते थे. संशोधनवादी चाहते हैं कि हम यह बात मान लें कि हमारे देश की बुनियाद पूरी तरह से लौकिक थी.

12.Narcissism  यह अपने रुप-रंग, आराम, महत्व और गुणों पर ज़रुरत से ज़्यादा रुचि लेना है. इसे हम स्वयं में खो जाने की हद तक, स्वयं से एकदम चरम स्तर के अस्वस्थ प्रेम के रुप में परिभाषित कर सकते हैं. इससे संबंधित शब्द है ‘‘ ह्यूब्रिस’’ अर्थात् घमंड की अति से पैदा होनेवाला अभिमान. इस प्रकार की सोच, यथार्थ में होकर न सोच पाने, और परमेश्वर की जगह स्वयं को अपने जगत का केंद्र बनाने के कारण पैदा होती है. याकूब 4:6 कहता है, “परमेश्वर अभिमानियों से विरोध करता है, पर दीनों पर अनुग्रह करता है. ” आत्मकामिका, खुद को अपनी दुनिया का राजा बनाने का नतीजा है. स्वयं की राज्य. पौलुस कहता है, ‘‘…..कि जैसा समझना चाहिए, उससे बढ़कर कोई भी अपने आप न समझे….. (रोमियों 12:3)

13. बहुसंस्कृतिवाद  : इस विश्वास का आधार उत्तरआधुनिकवाद है, जिसका मानना है कि सभी सत्य सांस्कृतिक रुप से प्रभावित होते हैं और इसलिए कोई भी सत्य या नैतिकता सभी संस्कृतियों के लिए मान्य नहीं है. यही कारण है कि कोई भी संस्कृति किसी दूसरी संस्कृति से बेहतर नहीं होती, वह बस उससे अलग होती हैं. सभी संस्कृतियों को बराबर का सम्मान देना चाहिए और हमें उन सभी के प्रति सहनशीलता दिखानी चाहिए. बहुसंस्कृतिवाद नैतिक सापेक्षता को सामूहिक रुप से लागू किए जाने का सीधा परिणाम है.

14. बहुवाद  : एक स्थिति है जो किसी ऐसे समाज या संस्कृति में होती है, जिसमें बहुत से धर्म, विश्व-दर्शन, और सच्चाई से जुड़े दावे होते हैं, लेकिन प्रबलता किसी की नहीं होती. इस मत के अनुसार विभिन्न प्रकार के बहुत से विचारों को सुसंगत रुप से किसी एक इकाई के अंर्तगत लाना संभव नहीं है. सार्वभौमिक सत्य या नैतिकता के परम तत्व में इसकी आस्था नहीं है. अनेकवाद इस बात को समझने की असफलता है कि सभी सत्य परमेश्वर के सत्य हैं, और परमेश्वर ही पूरे ब्रह्माण्ड को जोड़नेवाली संसक्त शक्ति है. कुलुस्सियों 1:17 कहता है कि मसीह ही “सब वस्तुओं में प्रथम है, और सब वस्तुएँ उसी में स्थिर रहती हैं.”

15. उत्तर आधुनिकतावाद  यह एक विशेष विश्व-दर्शन है जो इस धारणा पर टिका है कि सत्य वस्तुनिष्ठ नहीं होता, और इसे खोजा नहीं बल्कि बनाया जाता है. सत्य सांस्कृतिक रुप से प्रभावित, व्यक्तिपरक, और इसलिए सापेक्षिक होता है. इस तरह की सोच को आधुनिकवाद के अनुभववाद (जो किसी व्यक्ति की समझ पाँच इन्द्रियों के अनुभव तक सीमित करता है) को लेकर हुई प्रतिक्रिया के रुप में समझा जा सकता है. मसीही विश्वास करते हैं कि सत्य को बनाया नहीं बल्कि खोजा, जाना अथवा उद्घाटित किया जाता है और इसका स्रोत हम नहीं वरन् परमेश्वर होता है. यीशु ने कहा, “….सच्चाई मैं ही हूँ ” (यूहन्ना 14:6)….. ” … तेरा वचन सत्य है ” (यूहन्ना 17:17).

16. राजनैतिक शुद्धता  यह लौकिक मानववाद, उत्तरआधुनिकवाद, बहुसंस्कृतिवाद और सर्वहितवाद के विश्व-दर्शन और मान्यताओं की कसौटी पर अनुमोदित धारणा और स्वीकृत बर्ताव है. असल बात यह है कि लौकिक मानववाद को तो सामाजिक रुप से स्वीकार्य समझा जाता है लेकिन बाइबल पर आधारित मसीहत को राजनैतिक रुप से सही नहीं समझा जाता. यह वास्तव में अपना मुँह बंद रखने के लिए मसीहियों पर दबाव बनाने का एक तरीका है. लेकिन मसीहियों को तो इस बात की बुलाहट मिली है कि वे सुसमाचार से न लजाएँ, वरन् प्रेम में होकर सत्य बोलें. (इफि. 4:15)

17. सर्वहितवाद  : यह एक धार्मिक आस्था है, जो कहती है कि असल में ‘‘सभी रास्ते एक ओर जाते हैं.’’ ‘‘सभी धर्म परमेश्वर की ओर ले जाते हैं.’’ सभी विश्व-दर्शन उद्धार के मान्य रास्ते हो सकते हैं, और ‘‘अद्वितीय’’ या ‘‘दूसरों से अलग’’ होने की कोशिश करनेवाला हर धर्म या विश्व-दर्शन ‘‘गलत’’ है. जार्ज बर्ना के अनुसार, 64 प्रतिशत अमेरीकी इस दृष्टिकोण से सहमति रखते हैं. सभी धर्म एक दूसरे से अलग और असंगत हैं इसलिए या तो एक ही धर्म सही, सच्चा और मान्य है, या कोई भी नहीं. मसीहत ही एकलौता ऐसा धर्म है “जो अनुग्रह के द्वारा उद्धार की बात कहता है ”  (इफि. 2:8,9). यदि यह सत्य है, तो अवश्य ही दूसरे धर्म असत्य हैं.

18. नई सहिष्णुता  नई सहनशीलता इस धारणा की बुनियाद पर टिकी है कि सत्य सापेक्ष है और इसलिए हर किसी के व्यक्तिगत मत, मूल्य, विश्वदर्शन, जीवन-शैली, और सत्य के प्रति उसकी धारणाएँ समान रुप से मान्य हैं.

बहुसंस्कृतिवाद लौकिक सहनशीलता को व्यक्ति की जगह संस्कृति पर लागू करना है. संपूर्ण सत्य और नैतिकता से रिक्त संस्कृति के लिए सहनशीलता सबसे बड़ा गुण होता है. ऐसा लगता है, मानो बाइबल को माननेवाले मसीही ही वे लोग हैं जिनके प्रति कोई सहनशीलता नहीं दिखाता, क्योंकि केवल उनका विश्वदर्शन लौकिकवाद के सापेक्षिक मूल्यों के लिए खतरा है.

19. प्रकृतिवाद, आस्तिकता के विपरीत, यह धारणा कहती है कि यह प्राकृतिक, भौतिक जगत ही है जो है, बाकी कुछ नहीं है. चूँकि इसमें अलौकिकता जैसी कोई चीज़ नहीं है, इसलिए परमेश्वर और आश्चर्यकर्म जैसी चीज़ें भी नहीं है. जो कुछ भी आस्तित्व में है, उसे प्राकृतिक कारणों के साथ समझाया जा सकता है; इसलिए अलौकिक का आस्तित्व में होना संभव नहीं है. यह धारणा क्रमिक विकास के सिद्धांत का केंद्र बिंदु है. कुछ प्रकृतिवादी स्वयं को वैज्ञानिक भौतिकवादी कहते हैं-नाम से कुछ फर्क नहीं पड़ता; लेकिन भौतिकवाद, प्रकृतिवाद और क्रमिक विकास, साथ-साथ चलते हैं -एक के बिना दूसरा अधूरा है.

20. भूमंडलीकरण  (एक विश्व सरकार): जब परमेश्वर है ही नहीं, तो हमारी समस्याओं को सुलझाने में वह हमारी मदद कैसे कर सकता है. इसलिए, अपनी समस्याओं का समाधान हमें खुद निकालना होगा. ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका है वैश्विकवाद, अर्थात् पूरे विश्व में एक ही सरकार का राज्य, अवश्य ही, अर्थव्यवस्था समाजवादी होनी चाहिए. आजकल संयुक्त राष्ट्र और विश्व न्यायालय जैसी संस्थाओं द्वारा बस ऐसा ही करने की दिशा में गंभीर प्रयास लगाए जा रहे हैं. इस सरकार के आगे दुनिया के सभी देशों को अपनी प्रभुत्व सौंपनी होगी. बाइबल कहती है, कि अंत के दिनों में पूरी दुनिया की सत्ता ईसा-विरोधी (एंटीक्राइस्ट) के हाथों में होगी.

सारांश

वह कौन सी बात है जो इन सभी ‘‘वादों’’ में मौजूद थी? सभी ने मसीह के सुसमाचार में प्रकाशित परमेश्वर के प्रेम को नकारा था, और सभी ने परमेश्वर के वचन, बाइबल में प्रकाशित ज्ञान को नकारा था. वे परमेश्वर को सम्मान नहीं देते और उसे गंभीरता से नहीं लेते हैं, और न ही परमेश्वर के वचन के प्रति उनमें आदर की भावना है. इस बात को पौलुस ने रोमियों 1:21 में कुछ इस प्रकार बताया है,”इस कारण कि परमेश्वर को जानने पर भी उन्होंने परमेश्वर के योग्य बढ़ाई और धन्यवाद न किया, परन्तु व्यर्थ विचार करने लगे, यहाँ तक कि उनका निबुर्द्धि मन अन्धेरा हो गया.’’  गैर मसीही विश्वदर्शन के बुरे प्रभावों से बचने का केवल एक तरीका है, और वह है मसीही विश्वदर्शन को विकसित करना – अर्थात् बाइबल के अनुसार सोचना सीखना.

” स्वयं को केतली में बैठे कहावती मेंढक होने से बचाने के लिए, यह ज़रुरी है कि हम दुनिया को हमें अपने खाँचे में ठूँसने न दें, और अपने मन को परमेश्वर द्वारा नया बनाने दें (रोमियों 12:1-2). लेकिन इससे भी अधिक, हमें इस बात की बुलाहट मिली है कि हमआत्मा की तलवार ”  (इफि. 6:17) लेकर हमला बोलें. 2 कुरिन्थियों 10:3-5 में पौलुस ने कहा था कि, “क्योंकि यद्यपि हम शरीर में चलते फिरते हैं, तोभी शरीर के अनुसार नहीं लड़ते. क्योंकि हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं, पर गढ़ों को ढा देने के लिये परमेश्वर के द्वारा सार्मथी हैं. सो हम कल्पनाओं क¨, और हर एक ऊंची बात को, जो परमेश्वर की पहिचान के विरोध में उठती है, खण्डन करते हैं; और हर एक भावना क¨ कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं. ”  हाइड्रा का विनाश, केवल “आत्मा की तलवार ”  कर सकती है.